चतरा एयर एंबुलेंस हादसे के बाद झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल, बर्न मरीजों के लिए समुचित इंतजाम क्यों नहीं?

Anand Kumar
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Jan-Man Desk Ranchi : चतरा में हुए एयर एंबुलेंस हादसे ने केवल फ्लाइट सेफ्टी पर ही नहीं, बल्कि झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे में जले हुए मरीज को बेहतर इलाज के लिए दिल्ली ले जाया जा रहा था। सवाल यह है कि आखिर राज्य में ऐसी क्या कमी है कि गंभीर बर्न केस के मरीजों को एयर एंबुलेंस से बाहर भेजना पड़ता है? क्या झारखंड के सरकारी अस्पतालों में बर्न मरीजों के इलाज की समुचित व्यवस्था नहीं है?

स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने भी आज चतरा में घटनास्थल और सदर अस्पताल का दौरा करने के बाद स्वीकार किया कि झारखंड में स्वास्थ्य व्यवस्था की लचर स्थिति के चलते मरीजों को दिल्ली ले जाना पड़ रहा है। मंत्री ने माना कि राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति बेहतर करने की जरूरत है।

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि सरकार स्वास्थ्य सेवाओं के उन्नयन के लिए लगातार प्रयास कर रही है और आने वाले समय में सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे।

विधानसभा के बजट सत्र में यह मुद्दा जोरदार तरीके से उठा। विपक्ष ही नहीं, सत्तापक्ष के विधायकों और मंत्रियों ने भी स्वीकार किया कि राज्य में बर्न यूनिट्स और हाई-स्टैंडर्ड इलाज की भारी कमी है।


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बर्न मरीजों के इलाज की स्थिति: कागज पर व्यवस्था, जमीन पर कमी

राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) को झारखंड की रीढ़ माना जाता है। लेकिन भाजपा विधायक नवीन जायसवाल ने विधानसभा में रिम्स के बर्न वार्ड की हालत को “दयनीय” बताया। उनका आरोप है कि यहां भर्ती मरीजों को इंफेक्शन का खतरा बना रहता है।

उन्होंने कहा कि बेड से लेकर दवाओं के बॉक्स तक जंग लगे हुए हैं, पंखे और एसी खराब पड़े हैं, और मरीजों को दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ती हैं। ऐसे में सवाल उठता है—क्या रिम्स जैसे संस्थान में भी बर्न मरीज सुरक्षित इलाज की उम्मीद कर सकते हैं?


विधानसभा में उठी आवाजें: पक्ष और विपक्ष एक सुर में

हजारीबाग से भाजपा विधायक प्रदीप प्रसाद ने कहा कि राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था “राम भरोसे” है और बर्न मरीजों के लिए बेहतर सरकारी व्यवस्था नहीं है।

झामुमो विधायक हेमलाल मुर्मू ने माना कि कुछ जिलों में बर्न वार्ड हैं, लेकिन वे हाई-स्टैंडर्ड नहीं हैं। उन्होंने विशेषज्ञ डॉक्टरों और फैकल्टी की कमी को सबसे बड़ी समस्या बताया।

निरसा से माले विधायक अरूप चटर्जी ने हर जिले और मेडिकल कॉलेज में उच्च स्तरीय बर्न यूनिट स्थापित करने की मांग की।

पेयजल और स्वच्छता मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने भी माना कि मरीजों का लोड ज्यादा है और स्वास्थ्य व्यवस्था को दुरुस्त करने की जरूरत है।

शहरी विकास मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने कहा कि 30% से ज्यादा जलने की स्थिति में मरीज के बचने की संभावना कम हो जाती है, फिर भी राज्य के बर्न यूनिट्स को अपग्रेड करना जरूरी है।

ध्यान देने योग्य है कि स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने सदन में विस्तृत जवाब नहीं दिया, जिससे राजनीतिक बहस और तेज हो गई।


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जिला अस्पतालों की हकीकत

राज्य के अधिकांश जिला अस्पतालों में अलग से हाई-स्टैंडर्ड बर्न वार्ड नहीं हैं। यहां तक कि रांची सदर अस्पताल में 20 बेड का बर्न वार्ड बनाने की योजना थी, लेकिन तैयार भवन में बाद में ब्लड बैंक संचालित कर दिया गया।

यह उदाहरण बताता है कि योजनाएं बनती हैं, लेकिन प्राथमिकता बदल जाती है। बर्न मरीजों के इलाज के लिए आवश्यक आईसीयू-स्तर की देखभाल, संक्रमण नियंत्रण और प्लास्टिक सर्जरी विशेषज्ञों की उपलब्धता अभी भी सीमित है।


आर्थिक बोझ और सामाजिक असर

बर्न केस का इलाज महंगा और लंबा होता है। गंभीर रूप से जले मरीजों को अक्सर दिल्ली, मुंबई या दक्षिण भारत के अस्पतालों में भेजा जाता है।

  • एयर एंबुलेंस का खर्च लाखों में
  • निजी अस्पतालों में इलाज का भारी बिल
  • परिवारों पर कर्ज का बोझ

सवाल यह भी है कि क्या राज्य की स्वास्थ्य बीमा योजनाएं ऐसे मामलों में पर्याप्त कवरेज दे पा रही हैं?


विशेषज्ञता की कमी: मूल समस्या

बर्न मरीजों के इलाज में प्लास्टिक सर्जन, एनेस्थेटिस्ट, क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट और प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ की जरूरत होती है। झारखंड में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी लंबे समय से एक चुनौती रही है। मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी पद रिक्त हैं।

बिना प्रशिक्षित टीम और संक्रमण नियंत्रण प्रणाली के बर्न वार्ड प्रभावी नहीं हो सकते।


क्या यह नीति-स्तर की विफलता है?

चतरा हादसे ने एक असहज सवाल खड़ा किया है—क्या राज्य की स्वास्थ्य नीति में बर्न केयर को प्राथमिकता नहीं मिली?

झारखंड औद्योगिक राज्य है। खदानों, फैक्ट्रियों और घरेलू दुर्घटनाओं में बर्न केस असामान्य नहीं हैं। ऐसे में उच्च स्तरीय बर्न यूनिट की जरूरत अधिक है।

यदि हर बड़े मेडिकल कॉलेज में अत्याधुनिक बर्न यूनिट स्थापित हो, तो राज्य से बाहर रेफर करने की मजबूरी कम हो सकती है।


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आगे का रास्ता: क्या करना होगा?

  1. हर मेडिकल कॉलेज में हाई-स्टैंडर्ड बर्न यूनिट
  2. जिला अस्पतालों में प्राथमिक बर्न केयर सुविधा
  3. विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति
  4. संक्रमण नियंत्रण और मॉड्यूलर वार्ड
  5. स्वास्थ्य बजट में विशेष प्रावधान

चतरा एयर एंबुलेंस हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं है; यह झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोर कड़ी को उजागर करने वाला घटनाक्रम है। विधानसभा में उठी आवाजें बताती हैं कि समस्या वास्तविक है।

अब सवाल यह है कि क्या यह बहस नीति बदलाव में बदलेगी, या फिर यह मुद्दा भी अन्य विवादों की तरह समय के साथ दब जाएगा?

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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