रांची: रांची: ईडी अधिकारियों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामले को चुनौती देने वाली याचिका पर गुरुवार को झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान जवाब दाखिल करने में हो रही देरी और इसके लिए अतिरिक्त समय मांगे जाने पर अदालत ने नाराजगी जताई। हाईकोर्ट ने प्रतिवादी पक्ष पर 10 हजार रुपये की लागत लगाते हुए निर्धारित अवधि में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी की एकलपीठ में हुई। सुनवाई के दौरान हेमंत सोरेन की ओर से जवाब दाखिल करने के लिए छह सप्ताह का समय मांगा गया था। अदालत ने छह सप्ताह का समय देने से इनकार करते हुए चार सप्ताह का समय दिया। साथ ही 10 हजार रुपये की लागत जमा करने का निर्देश दिया। रिपोर्ट के मुताबिक यह राशि झालसा में जमा की जानी है।
हेमंत सोरेन ने दर्ज कराया था SC/ST थाने में मामला
यह कानूनी विवाद उस समय सामने आया था, जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की ओर से रांची के SC/ST थाना में ईडी के अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया था। आरोप था कि जमीन से जुड़े मामले की जांच के दौरान ईडी अधिकारियों ने उनके साथ उत्पीड़न किया और उनके अधिकारों का उल्लंघन किया।
इसी प्राथमिकी को लेकर ईडी के तत्कालीन अधिकारियों ने झारखंड हाईकोर्ट का रुख किया है। अधिकारियों की ओर से दर्ज FIR और उसके आधार पर आगे की कार्रवाई को चुनौती देते हुए मामले को रद्द करने की मांग की गई है।
कपिल राज समेत अन्य ईडी अधिकारियों की याचिका
मामले में ईडी के तत्कालीन अधिकारी कपिल राज, देवव्रत झा समेत अन्य अधिकारियों की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। याचिका में रांची के SC/ST थाना में दर्ज प्राथमिकी को चुनौती दी गई है।
हाईकोर्ट ने मामले में प्रतिवादी पक्ष से जवाब मांगा था। गुरुवार की सुनवाई में जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की गई। इसी दौरान अदालत ने देरी पर नाराजगी जताई और छह सप्ताह के बजाय चार सप्ताह का समय देते हुए 10 हजार रुपये की लागत लगा दी।
2 नवंबर को होगी अगली सुनवाई
अब मामले की अगली सुनवाई 2 नवंबर 2026 को होगी। अदालत के निर्देश के अनुसार निर्धारित समय के भीतर जवाब दाखिल किया जाना है। इसके बाद हाईकोर्ट मामले में आगे की सुनवाई करेगा।
नोट: ₹10 हजार की राशि जवाब दाखिल करने में हुई देरी और अतिरिक्त समय मांगने के संदर्भ में लगाई गई लागत है। इसे मामले के मूल आरोपों पर अदालत की अंतिम राय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
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