वाराणसी में TPC कमांडर ब्रजेश गंझू ढेर, 30 लाख रुपये का था इनाम; UP ATS से मुठभेड़ में मारा गया

Anand Kumar
8 Min Read

रांची/वाराणसी : झारखंड के प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन तृतीय प्रस्तुति कमेटी (TPC) के शीर्ष कमांडर ब्रजेश गंझू उर्फ गोपाल सिंह की उत्तर प्रदेश के वाराणसी में मुठभेड़ में मौत हो गई। उत्तर प्रदेश ATS के मुताबिक, रविवार तड़के रामनगर थाना क्षेत्र में हुई मुठभेड़ के दौरान ब्रजेश गंझू ने पुलिस टीम पर फायरिंग की, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में वह घायल हो गया। अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

रामनगर में सुबह करीब 5 बजे हुई मुठभेड़

रिपोर्टों के अनुसार, UP ATS को सूचना मिली थी कि ब्रजेश गंझू बाइक से रामनगर के रास्ते मुगलसराय की ओर जा रहा है। इसके बाद ATS की टीम ने इलाके में घेराबंदी की। पुलिस के मुताबिक, बाइक से पहुंचे ब्रजेश को रुकने का इशारा किया गया, लेकिन उसने कथित तौर पर टीम पर फायरिंग शुरू कर दी।

ATS के अनुसार, गोलीबारी में टीम के डीएसपी विपिन राय और हेड कांस्टेबल नितेंद्र कृष्ण की बुलेटप्रूफ जैकेट पर भी गोलियां लगीं। इसके बाद पुलिस की जवाबी कार्रवाई में ब्रजेश गंझू को गोली लगी। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। मुठभेड़ के दौरान उसका एक साथी मौके से फरार हो गया।

मौके से हथियार और कारतूस बरामद

UP ATS की ओर से सामने आई जानकारी के मुताबिक, घटनास्थल से दो पिस्टल, जिंदा कारतूस और खोखे बरामद किए गए हैं। पुलिस फरार साथी की तलाश में जुटी है और यह भी जांच की जा रही है कि ब्रजेश गंझू वाराणसी तक कैसे पहुंचा था।

चतरा और पलामू में सक्रिय रहा था TPC

ब्रजेश गंझू झारखंड के चतरा जिले के लावालौंग क्षेत्र का रहने वाला बताया जाता है। पुराने सुरक्षा और जांच रिकॉर्ड में उसे TPC के प्रमुख नेताओं में शामिल किया गया है। संगठन की गतिविधियां झारखंड के चतरा, लातेहार और पलामू सहित कई इलाकों में रही हैं।

NIA और अन्य जांच एजेंसियों से जुड़े मामलों में TPC पर कोयला कारोबार, ठेकेदारों, ट्रांसपोर्टरों और कारोबारियों से लेवी वसूली के आरोपों की जांच हुई है। झारखंड हाई कोर्ट के एक हालिया आदेश में भी ब्रजेश गंझू उर्फ गोपाल सिंह का नाम TPC से जुड़े कथित वसूली नेटवर्क के संदर्भ में दर्ज है।

30 लाख के इनाम ने बनाया था मोस्ट वांटेड

ब्रजेश गंझू लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के निशाने पर था। 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड पुलिस की ओर से उसके ऊपर पहले से 25 लाख रुपये का इनाम था। बाद में NIA ने 5 लाख रुपये का इनाम घोषित किया, जिसके बाद कुल इनामी राशि 30 लाख रुपये हो गई।

पूर्व विधायक गणेश गंझू का भाई था ब्रजेश

ब्रजेश गंझू का राजनीतिक कनेक्शन भी चर्चा में रहा है। उसका भाई गणेश गंझू सिमरिया विधानसभा सीट से विधायक रह चुका है। वर्ष 2015 में गणेश गंझू ने झारखंड विकास मोर्चा (JVM) छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था।

इसके करीब एक साल बाद वर्ष 2016 में चतरा की कोल परियोजना से जुड़े टेरर फंडिंग मामले में NIA ने कार्रवाई शुरू की थी। इस मामले में टीपीसी और उससे जुड़े लोगों की गतिविधियां जांच के दायरे में आई थीं।

