Ranchi : देश में पहली बार डिजिटल माध्यम से होने जा रही जनगणना को लेकर जहां प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां तेज हैं, वहीं राजनीतिक स्तर पर बहस भी गहराने लगी है। झारखंड में इस मुद्दे ने नया सियासी मोड़ ले लिया है – एक तरफ केंद्र की पहल की सराहना हो रही है, तो दूसरी ओर सरना धर्म कोड और डिजिटल डेटा की विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
दो चरणों में होगी जनगणना, जानकारी देना होगा अनिवार्य
सरकार की योजना के अनुसार जनगणना दो चरणों में कराई जाएगी। इसमें प्रत्येक नागरिक की भागीदारी कानूनी रूप से अनिवार्य होगी। जनगणना के दौरान गलत जानकारी देने या जानकारी छिपाने पर तीन साल तक की सजा या जुर्माने का प्रावधान रखा गया है।
इस बार लोगों से कुल 33 प्रकार की जानकारी ली जाएगी, जिसमें केवल जनसंख्या गिनती ही नहीं, बल्कि जीवन स्तर से जुड़ी विस्तृत जानकारी भी शामिल होगी – जैसे पानी का स्रोत, शौचालय, बिजली, रसोई ईंधन, कचरा प्रबंधन, डिजिटल उपकरण और वाहन।
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पहली बार पूरी तरह डिजिटल प्रक्रिया
2026 में झारखंड में जनगणना की शुरुआत स्व-गणना (Self Enumeration) से होगी, जो 1 से 15 मई तक चलेगी। इसके बाद 16 मई से 14 जून तक हाउस लिस्टिंग का काम होगा, जबकि पूर्ण जनगणना 2027 में डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए पूरी की जाएगी।
प्रगणक मोबाइल ऐप के जरिए सीधे डेटा अपलोड करेंगे, वहीं आम नागरिक भी ऑनलाइन पोर्टल पर खुद अपनी जानकारी दर्ज कर सकेंगे। यह सिस्टम हिंदी और अंग्रेजी समेत 16 भाषाओं में उपलब्ध होगा। सफल पंजीकरण के बाद नागरिकों को एक यूनिक SE ID दी जाएगी, जिसे प्रगणक के साथ साझा करना होगा।
झारखंड की जनसंख्या : आंकड़ों की एक झलक
2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड की कुल जनसंख्या 3.29 करोड़ थी, जो 2001 के मुकाबले 22.42% अधिक थी। यह वृद्धि दर पिछले दशक के 23.19% से थोड़ी कम रही, लेकिन राज्य की कुल हिस्सेदारी देश की आबादी में बढ़कर 2.72% हो गई।
डिजिटल जनगणना पर राजनीतिक टकराव
डिजिटल जनगणना को लेकर राजनीतिक दलों के बीच स्पष्ट मतभेद उभरकर सामने आए हैं।
- भाजपा के मीडिया प्रभारी शिवपूजन पाठक ने इसे पारदर्शी और तेज प्रक्रिया बताते हुए कहा कि इससे त्रुटियों की संभावना कम होगी।
- कांग्रेस के प्रदेश महासचिव राकेश सिन्हा ने आरोप लगाया कि डिजिटल प्रणाली के नाम पर भ्रम फैलाया जा सकता है।
- वहीं झामुमो के प्रवक्ता मनोज पांडे ने सरना धर्म कोड को शामिल न करने पर नाराजगी जताई और इसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा बताया।
सरना धर्म कोड: फिर उभरा पहचान का सवाल
झारखंड की राजनीति में सरना धर्म कोड लंबे समय से एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। जनगणना में इसे अलग पहचान नहीं मिलने पर झामुमो ने आपत्ति जताई है। पार्टी का मानना है कि इससे आदिवासी समाज की धार्मिक पहचान को नुकसान होता है और यह मुद्दा आने वाले चुनावों में बड़ा राजनीतिक असर डाल सकता है।
डिजिटल माध्यम पर उठते सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल जनगणना जहां प्रक्रिया को तेज और सटीक बना सकती है, वहीं डेटा सुरक्षा, तकनीकी पहुंच और ग्रामीण इलाकों में डिजिटल साक्षरता जैसे मुद्दे भी चुनौती बन सकते हैं।
झारखंड जैसे राज्यों में, जहां अभी भी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह मजबूत नहीं है, वहां इस प्रक्रिया की सफलता काफी हद तक प्रशासनिक तैयारी और लोगों की भागीदारी पर निर्भर करेगी।
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आगे क्या?
डिजिटल जनगणना सिर्फ आंकड़ों का संकलन नहीं, बल्कि नीति निर्माण की आधारशिला होती है। ऐसे में इस पर उठ रहे राजनीतिक और सामाजिक सवाल आने वाले समय में और गहराने की संभावना है।
झारखंड में इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रशासन पारदर्शिता, तकनीकी मजबूती और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन कैसे बनाता है।
समाचार स्रोत – ईटीवी भारत