शशि सिंह
- कांग्रेस के साथ गठबंधन, लेकिन राजनीतिक विलय नहीं
- BJP का विरोध, लेकिन कांग्रेस पर निर्भरता क्यों?
- झारखंड की राजनीति राष्ट्रीय विमर्श को नई दिशा दे सकती है
- तीसरा मोर्चा नहीं, INDIA गठबंधन के भीतर अलग राजनीतिक जगह की तलाश?
- 2029 की परीक्षा: क्या JMM क्षेत्रीय ताकत से राष्ट्रीय प्रभाव वाली पार्टी बन सकेगी?
- निष्कर्ष: राहुल गांधी के साथ रहकर भी अपनी अलग पहचान बनाए रखना चाहते हैं हेमंत?
दिल्ली में 31 अक्टूबर को INDIA गठबंधन की मॉक पार्लियामेंट की तस्वीरों में हेमंत सोरेन राहुल गांधी के बगल में प्रमुखता से बैठे नजर आए। लेकिन अगले दिन रामलीला मैदान की ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली में उनकी सार्वजनिक मौजूदगी उतनी प्रमुख नहीं दिखी। इन दोनों तस्वीरों के बीच झारखंड की राजनीति से जुड़ा एक बड़ा सवाल छिपा है। क्या हेमंत सोरेन राष्ट्रीय विपक्षी राजनीति में केवल एक क्षेत्रीय सहयोगी की भूमिका से संतुष्ट हैं, या वे झारखंड से बाहर भी अपनी एक स्वतंत्र राजनीतिक पहचान और प्रभाव स्थापित करना चाहते हैं?
इस सवाल का जवाब शायद INDIA गठबंधन से उनकी दूरी में नहीं, बल्कि गठबंधन के भीतर वे जिस राजनीतिक जगह की तलाश कर रहे हैं, उसमें छिपा है।
कांग्रेस के साथ गठबंधन, लेकिन राजनीतिक विलय नहीं
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और कांग्रेस का संबंध केवल चुनावी जरूरतों से बना राजनीतिक समझौता नहीं है। दोनों दल 2019 के झारखंड विधानसभा चुनाव से पहले एक साथ आए थे। राहुल गांधी और हेमंत सोरेन ने गठबंधन को लेकर राजनीतिक पहल की थी। इसी गठबंधन ने राज्य में सरकार बनाने का आधार तैयार किया। 2024 के विधानसभा चुनाव में भी यह साझेदारी जारी रही।
हेमंत सोरेन के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन राष्ट्रीय राजनीतिक मंच, संसद में प्रभाव और व्यापक विपक्षी नेटवर्क तक पहुंचने का माध्यम है। वहीं कांग्रेस के लिए JMM झारखंड में एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय सहयोगी है। ऐसा राज्य, जहां आदिवासी पहचान, जमीन के अधिकार और प्राकृतिक संसाधनों की राजनीति चुनावी नतीजों को प्रभावित करती है।
लेकिन गठबंधन का मतलब राजनीतिक अधीनता नहीं होता।
JMM का अपना इतिहास, अपना जनाधार और अपनी वैचारिक जमीन है। पार्टी का जन्म अलग झारखंड राज्य के आंदोलन से हुआ। आदिवासी अस्मिता, जमीन, जंगल, खनिज संसाधनों और क्षेत्रीय स्वायत्तता के संघर्ष ने इसकी राजनीतिक पहचान बनाई। इस विरासत का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा शिबू सोरेन रहे हैं।
इसलिए JMM की राजनीतिक पहचान कांग्रेस से स्वतंत्र है। हेमंत सोरेन के लिए इस पहचान को बचाए रखना केवल राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि चुनावी जरूरत भी है।
JMM को एक बराबर के राजनीतिक साझेदार के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि राष्ट्रीय गठबंधन में शामिल किसी क्षेत्रीय सहयोगी दल के रूप में।
BJP का विरोध, लेकिन कांग्रेस पर निर्भरता क्यों?
