जब व्यवस्था फेल होती है: गोड्डा की घटना ने खोली ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की पोल
Jan-Man Opinion : झारखंड के गोड्डा जिले से आई एक खबर ने एक बार फिर राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रसव पीड़ा से जूझ रही एक महिला को समय पर एंबुलेंस नहीं मिलती। परिवार कई बार फोन करता है—108 एंबुलेंस सेवा को भी और ममता वाहन को भी। लेकिन कोई वाहन गांव तक नहीं पहुंचता।
आखिरकार मजबूरी में परिजन महिला को ई-रिक्शा पर बैठाकर अस्पताल के लिए निकलते हैं। रास्ते में ही प्रसव पीड़ा इतनी तेज हो जाती है कि महिला को सड़क पर, ई-रिक्शा में ही बच्चे को जन्म देना पड़ता है।
किसी तरह स्थानीय लोगों की मदद से मां और नवजात को अस्पताल पहुंचाया जाता है। डॉक्टर कहते हैं कि दोनों सुरक्षित हैं—यह राहत की बात है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यही वह स्वास्थ्य व्यवस्था है जिसकी कल्पना एक राज्य अपने नागरिकों के लिए करता है?
दरअसल यह घटना केवल एक ग्रामीण परिवार की मजबूरी की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है जिसमें बड़े-बड़े दावे तो किए जाते हैं, लेकिन जरूरत के वक्त बुनियादी सुविधाएं लोगों तक नहीं पहुंच पातीं।
पिछले कुछ समय में झारखंड की राजनीति में स्वास्थ्य मंत्री कई कारणों से चर्चा में रहे हैं। कभी वे रसोई गैस की कीमतों के विरोध में रिक्शा खींचते नजर आते हैं। कभी वे यह संदेश देते हैं कि मिट्टी के चूल्हे पर कोयला और लकड़ी जलाकर भी खाना बनाया जा सकता है।
कभी यह बयान सामने आता है कि सांसद पप्पू यादव का इलाज झारखंड में कराया जाएगा, मानो राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी सक्षम है कि बड़े से बड़े मरीज का इलाज यहां आसानी से हो सकता है।
लेकिन इन प्रतीकात्मक संदेशों और राजनीतिक गतिविधियों के बीच जब जमीनी सच्चाई सामने आती है, तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है।
कुछ समय पहले ही राज्य के आदिवासी बहुल जिले पश्चिमी सिंहभूम के चाईबासा सदर अस्पताल में एक ऐसी घटना सामने आई थी, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। हीमोफीलिया से पीड़ित कई बच्चों को एचआईवी संक्रमित खून चढ़ा दिया गया। जिन बच्चों का इलाज होना था, वे और गंभीर बीमारी के खतरे में आ गए।
उस घटना ने यह सवाल उठाया था कि आखिर राज्य की स्वास्थ्य प्रणाली में निगरानी और जवाबदेही की स्थिति क्या है।
इसी तरह कई बार ऐसी खबरें सामने आईं जब अस्पताल से शव ले जाने के लिए एंबुलेंस या वाहन उपलब्ध नहीं हुआ। मजबूर परिजनों को कभी कार्टन में शव ले जाना पड़ा, कभी साइकिल पर लादकर घर तक ले जाना पड़ा। गर्भवती महिलाओं को खाट पर लादकर अस्पताल ले जाने की खबरें और तसवीरें आये दिन दिख जाती हैं।
ये केवल खबरें नहीं हैं। ये उस व्यवस्था के संकेत हैं जहां बुनियादी ढांचा अभी भी कमजोर है।
अब गोड्डा की यह ताजा घटना उसी श्रृंखला की एक और कड़ी बनकर सामने आई है।
सोचिए, अगर एक गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस समय पर नहीं मिलती, तो ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
सरकार की ओर से कई योजनाएं चलाई जाती हैं – मातृ स्वास्थ्य योजना, सुरक्षित प्रसव कार्यक्रम, 108 एंबुलेंस सेवा, ममता वाहन सेवा। कागजों पर इन योजनाओं का ढांचा मजबूत दिखाई देता है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या ये सेवाएं जरूरत के वक्त लोगों तक पहुंच पा रही हैं?
स्वास्थ्य व्यवस्था का मूल्यांकन भाषणों या घोषणाओं से नहीं होता। उसका मूल्यांकन इस बात से होता है कि संकट की घड़ी में व्यवस्था कितनी जल्दी और कितनी प्रभावी तरीके से प्रतिक्रिया देती है।
अगर किसी गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस उपलब्ध नहीं हो पा रही है, तो यह केवल एक तकनीकी समस्या नहीं है। यह प्रशासनिक प्राथमिकताओं और व्यवस्थागत कमजोरियों का संकेत है।
राजनीति में प्रतीकात्मक संदेशों की अपनी भूमिका होती है। प्रदर्शन, बयान और राजनीतिक संदेश – ये सब लोकतंत्र का हिस्सा हैं। लेकिन जब बात स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरत की हो, तो जनता प्रतीकों से ज्यादा व्यवस्था की मजबूती देखना चाहती है।
गोड्डा की यह घटना हमें यही याद दिलाती है कि स्वास्थ्य सेवा केवल घोषणाओं से नहीं चलती। इसके लिए मजबूत ढांचा, जवाबदेही और जमीनी स्तर पर सक्रिय व्यवस्था की जरूरत होती है।
जब तक एंबुलेंस समय पर गांव तक नहीं पहुंचेगी, जब तक अस्पतालों में संसाधन पर्याप्त नहीं होंगे, और जब तक स्वास्थ्य तंत्र की निगरानी मजबूत नहीं होगी – तब तक इस तरह की घटनाएं सामने आती रहेंगी।
और हर बार ये घटनाएं एक ही सवाल दोहराएंगी कि क्या हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था सच में उतनी मजबूत है, जितना हम मंचों से दावा करते हैं?
यही सवाल आज गोड्डा की उस सड़क से उठ रहा है, जहां एक महिला को अस्पताल पहुंचने से पहले ही ई-रिक्शा में बच्चे को जन्म देना पड़ा।
यह भी पढ़ें – व्यंग्य : ₹450 में सिलेंडर का वादा, रिक्शा पॉलिटिक्स और रील की दुकान