ब्रज मोहन राम की राज्यपाल नियुक्ति: झारखंड में दलित राजनीति का नया दांव या प्रतिनिधित्व का संदेश?

Anand Kumar
16 Min Read

आनंद कुमार

विगत 12 अक्टूबर को ब्रज मोहन राम को ओडिशा का राज्यपाल बनाया गया। अगले ही दिन भाजपा के अनुसूचित जाति मोर्चे को सक्रिय करने और पार्टी के लिए अधिक वोट जुटाने से जुड़ी उनकी टिप्पणी ने संवैधानिक पद की मर्यादा पर सवाल खड़े कर दिए। झारखंड के संदर्भ में यह नियुक्ति इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि 2024 के विधानसभा चुनाव में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर भाजपा की संख्या छह से घटकर तीन रह गई थी। वहीं, झामुमो के बैद्यनाथ राम राज्यसभा पहुंच चुके हैं और कांग्रेस के राधाकृष्ण किशोर राज्य के वित्त मंत्री हैं। क्या इन घटनाओं के पीछे झारखंड में दलित प्रतिनिधित्व की व्यापक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है?

राज्यपाल की नियुक्ति और भाजपा के लिए वोट बढ़ाने का बयान

ब्रज मोहन राम की ओडिशा के राज्यपाल के रूप में नियुक्ति को भाजपा के एक पुराने नेता को मिला सम्मान माना जा सकता है। लेकिन नियुक्ति के अगले दिन उनके बयान ने इस घटनाक्रम को एक अलग राजनीतिक संदर्भ दे दिया।

मीडिया से बातचीत में उन्होंने ओडिशा में भाजपा के अनुसूचित जाति मोर्चे को सक्रिय करने और पार्टी के पक्ष में अधिक वोट हासिल करने की बात कही। इस टिप्पणी पर बीजू जनता दल ने आपत्ति जताई और इसे राज्यपाल के पद के अनुरूप नहीं बताया।

विवाद का मूल प्रश्न स्पष्ट है। राज्यपाल एक संवैधानिक पद है, जिससे राजनीतिक निष्पक्षता और संस्थागत मर्यादा की अपेक्षा की जाती है। किसी राजनीतिक दल के लिए वोट बढ़ाने की बात इस भूमिका के संदर्भ में सवाल पैदा करती है।

ब्रज मोहन राम का भाजपा से पुराना जुड़ाव अपनी जगह है। लेकिन संवैधानिक पद संभालने के बाद सार्वजनिक आचरण की कसौटी अलग होती है। गरीबों और वंचितों के कल्याण की बात करना तथा किसी खास राजनीतिक दल के लिए वोट जुटाने की बात करना दो अलग विषय हैं।

यही वजह है कि उनकी नियुक्ति पर चर्चा केवल राजनीतिक सम्मान तक सीमित नहीं रही। यह संवैधानिक पदों और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के बीच की सीमा से भी जुड़ गई है।

भाजपा के लिए दलित राजनीति क्यों महत्वपूर्ण है?

भारतीय राजनीति में दलित मतदाता किसी एक दल के स्थायी समर्थक नहीं हैं। अलग-अलग राज्यों, जातियों और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उनकी राजनीतिक प्राथमिकताएं बदलती रही हैं। यही कारण है कि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल दलित समुदायों के बीच अपने संगठन, नेतृत्व और राजनीतिक संदेश को मजबूत करने की कोशिश करते हैं।

2024 के लोकसभा चुनाव के बाद संविधान, आरक्षण और डॉ. भीमराव आंबेडकर से जुड़े मुद्दे राजनीतिक बहस के केंद्र में रहे। विपक्ष ने संविधान और आरक्षण को लेकर भाजपा पर सवाल उठाए, जबकि भाजपा ने विभिन्न सामाजिक समूहों तक अपनी पहुंच बनाए रखने की कोशिश की।

इस पृष्ठभूमि में दलित नेताओं को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किए जाने का राजनीतिक और प्रतीकात्मक महत्व है। ऐसे फैसले संगठन के कार्यकर्ताओं और संबंधित समुदायों को प्रतिनिधित्व का संदेश दे सकते हैं।

हालांकि, किसी नेता की नियुक्ति को अपने आप किसी व्यापक चुनावी रणनीति का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसके वास्तविक राजनीतिक प्रभाव को समझने के लिए संगठनात्मक गतिविधियों, नीतियों, स्थानीय नेतृत्व और चुनावी परिणामों को साथ देखना होगा।

प्रतिनिधित्व राजनीतिक संदेश देता है, लेकिन स्थायी जनसमर्थन के लिए सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर काम भी जरूरी है।

झारखंड में दलित राजनीति का महत्व

झारखंड की राजनीति को अक्सर आदिवासी अस्मिता, जल-जंगल-जमीन और क्षेत्रीय पहचान के संदर्भ में समझा जाता है। लेकिन राज्य का राजनीतिक परिदृश्य इससे कहीं व्यापक है। दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय भी चुनावी समीकरणों और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार, झारखंड में अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 39.86 लाख थी, जो उस समय राज्य की कुल आबादी का करीब 12.08 प्रतिशत थी। ये 2011 के आंकड़े हैं, वर्तमान आबादी का सटीक अनुमान नहीं।

इस जनसांख्यिकीय आधार को देखते हुए दलित राजनीति को राज्य के व्यापक राजनीतिक विमर्श से अलग नहीं किया जा सकता। आरक्षित विधानसभा सीटों के अलावा सामान्य सीटों पर भी दलित मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

भाजपा, झामुमो और कांग्रेस के लिए चुनौती केवल दलित नेताओं को पद देना नहीं, बल्कि समुदाय के भीतर संगठनात्मक आधार मजबूत करना और स्थानीय समस्याओं पर प्रभावी ढंग से काम करना भी है।

पलामू क्यों बना राजनीतिक चर्चा का केंद्र?

ब्रज मोहन राम का राजनीतिक आधार पलामू रहा है। झामुमो के बैद्यनाथ राम और कांग्रेस के राधाकृष्ण किशोर भी इसी व्यापक क्षेत्र की राजनीति से जुड़े रहे हैं। तीनों नेताओं की अलग-अलग राजनीतिक भूमिकाएं हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी पलामू के महत्व को रेखांकित करती है।

2011 की जनगणना के अनुसार, पलामू जिले की लगभग 27.65 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जाति की थी। पलामू लोकसभा सीट 1967 से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। भाजपा के विष्णु दयाल राम इस सीट से लगातार तीन बार जीत चुके हैं।

इन तथ्यों से पलामू में दलित प्रतिनिधित्व की राजनीतिक अहमियत समझी जा सकती है। हालांकि, किसी क्षेत्र की जनसांख्यिकी अपने आप चुनावी नतीजों की व्याख्या नहीं करती। उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे, गठबंधन और सरकार के काम जैसे कारक भी परिणामों को प्रभावित करते हैं।

लोकसभा चुनाव में किसी पार्टी की सफलता का अर्थ यह भी नहीं कि विधानसभा चुनाव में उसे वैसी ही सफलता मिलेगी। दोनों चुनावों के मुद्दे और मतदाताओं की प्राथमिकताएं अलग हो सकती हैं।

इसलिए पलामू में भाजपा की स्थिति का आकलन करते समय लोकसभा के नतीजों के साथ विधानसभा चुनावों और स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों को भी देखना होगा।

आरक्षित सीटों पर भाजपा की जीत छह से तीन रह गई

झारखंड विधानसभा में अनुसूचित जाति के लिए नौ सीटें आरक्षित हैं। 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इनमें से छह सीटों पर जीत हासिल की थी। 2024 में उसकी जीत घटकर तीन सीटों पर रह गई।

यह बदलाव भाजपा के लिए राजनीतिक समीक्षा का विषय है। हालांकि, केवल इन नौ सीटों के आधार पर पूरे राज्य के दलित मतदाताओं के मतदान व्यवहार के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। दलित मतदाता सामान्य सीटों पर भी चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।

फिर भी, आरक्षित सीटों पर भाजपा की सीटें आधी रह जाना एक महत्वपूर्ण चुनावी तथ्य है। इसकी वजह समझने के लिए प्रत्येक सीट के परिणाम, उम्मीदवारों की स्थिति, विपक्षी गठबंधन की रणनीति और स्थानीय मुद्दों का अलग-अलग अध्ययन जरूरी है।

क्या उम्मीदवारों के चयन में चूक हुई? क्या विपक्षी गठबंधन का तालमेल अधिक प्रभावी रहा? क्या स्थानीय नाराजगी ने भूमिका निभाई? या कुछ क्षेत्रों में सामाजिक समीकरण बदले?