झारखंड में JMM और भाजपा के बीच राजनीतिक संघर्ष को लेकर कोई अस्पष्टता नहीं है। दोनों दल आदिवासी अधिकारों, जमीन, अस्मिता और राजनीतिक-आर्थिक शक्ति के बंटवारे जैसे मुद्दों पर अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण रखते हैं।
लेकिन भाजपा का विरोध करने का अर्थ यह नहीं है कि हेमंत सोरेन को कांग्रेस की हर राजनीतिक प्राथमिकता और रणनीति के साथ खड़ा होना पड़े।
हेमंत सोरेन की राजनीति का केंद्र झारखंड है। राज्य के खनिज संसाधन, रॉयल्टी, केंद्र से मिलने वाली वित्तीय हिस्सेदारी, आदिवासी कल्याण, रोजगार और स्थानीय समुदायों के अधिकार ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर मुख्यमंत्री का केंद्र सरकार से टकराव हो सकता है। यह टकराव इस बात पर निर्भर नहीं करता कि केंद्र में किस पार्टी की सरकार है।
एक मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें केंद्र सरकार के साथ वित्तीय आवंटन, बुनियादी ढांचे, कल्याणकारी योजनाओं और संवैधानिक जिम्मेदारियों को लेकर संवाद करना ही होगा।
ऐसे संवाद को अपने आप राजनीतिक समझौता नहीं माना जा सकता। इसी तरह झारखंड के हितों की बात करने के लिए विपक्षी गठबंधन छोड़ना भी जरूरी नहीं है।
हेमंत सोरेन के सामने असली चुनौती दोनों भूमिकाओं के बीच संतुलन बनाने की है। एक तरफ कांग्रेस के साथ राजनीतिक साझेदारी और दूसरी तरफ उन मुद्दों पर स्वतंत्र रुख, जहां झारखंड के हितों की रक्षा करना जरूरी हो।
हालांकि, राजनीतिक स्वतंत्रता केवल बयानों से साबित नहीं होती। इसके लिए लगातार एक जैसी राजनीतिक प्रतिबद्धता और जमीन पर दिखाई देने वाले परिणाम भी जरूरी हैं। यदि झारखंड के हितों की बात केवल राजनीतिक सुविधा के अनुसार उठाई जाती है, तो स्वतंत्र क्षेत्रीय पहचान का दावा कमजोर पड़ सकता है।
झारखंड की राजनीति राष्ट्रीय विमर्श को नई दिशा दे सकती है
हेमंत सोरेन की राष्ट्रीय राजनीति में प्रासंगिकता इस बात से तय होगी कि वे अपने राज्य के हितों और समस्याओं को कितनी प्रभावी तरीके से राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाते हैं।
झारखंड केवल INDIA गठबंधन के चुनावी गणित का एक राज्य नहीं है। यहां ऐसे सवाल मौजूद हैं, जिनका राष्ट्रीय महत्व है।
प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार किसका हो? खनिज संपदा वाले राज्यों को उनके संसाधनों के बदले कितना आर्थिक लाभ मिलना चाहिए? आदिवासी समुदायों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा कैसे हो? विकास और जमीन-जंगल के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?
ये सवाल केवल झारखंड तक सीमित नहीं हैं। ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कई आदिवासी और खनिज संपदा वाले क्षेत्रों में भी इसी तरह की चुनौतियां मौजूद हैं।
हेमंत सोरेन के पास इन मुद्दों के आधार पर राष्ट्रीय राजनीति में एक अलग भूमिका विकसित करने का अवसर है।
वे केवल विपक्षी रैलियों में शामिल होने या कांग्रेस नेतृत्व का समर्थन करने तक अपनी भूमिका सीमित रखने के बजाय संसाधनों के संघवाद, आदिवासी अधिकारों और खनिज संपदा वाले राज्यों के आर्थिक अधिकारों पर एक स्पष्ट राजनीतिक दृष्टिकोण सामने रख सकते हैं।
नीति आयोग जैसी राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ उनकी भागीदारी भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। झारखंड के लंबित वित्तीय दावों के निपटारे की उनकी मांग इस बात का उदाहरण है कि राज्य के सवाल किस तरह केंद्र-राज्य संबंधों की व्यापक बहस का हिस्सा बन सकते हैं।
हालांकि, ऐसी मांगों का मूल्यांकन केवल राजनीतिक बयानबाजी के आधार पर नहीं होना चाहिए। उनके पीछे दस्तावेजी आधार, वित्तीय औचित्य और उसके बाद की कार्रवाई भी महत्वपूर्ण है।
राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी भूमिका के लिए केवल मांग उठाना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए दूसरे राज्यों के साथ साझा मुद्दों पर सहमति बनानी होगी और यह साबित करना होगा कि झारखंड की समस्याएं देश के संघीय ढांचे से जुड़ी हुई हैं।
यह एक ऐसा राजनीतिक अवसर है, जिसका हेमंत सोरेन अभी पूरी तरह उपयोग नहीं कर पाए हैं।
तीसरा मोर्चा नहीं, INDIA गठबंधन के भीतर अलग राजनीतिक जगह की तलाश?
