क्या आजसू की नाव भंवर में है? BJP की 2029 की तैयारी, कुड़मी ST और सुदेश महतो पर उठे बड़े सवाल

Anand Kumar
10 Min Read

आनंद कुमार

झारखंड की राजनीति में अगले विधानसभा चुनाव यानी 2029 की आहट अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक बिसात पर चालें अभी से दिखाई देने लगी हैं।

आजसू में लगातार हो रहे इस्तीफे, सुदेश महतो को लेकर भाजपा के साथ बढ़ती नजदीकी की अटकलें, कुड़मी समाज को लेकर चल रही राजनीति और झारखंड भाजपा संगठन में आदिवासी नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दिए जाने के बाद कई सवाल एक साथ खड़े हो गये हैं।

सबसे बड़ा सवाल है—

क्या आजसू की राजनीतिक जमीन धीरे-धीरे खिसक रही है?

और क्या भाजपा झारखंड में 2029 के लिए ऐसा सामाजिक और राजनीतिक समीकरण तैयार करने की कोशिश कर रही है, जिसमें आदिवासी और कुड़मी दोनों महत्वपूर्ण हिस्से हों?

आजसू में इस्तीफों का सिलसिला क्यों महत्वपूर्ण?

26 सितंबर को आजसू के केंद्रीय महासचिव हरेलाल महतो ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता और केंद्रीय महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया।

इसके कुछ ही समय बाद केंद्रीय महासचिव रविशंकर मौर्या ने भी पार्टी छोड़ दी।

इसके अलावा सरायकेला-खरसावां जिला उपाध्यक्ष विजय मोदक और चार प्रखंड अध्यक्षों—अरुण महतो, दुर्योधन गोप, तुलसी महतो और गोपेश कुमार महतो—ने भी इस्तीफा दिया।

एक साथ इतने पदाधिकारियों का पार्टी छोड़ना अपने आप में राजनीतिक चर्चा का विषय है।

यहां सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि किसने इस्तीफा दिया।

यह भी देखना होगा कि इस्तीफे किस समय हो रहे हैं और इसके पीछे राजनीतिक परिस्थितियां क्या हैं।

हरेलाल महतो का इस्तीफा क्यों अहम?

हरेलाल महतो ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र से 2019 और 2024 में आजसू के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं।

2019 में उन्हें 38,836 वोट मिले थे, जबकि 2024 में उनका वोट बढ़कर 51,029 हो गया और वे दूसरे स्थान पर रहे।

खास बात यह है कि 2019 में आजसू एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ी थी, जबकि 2024 में हरेलाल महतो एनडीए के उम्मीदवार थे।

यही वजह है कि उनका इस्तीफा सिर्फ संगठनात्मक घटना नहीं माना जा सकता।

ईचागढ़ के साथ-साथ कोल्हान और कुड़मी राजनीति के संदर्भ में भी इसकी अहमियत है।

अब चर्चा यह है कि हरेलाल महतो भाजपा का रुख कर सकते हैं।

हालांकि इसे अभी राजनीतिक अटकल के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

क्या आजसू के नेताओं के लिए बदल रहा है राजनीतिक मौसम?

राजनीति में अक्सर नेता बदलते राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए अपने अगले कदम तय करते हैं।

आजसू से एक साथ कई नेताओं का जाना इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि पार्टी का भाजपा के साथ पुराना गठबंधन संबंध रहा है।

ऐसे में सवाल यह है कि क्या यह केवल व्यक्तिगत राजनीतिक फैसलों की श्रृंखला है या आजसू के भीतर व्यापक असंतोष का संकेत?

और यदि आगे भी पार्टी के नेताओं का भाजपा की ओर जाना जारी रहता है, तो आजसू के सामने अपने स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व को बनाए रखने की चुनौती और बड़ी हो सकती है।

सुदेश महतो और भाजपा की नजदीकी की चर्चा

आजसू अध्यक्ष सुदेश महतो को लेकर भी राजनीतिक अटकलें लगातार तेज हैं।

पुरुलिया के कोड़ाडीह में हुए करम महाजुटान में भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी की मौजूदगी और वहां सुदेश महतो को प्रमुखता दिए जाने को भी इसी राजनीतिक संदर्भ में देखा जा रहा है।

दूसरी तरफ कुड़मी राजनीति में जयराम महतो के उभार ने सुदेश महतो के सामने एक नया राजनीतिक समीकरण खड़ा कर दिया है।

जयराम महतो लगातार सुदेश महतो की राजनीति पर सवाल उठाते रहे हैं और उनका दावा है कि यदि सुदेश महतो ने पिछले दो दशकों में कुड़मी समाज के लिए पर्याप्त काम किया होता तो उनका राजनीतिक उभार नहीं होता। ये जयराम महतो के राजनीतिक आरोप हैं, जिन्हें इसी रूप में देखा जाना चाहिए।

BJP की संगठनात्मक रणनीति में आदिवासी चेहरों की अहमियत

इसी बीच भाजपा ने झारखंड संगठन में दो महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां आदिवासी नेताओं को दी हैं।

मध्य प्रदेश के गजेंद्र सिंह पटेल को झारखंड का प्रदेश प्रभारी बनाया गया है, जबकि छत्तीसगढ़ के पवन साय को संगठन महामंत्री की जिम्मेदारी दी गई है।

गजेंद्र सिंह पटेल आदिवासी समुदाय से आते हैं और मध्य प्रदेश की खरगोन लोकसभा सीट से सांसद हैं। वे भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री भी रह चुके हैं।

पवन साय भी आदिवासी समुदाय से आते हैं और छत्तीसगढ़ तथा पश्चिम बंगाल में संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं।

इसके अलावा सौदान सिंह को झारखंड सहित बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल का क्षेत्रीय संगठन महामंत्री बनाया गया है।

इन नियुक्तियों को भाजपा की संगठनात्मक रणनीति के व्यापक संदर्भ में देखना स्वाभाविक है।

आदिवासी के साथ कुड़मी और सदान समीकरण?

झारखंड में भाजपा की चुनौती केवल आदिवासी राजनीति तक सीमित नहीं है।

राज्य के सामाजिक समीकरण में कुड़मी, वैश्य, सदान और अन्य मूलवासी समूह भी महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं।

ऐसे में भाजपा संगठन में आदिवासी चेहरों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ कुड़मी राजनीति में सुदेश महतो को एक महत्वपूर्ण चेहरे के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करती दिखाई देती है।

कुड़माली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का मुद्दा भी इसी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन रहा है।

क्या 2029 से पहले कुड़मी को ST दर्जा मिल सकता है?

यह इस पूरे राजनीतिक विमर्श का सबसे संवेदनशील और बड़ा सवाल है।

कुड़मी समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग लंबे समय से राजनीति में मौजूद है।

अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या 2029 के चुनाव से पहले इस मुद्दे पर केंद्र की ओर से कोई बड़ा फैसला हो सकता है?

इस विषय में फिलहाल किसी निश्चित फैसले की घोषणा को आधार बनाकर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

लेकिन इतना जरूर है कि यदि कभी कुड़मी को ST दर्जा देने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो उसका प्रभाव केवल कुड़मी समाज तक सीमित नहीं रहेगा।

इसका असर आदिवासी राजनीति, आरक्षण, सामाजिक प्रतिनिधित्व और झारखंड के चुनावी समीकरण पर पड़ सकता है।

यही वजह है कि यह मुद्दा प्रशासनिक प्रक्रिया से आगे बढ़कर राजनीतिक बहस का विषय बन गया है।

अगर भाजपा का सामाजिक समीकरण बनता है तो आजसू का क्या होगा?

यहीं से आजसू के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है।

अगर भाजपा आदिवासी समाज में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करती है और साथ ही कुड़मी समाज में भी अपना आधार बढ़ाती है, तो भाजपा को आजसू जैसे क्षेत्रीय सहयोगी की कितनी राजनीतिक आवश्यकता रह जाएगी?

क्या आजसू NDA की सहयोगी बनी रहेगी?

क्या पार्टी का भाजपा में विलय होगा?

क्या सुदेश महतो भाजपा के साथ जाएंगे?

या आजसू अपने स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए अलग रास्ता चुनेगी?

इन सवालों का जवाब फिलहाल भविष्य के गर्भ में है।

लेकिन आजसू में शुरू हुआ इस्तीफों का सिलसिला इन सवालों को जरूर गंभीर बनाता है।

2029 की तैयारी अभी से?

भाजपा के संगठनात्मक बदलावों, आदिवासी नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देने, सौदान सिंह की वापसी और कुड़मी समाज के बीच राजनीतिक पहुंच बढ़ाने की कोशिशों को एक साथ देखें तो एक बात स्पष्ट दिखाई देती है—

झारखंड में 2029 की राजनीतिक तैयारी अभी से शुरू हो चुकी है।

यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इसका अंतिम राजनीतिक परिणाम क्या होगा।

लेकिन सामाजिक समीकरणों को लेकर राजनीतिक दलों की गतिविधियां आने वाले वर्षों में झारखंड की राजनीति को प्रभावित कर सकती हैं।

और इसी संदर्भ में आजसू में हो रहे इस्तीफों को भी देखना होगा।

क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हरेलाल महतो ने आजसू क्यों छोड़ी।

सवाल यह है कि—

क्या आजसू के सामने अब अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने की चुनौती खड़ी हो गयी है?

राजनीति में मौसम बदलने से पहले हवा बदलती है।

झारखंड की राजनीति में फिलहाल हवा की दिशा बदलती हुई जरूर दिखाई दे रही है।

अब देखना यह है कि 2029 तक यह हवा किस दिशा में जाती है।

और आजसू की नाव…

भंवर से निकलती है या किसी बड़े राजनीतिक जहाज में समा जाती है।

यह भी पढ़ें – झारखंड में परिसीमन: क्या आदिवासी बहुल राज्य में बदल जाएगा चुनावी नक्शा? ST सीटों पर क्या होगा असर

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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