आजसू का BJP में विलय हुआ तो क्या बदलेगा? सुदेश महतो बनाम जयराम महतो से समझिए झारखंड की कुड़मी राजनीति

Anand Kumar
10 Min Read

जमशेदपुर। झारखंड की राजनीति में आजसू पार्टी और भाजपा के रिश्तों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज है। आजसू प्रमुख सुदेश महतो की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात और कुड़मी समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की मांग के बाद इस मुलाकात के राजनीतिक मायने भी तलाशे जा रहे हैं।

हालांकि, आजसू के भाजपा में विलय को लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए फिलहाल इसे संभावित राजनीतिक समीकरण के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

लेकिन अगर भविष्य में आजसू और भाजपा के बीच विलय या कोई बड़ा राजनीतिक समझौता होता है, तो इसका असर सिर्फ सीटों के गणित पर नहीं, बल्कि झारखंड की कुड़मी-महतो राजनीति पर भी पड़ सकता है।

भाजपा को आजसू से सिर्फ वोट नहीं, सुदेश महतो का चेहरा भी मिल सकता है

झारखंड में भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका स्थायी राजनीतिक आधार है। 2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को करीब 33.2 प्रतिशत वोट मिले, जो 2019 के 33.37 प्रतिशत के लगभग बराबर है।

दूसरी ओर आजसू का वोट शेयर 2019 के 8.10 प्रतिशत से घटकर 2024 में करीब 3.54 प्रतिशत रह गया।

यह आंकड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है – अगर आजसू और भाजपा कभी एक राजनीतिक इकाई बनते हैं, तो भाजपा को वास्तव में कितना अतिरिक्त वोट मिलेगा?

इसका सीधा जवाब निकालना आसान नहीं है। आजसू के सभी वोट भाजपा को स्थानांतरित हो जाएंगे, यह मान लेना सही नहीं होगा। लेकिन आजसू के संगठन, क्षेत्रीय नेटवर्क और सुदेश महतो जैसे स्थापित नेता की मौजूदगी भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है।

सुदेश महतो झारखंड की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हैं। वे कम उम्र में विधायक बने, मंत्री रहे और उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। इसलिए भाजपा के नजरिए से उनका महत्व केवल आजसू के मौजूदा वोट प्रतिशत तक सीमित नहीं हो सकता।

2024 में जयराम महतो ने बदला कुड़मी राजनीति का समीकरण

इस कहानी का दूसरा और बेहद महत्वपूर्ण चेहरा जयराम महतो हैं।

2024 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी JLKM ने करीब 6.12 प्रतिशत वोट हासिल किए और एक सीट पर जीत दर्ज की। खास बात यह है कि जयराम महतो ने डुमरी विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर झारखंड की राजनीति में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई।

यह प्रदर्शन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जयराम महतो ने युवा मतदाताओं, रोजगार, स्थानीय पहचान, भाषा और झारखंडी मुद्दों के साथ कुड़मी-महतो सामाजिक आधार को भी राजनीतिक रूप से mobilize किया।

यही वजह है कि आज झारखंड की कुड़मी राजनीति को केवल आजसू या भाजपा के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं होगा।

सुदेश बनाम जयराम नहीं, तीन राजनीतिक ध्रुव

झारखंड में कुड़मी-महतो राजनीति अब एकध्रुवीय नहीं रही है।

एक तरफ भाजपा और आजसू के साथ सुदेश महतो का स्थापित राजनीतिक चेहरा है। दूसरी तरफ जयराम महतो और JLKM ने युवा राजनीति के जरिए नई चुनौती पेश की है।

तीसरा महत्वपूर्ण ध्रुव झामुमो है। झामुमो के पास भी कुड़मी-महतो समाज में राजनीतिक आधार और अपने प्रभावशाली नेता हैं।

इसलिए आने वाले वर्षों में सवाल यह नहीं होगा कि “कुड़मी वोट किसका है?” बल्कि सवाल यह होगा कि इस सामाजिक आधार का कितना हिस्सा किस राजनीतिक दल और किस राजनीतिक नैरेटिव के साथ जाता है।

सुदेश महतो के सामने जयराम महतो की चुनौती

सुदेश महतो की सबसे बड़ी ताकत उनका अनुभव और संगठन है। वे झारखंड की सत्ता और विपक्ष दोनों की राजनीति को करीब से देख चुके हैं।

जयराम महतो की ताकत इसके उलट उनकी युवा छवि, आक्रामक राजनीतिक शैली और नई पीढ़ी के मतदाताओं के बीच उनकी अपील है।

यही अंतर भविष्य की राजनीति में निर्णायक हो सकता है।

जयराम महतो ने 2024 में वोट हासिल करके अपनी ताकत दिखा दी है। अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती इस समर्थन को स्थायी संगठन और ज्यादा विधानसभा सीटों में बदलने की होगी।

वहीं सुदेश महतो के लिए चुनौती यह होगी कि वे अपनी पारंपरिक राजनीति को नई पीढ़ी और बदलते सामाजिक समीकरण के साथ कैसे जोड़ते हैं।