हेमंत सोरेन की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को तीसरा राजनीतिक मोर्चा बनाने की कोशिश के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।
JMM अभी भी INDIA गठबंधन का हिस्सा है। पार्टी की ओर से इस गठबंधन को छोड़ने का कोई स्पष्ट संकेत नहीं है।
अधिक संभावित व्याख्या यह है कि हेमंत सोरेन विपक्षी गठबंधन के भीतर अपनी एक अलग राजनीतिक जगह चाहते हैं।
इसका मतलब भाजपा और कांग्रेस से समान दूरी बनाना नहीं है। JMM कांग्रेस के साथ गठबंधन में है और झारखंड में भाजपा की प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी है। लेकिन हेमंत सोरेन शायद नहीं चाहते कि उनकी राजनीतिक पहचान पूरी तरह किसी एक राष्ट्रीय दल के इर्द-गिर्द परिभाषित हो।
क्षेत्रीय दलों के सामने हमेशा एक मुश्किल राजनीतिक स्थिति रहती है। राष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रभाव गठबंधन के माध्यम से बढ़ता है, लेकिन राज्य में उनकी विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि वे अपने राजनीतिक हितों की स्वतंत्र रूप से रक्षा कर पाते हैं या नहीं।
किसी राष्ट्रीय दल पर अत्यधिक निर्भरता क्षेत्रीय दल की स्वतंत्र राजनीतिक अपील को कमजोर कर सकती है। वहीं, राष्ट्रीय गठबंधन से बहुत अधिक दूरी बनाने पर राष्ट्रीय स्तर के फैसलों में उसका प्रभाव कम हो सकता है।
हालांकि, हेमंत सोरेन की इस राजनीतिक स्थिति की एक दूसरी व्याख्या भी हो सकती है। मुख्यमंत्री होने के नाते झारखंड के हितों की बात करना उनकी संवैधानिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी है। राज्य के विशेष आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को उठाने के लिए हर बार किसी बड़ी राष्ट्रीय रणनीति की जरूरत नहीं होती।
फिर भी इस स्थिति में एक राजनीतिक अवसर मौजूद है। हेमंत सोरेन चाहें तो राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को राष्ट्रीय राजनीति में एक व्यापक विमर्श का आधार बना सकते हैं।
2029 की परीक्षा: क्या JMM क्षेत्रीय ताकत से राष्ट्रीय प्रभाव वाली पार्टी बन सकेगी?