दिल्ली तक पहुंची थी ब्रजेश की सक्रियता

बताया जाता है कि उस दौर में ब्रजेश गंझू संगठन के लिए केंद्र में लाइजनिंग के सिलसिले में दिल्ली तक पहुंचा था। सुरक्षा एजेंसियों के लिए उसकी गतिविधियां लगातार चिंता का विषय बनी हुई थीं।

टीपीसी के खिलाफ कार्रवाई और संगठन से जुड़े मामलों की जांच के दौरान ब्रजेश गंझू का नाम भी सामने आता रहा। हालांकि उसके खिलाफ लगे विभिन्न आरोपों और उसकी भूमिका से संबंधित दावों को संबंधित जांच एजेंसियों और आधिकारिक रिकॉर्ड के संदर्भ में देखना जरूरी है।

पुलिस अफसरों ने रखी थी टीपीसी की नींव?

टीपीसी के गठन को लेकर झारखंड में लंबे समय से कई तरह की चर्चाएं और दावे होते रहे हैं। एक धारणा यह भी रही है कि टीपीसी की नींव पुलिस के कुछ अधिकारियों के संरक्षण में पड़ी थी। हालांकि इस दावे को स्थापित तथ्य के रूप में पेश करने के लिए ठोस आधिकारिक दस्तावेज या जांच रिपोर्ट का संदर्भ जरूरी है।

टीपीसी बाद में झारखंड के कई इलाकों में सक्रिय एक प्रभावशाली उग्रवादी संगठन के रूप में सामने आया। संगठन पर लेवी वसूली, हिंसा और कोयला कारोबार से जुड़े नेटवर्क में हस्तक्षेप जैसे गंभीर आरोप लगते रहे हैं।

इनामी होने के बावजूद कैंप में रहने की चर्चा

ब्रजेश गंझू को लेकर सबसे दिलचस्प बात यह भी कही जाती रही है कि कागजों में इनामी होने के बावजूद वह सुरक्षा बलों के कैंपों के आसपास ही रहता था। उसके प्रभाव और सुरक्षा एजेंसियों के साथ कथित संपर्क को लेकर समय-समय पर कई सवाल उठते रहे हैं।

हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है और इसे जांच एजेंसियों के आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही अंतिम रूप से स्थापित किया जा सकता है।

दो-तीन साल से था अंडरग्राउंड

पिछले दो-तीन वर्षों से ब्रजेश गंझू के अंडरग्राउंड रहने की बात सामने आती रही थी। उसकी तलाश सुरक्षा एजेंसियों के लिए लगातार चुनौती बनी हुई थी।

अब बनारस में मुठभेड़ में उसकी मौत के साथ झारखंड के उग्रवादी संगठन टीपीसी से जुड़े एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत माना जा रहा है। हालांकि उसके नेटवर्क, संगठन से जुड़े लोगों और पिछले वर्षों में उसकी गतिविधियों की जांच से कई और तथ्य सामने आने की संभावना है।

मुठभेड़ को लेकर परिवार ने उठाए सवाल

ब्रजेश गंझू की मौत के बाद उसके बड़े भाई और पूर्व विधायक गणेश गंझू ने पुलिस के मुठभेड़ के दावे पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि ब्रजेश को कहीं और से पकड़कर बाद में दूसरी जगह ले जाकर मारा गया। परिवार ने मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। यह आरोप परिवार की ओर से लगाया गया है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों में नहीं हुई है।

फिलहाल वाराणसी पुलिस और UP ATS की ओर से मुठभेड़ की परिस्थितियों, बरामद हथियारों और ब्रजेश गंझू के वाराणसी पहुंचने से जुड़े नेटवर्क की जांच की जा रही है।

यह भी पढ़ें – धनबाद के निरसा में पुलिस मुठभेड़ : निखार सबलोक हत्याकांड का शूटर सागर घायल, 2 गिरफ्तार

Share This Article
Follow:
वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *