बिहार में दोहराई जा रही झारखंड की ‘देहाती’ कहानी? नीतीश के दिल्ली प्रस्थान और निशांत की एंट्री के मायने
Shyam Kishore Choubey

जब झारखंड नहीं बना था यानी एकीकृत बिहार था, उन दिनों आज के झारखंड निवासी एक जाने-माने समाजवादी नेता हुआ करते थे हेमेंद्र प्रताप देहाती। विधायक रह चुके थे। झारखंड बनने के बाद 2005 के पहले चुनाव में उनके सुपुत्र भानु प्रताप देहाती विधायक चुने गए। उसी दौर में भाजपा से तिरस्कृत निर्दलीय मधु कोड़ा भी चुने गए। डेढ़ साल के अंदर ऐसा समय आया। जब कोड़ा महोदय को मुख्यमंत्री बनने का संयोग जुट गया। उनको सरकार बनाने के लिए भानु बाबू की जरूरत आन पड़ी। लेकिन ऐन वक्त पर भानु जेल भेज दिए गए, जबकि उनको मंत्री बनना था।
राजनीति ने रास्ता निकाला, भानु की जगह उनके गैर विधायक पिता को मंत्री बना दिया जाय। वे बना दिए गए। पुत्र की कुर्सी घेरे रहे, तबतक, जबतक जमानत नहीं मिल गई। फिर उस महिमामंडित कुर्सी पर पुत्र आसीन करा दिया गया।
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संयोग यह कि कोड़ा महोदय और भानु प्रताप दोनों फिलहाल भाजपा के शरणागत हैं।
अब जबकि समाजवाद की कोख से उभरे नीतीश कुमार यानी कथित सुशासन बाबू बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी त्यागकर या जिस किसी भी राजनीति का शिकार होकर राज्यसभा का परचा भर चुके हैं, तो उनके सुपुत्र निशांत कुमार पिता के दल जेडीयू में शामिल करा दिए गए। अगले कुछ दिनों में पिता नीतीश के मुख्यमंत्री रहते या उनके दिल्ली प्रस्थान के बाद, जैसी कि उम्मीद है, बिहार में महाराष्ट्र वाली राजनीतिक बयार बहाने के साथ गैर विधायक निशांत बाबू को कोई ऊंचे आसन पर आसीन करा दिया जाय, तो झारखंड की कहानी याद कर लेनी चाहिए।
झारखंड में पुत्र की कुर्सी पर पिता को आसीन कराया गया था, बिहार में पिता की भरपाई पुत्र से कराई जाएगी, फर्क यही रहेगा सेम टू सेम कुर्सी नहीं रहेगी।
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ट्विस्ट ये भी कि झारखंड की कहानी में पुत्र के लौटने की आस थी, बिहार में नीतीश बाबू अब फिर सुशासन के लिए लौटने वाले नहीं। लौटना ही रहता, तो दिल्ली क्यों ले जाए जाते!
यूं, गरीबी के मामले में बिहार और झारखंड जुड़वां भाई जैसे हैं। अरे भाई, ऐसे भी तो भाई ही हैं न! फर्क इतना ही है कि बिहार में भाजपा की दाल गली क्या, नीतीश बाबू ने गलवा दी, जबकि झारखंड में भाजपा वनवास झेल रही है।
ये न कहिएगा कि भाजपा ने बिहार में खेला कर दिया। नीतीश बाबू अपनी गति को प्राप्त हुए। गैर राजनीतिक बेटे को राजनीति में मौका दे दिया। पुत्र मोह किसे नहीं होता!
जन-मन की बात (संपादकीय टिप्पणी)
बिहार और झारखंड की राजनीति का यह तुलनात्मक विश्लेषण केवल कुर्सी के खेल का किस्सा नहीं है, बल्कि यह हमारे लोकतंत्र में ‘परिवारवाद’ और ‘अवसरवाद’ की गहरी जड़ों को उजागर करता है। जब विचारधारा की जगह निजी हित और पुत्र-मोह ले लेता है, तो शासन की परिभाषा बदल जाती है। झारखंड की पुरानी कहानी और बिहार में बन रही नई पटकथा, दोनों ही एक ही सिक्के के दो पहलू हैं—जहाँ जनता के विश्वास से ज्यादा महत्व सत्ता के गलियारों में अपनों को स्थापित करने को दिया जाता है। नीतीश कुमार का कथित ‘सुशासन’ अब ‘पुत्र-शासन’ की ओर मुड़ता दिख रहा है, और यह बदलाव न केवल उनकी राजनीतिक विरासत पर सवाल खड़े करता है, बल्कि बिहार के भविष्य की दिशा पर भी चिंता जताता है। क्या गरीबी से जूझते ये दोनों राज्य कभी इस ‘कुर्सी-मोह’ से मुक्त हो पाएंगे? यह जन-मन की बात है, जिसका जवाब भविष्य की गर्त में छिपा है।