आने वाले वर्षों में JMM के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह झारखंड में मिले अपने क्षेत्रीय जनादेश को राष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रभाव में कैसे बदलती है, और इस प्रक्रिया में अपनी झारखंड-केंद्रित राजनीतिक पहचान को कैसे बचाए रखती है।
JMM की ऐतिहासिक विरासत और झारखंड का विशिष्ट राजनीतिक अनुभव उसे एक मजबूत आधार देते हैं। लेकिन केवल इतिहास के सहारे क्षेत्रीय नेतृत्व लंबे समय तक कायम नहीं रह सकता।
सरकार को यह भी दिखाना होगा कि अस्मिता और क्षेत्रीय अधिकारों की राजनीति का लाभ आम लोगों तक पहुंच रहा है या नहीं।
बेहतर सार्वजनिक सेवाएं, रोजगार के अवसर, मजबूत स्थानीय संस्थाएं और प्राकृतिक संसाधनों से पैदा होने वाली संपदा का न्यायसंगत वितरण ऐसे परिणाम हैं, जिनके आधार पर सरकार की राजनीति का मूल्यांकन होगा।
यदि इन क्षेत्रों में ठोस परिणाम सामने नहीं आते, तो क्षेत्रीय अधिकारों और अस्मिता की राजनीति केवल चुनावी नारे तक सीमित रह सकती है।
INDIA गठबंधन को ऐसे क्षेत्रीय नेताओं की जरूरत है, जो केवल चुनावी आंकड़े न दें, बल्कि अपने साथ अलग सामाजिक आधार, क्षेत्रीय दृष्टिकोण और संघीय ढांचे से जुड़े सवाल भी लेकर आएं।
हेमंत सोरेन इस भूमिका में योगदान दे सकते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता और अलग पहचान कायम रखनी होगी।
निष्कर्ष: राहुल गांधी के साथ रहकर भी अपनी अलग पहचान बनाए रखना चाहते हैं हेमंत?
आखिरकार सवाल यह नहीं है कि हेमंत सोरेन राहुल गांधी के कितने करीब हैं या कांग्रेस से कितनी दूरी बनाए रखना चाहते हैं।
असली सवाल यह है कि क्या वे झारखंड की जमीन से निकली अपनी राजनीतिक पहचान को राष्ट्रीय राजनीति में भी प्रभावशाली बना सकते हैं?
उनकी सबसे विश्वसनीय राष्ट्रीय भूमिका न तो किसी राष्ट्रीय पार्टी की छाया में एक और क्षेत्रीय नेता बनने में है और न ही विपक्ष से अलग कोई नया मोर्चा खड़ा करने में।
बल्कि उनकी भूमिका एक ऐसे क्षेत्रीय राजनीतिक नेतृत्व की हो सकती है, जो विपक्ष के साथ मिलकर काम करे, लेकिन अपने राज्य के हितों पर स्वतंत्र रूप से बोलने और फैसले लेने की राजनीतिक आजादी भी बनाए रखे।
हेमंत सोरेन की राजनीतिक महत्वाकांक्षा शायद INDIA गठबंधन से दूर जाना नहीं है और न ही उसमें पूरी तरह समा जाना।
उनके सामने चुनौती है कि वे गठबंधन के साझेदार बने रहें, लेकिन उसके अधीनस्थ न बनें। साथ ही झारखंड की आवाज को राष्ट्रीय राजनीति में उसकी अपनी शर्तों और प्राथमिकताओं के साथ प्रभावी तरीके से उठा सकें।
कांग्रेस के साथ साझेदारी और झारखंड की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान के बीच यही संतुलन हेमंत सोरेन की राष्ट्रीय राजनीति में आगे की भूमिका तय कर सकता है।

शशि सिंह
(संपादक, झारखंड इन्कॉर्पोरेशन)
शशि सिंह एक अनुभवी पत्रकार हैं। मुंबई और झारखंड में रिपोर्टिंग, कहानी कहने और मीडिया के क्षेत्र में बिताए वर्षों ने उनकी पहचान गढ़ी है। पत्रकारिता, मीडिया रणनीति और कंटेंट निर्माण में उनका अनुभव प्रिंट, डिजिटल और टेलीविजन, तीनों माध्यमों तक फैला है। महानगरों के मीडिया तंत्र की समझ और झारखंड जैसे हृदय-प्रदेश की ज़मीनी सच्चाइयों से जुड़ाव, दोनों उनके नज़रिए का हिस्सा हैं। अब अपने गृह राज्य लौटकर वे एक ऐसा मंच तैयार करने में जुटे हैं, जो झारखंड की आर्थिक तस्वीर, कारोबारी जगत की आवाज़ों और विकास की आकांक्षाओं को सामने रखे। झारखंड इन्कॉर्पोरेशन के ज़रिए वे उद्योग, उद्यमिता, नीति और विकास से जुड़ी बहसों में स्पष्टता, गहराई और जवाबदेही लाना चाहते हैं। यह काम देश के उस हिस्से में हो रहा है, जो संसाधनों में सबसे समृद्ध होने के बावजूद मीडिया की नज़र में सबसे कम आता है।
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