सिल्ली का चुनाव भी देता है महत्वपूर्ण संकेत

2024 में सुदेश महतो सिल्ली विधानसभा सीट से चुनाव हार गए। उन्हें JMM के अमित कुमार ने 23,867 वोटों से हराया।

दिलचस्प बात यह रही कि JLKM के उम्मीदवार देवेंद्र नाथ महतो को 41,725 वोट मिले, जो जीत के अंतर से काफी ज्यादा थे।

इस आंकड़े से इतना जरूर संकेत मिलता है कि JLKM ने सिल्ली जैसे क्षेत्र में चुनावी समीकरण को प्रभावित किया। लेकिन यह कहना कि JLKM के सभी वोट सुदेश महतो को मिल जाते तो वे चुनाव जीत जाते, एक राजनीतिक अनुमान होगा, तथ्य नहीं।

क्योंकि मतदाता किसी एक दल के स्थायी वोट बैंक की तरह व्यवहार नहीं करते।

भाजपा के लिए असली सवाल 2029 का है

भाजपा के सामने झारखंड में चुनौती केवल अपना मौजूदा वोट बचाने की नहीं है। 2019 और 2024 के आंकड़ों को देखें तो भाजपा का वोट प्रतिशत लगभग स्थिर रहा है।

इसके मुकाबले 2024 में झामुमो का वोट शेयर बढ़ा और जयराम महतो की JLKM ने भी महत्वपूर्ण वोट हासिल किए।

ऐसे में भाजपा अगर झारखंड में लंबे समय की राजनीतिक रणनीति बनाती है तो उसे दो चीजों की जरूरत होगी—संगठन और एक मजबूत क्षेत्रीय चेहरा।

यहीं सुदेश महतो की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

अगर आजसू और भाजपा के बीच भविष्य में विलय या कोई बड़ा राजनीतिक समझौता होता है और सुदेश महतो को केवल एक सहयोगी दल के नेता के तौर पर नहीं, बल्कि झारखंड भाजपा के संभावित बड़े क्षेत्रीय चेहरे के रूप में विकसित किया जाता है, तो इसका असर लंबे समय तक दिखाई दे सकता है।

लेकिन क्या इससे जयराम महतो की चुनौती खत्म हो जाएगी?

शायद नहीं।

यही इस पूरे राजनीतिक समीकरण का सबसे दिलचस्प हिस्सा है।

सुदेश महतो का भाजपा के साथ जाना भाजपा को संगठन, अनुभव और एक स्थापित कुड़मी-महतो चेहरा दे सकता है। लेकिन जयराम महतो की राजनीति की ताकत केवल जातीय पहचान नहीं है।

उनकी राजनीति में युवा, रोजगार, स्थानीयता और झारखंडी अस्मिता जैसे मुद्दे भी जुड़े हैं।

इसलिए सुदेश महतो के भाजपा के साथ आने के बावजूद जयराम महतो के सामने राजनीतिक जमीन पूरी तरह खत्म हो जाएगी, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी।

कुड़मी ST की मांग भी बन सकती है बड़ा राजनीतिक मुद्दा

सुदेश महतो ने अमित शाह के साथ मुलाकात में कुड़मी समुदाय को ST सूची में शामिल करने की मांग भी उठाई है।

यह मांग झारखंड तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भी कुड़मी समुदाय की ओर से लंबे समय से ST दर्जे की मांग को लेकर आंदोलन होते रहे हैं।

इसलिए आने वाले समय में कुड़मी ST का मुद्दा भी झारखंड की राजनीति में महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।

हालांकि ST दर्जे का सवाल संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा है। इसलिए किसी राजनीतिक मुलाकात या मांग को तत्काल निर्णय के रूप में देखना सही नहीं होगा।

2029 से पहले बन सकता है बड़ा राजनीतिक समीकरण

अगर आजसू और भाजपा के बीच भविष्य में कोई बड़ा फैसला होता है, तो उसका सबसे बड़ा असर तीन स्तरों पर देखने को मिल सकता है।

पहला – भाजपा को एक स्थापित क्षेत्रीय चेहरा मिल सकता है।

दूसरा – कुड़मी-महतो राजनीति में सुदेश महतो और जयराम महतो के बीच सीधी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज हो सकती है।

और तीसरा – झामुमो के सामने भी अपने कुड़मी-महतो सामाजिक आधार को बनाए रखने की चुनौती बढ़ सकती है।

यानी झारखंड की राजनीति में आने वाले वर्षों की लड़ाई सिर्फ BJP बनाम JMM नहीं होगी।

कई सीटों पर मुकाबला इस बात से भी तय हो सकता है कि कुड़मी-महतो समाज के भीतर किस राजनीतिक नैरेटिव को ज्यादा समर्थन मिलता है।

सुदेश महतो का अनुभव बनाम जयराम महतो की युवा राजनीति और इनके बीच झामुमो का अपना सामाजिक समीकरण।

यही 2029 से पहले झारखंड की राजनीति की सबसे दिलचस्प तस्वीरों में से एक हो सकती है।

यह भी पढ़ें – अमित शाह से मिले सुदेश महतो, कुड़मी को ST दर्जा देने की मांग फिर तेज

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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