इन सवालों का जवाब विस्तृत चुनावी विश्लेषण से ही मिल सकता है। लेकिन भाजपा के लिए यह स्पष्ट है कि उसे अपने पिछले प्रदर्शन की समीक्षा करनी होगी।

ब्रज मोहन राम जैसे वरिष्ठ दलित नेता को राज्यपाल बनाना प्रतिनिधित्व का संदेश दे सकता है। हालांकि, इस नियुक्ति को आरक्षित सीटों पर पार्टी के प्रदर्शन में बदलाव का सीधा समाधान मानना जल्दबाजी होगी।

ब्रज मोहन राम: पुराने राजनीतिक चेहरे की वापसी

ब्रज मोहन राम का राजनीतिक सफर कई दशकों में फैला है। वह बिहार में 1991 से 1995 तक विधायक रहे। इसके बाद 1996 से 2004 तक लगातार तीन बार पलामू से लोकसभा के लिए चुने गए। झारखंड में भाजपा के अनुसूचित जाति मोर्चे की राजनीति में भी उनकी भूमिका रही।

2004 के बाद वह लोकसभा चुनाव जीतने में सफल नहीं हुए। 2009 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने के बावजूद उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बाद राष्ट्रीय राजनीति में उनकी सक्रियता पहले की तुलना में कम दिखाई दी।

राज्यपाल के रूप में उनकी नियुक्ति को लंबे राजनीतिक अनुभव वाले नेता को मिला सम्मान माना जा सकता है। इससे भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं को संगठन में लंबे समय तक काम करने का संदेश भी मिल सकता है।

साथ ही, यह नियुक्ति दलित प्रतिनिधित्व के नजरिए से महत्वपूर्ण है। लेकिन नियुक्ति के वास्तविक राजनीतिक प्रभाव को समझने के लिए यह देखना होगा कि क्या इससे पार्टी के संगठनात्मक ढांचे, नेतृत्व और स्थानीय राजनीतिक गतिविधियों में भी कोई बदलाव आता है।

राज्यपाल का पद और राजनीतिक निष्पक्षता

ब्रज मोहन राम के बयान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू संवैधानिक पद की मर्यादा है।

राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है। इस पद से अपेक्षा की जाती है कि उसका आचरण राजनीतिक दलों के बीच निष्पक्षता और संस्थागत संतुलन की भावना के अनुरूप हो।

ऐसे में किसी पार्टी के अनुसूचित जाति मोर्चे को सक्रिय करने और उसके लिए वोट बढ़ाने की बात राजनीतिक विवाद पैदा कर सकती है। बीजू जनता दल की आपत्ति इसी संदर्भ में सामने आई।

इस मामले में दो बातों को अलग रखना जरूरी है। किसी राजनीतिक दल से जुड़े व्यक्ति का राज्यपाल बनना अपने आप में विवाद का आधार नहीं है। लेकिन पद संभालने के बाद उसकी सार्वजनिक टिप्पणियां और गतिविधियां संवैधानिक भूमिका के अनुरूप होनी चाहिए।

इसलिए बहस का केंद्र ब्रज मोहन राम की राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि राज्यपाल के रूप में उनकी भूमिका और सार्वजनिक बयान के बीच का संबंध होना चाहिए।

झामुमो और कांग्रेस की भूमिका भी महत्वपूर्ण

झारखंड में दलित प्रतिनिधित्व की चर्चा भाजपा तक सीमित नहीं है।

जून 2026 के राज्यसभा चुनाव में झामुमो के बैद्यनाथ राम की जीत ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में प्रतिनिधित्व दिया। इसी चुनाव में भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवाणी भी जीते, जबकि कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा को हार का सामना करना पड़ा।

राज्यसभा चुनाव के नतीजों को केवल सामाजिक प्रतिनिधित्व के आधार पर नहीं समझा जा सकता। इसमें राजनीतिक गठबंधन, विधायकों की संख्या और चुनावी रणनीति की भी भूमिका थी।

दूसरी ओर, कांग्रेस के राधाकृष्ण किशोर झारखंड सरकार में वित्त मंत्री हैं। उनका राजनीतिक आधार भी पलामू क्षेत्र से जुड़ा रहा है।

इस तरह भाजपा, झामुमो और कांग्रेस के प्रमुख नेताओं की भूमिकाएं पलामू और दलित प्रतिनिधित्व की चर्चा को महत्वपूर्ण बनाती हैं। हालांकि, तीनों पदों की प्रकृति अलग है और उन्हें एक ही राजनीतिक पैमाने पर नहीं रखा जा सकता।

महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इन नियुक्तियों और राजनीतिक जिम्मेदारियों का असर संबंधित दलों के संगठन तथा समुदाय की समस्याओं के समाधान पर कितना पड़ता है।

क्या दलित नेतृत्व को केवल महत्वपूर्ण पदों पर जगह मिल रही है, या निर्णय लेने की प्रक्रिया और स्थानीय संगठन में भी उसकी भागीदारी बढ़ रही है? यह सवाल सभी दलों से पूछा जाना चाहिए।

क्या पलामू दलित राजनीति की प्रयोगशाला बन सकता है?

पलामू में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित लोकसभा सीट के अलावा विधानसभा में छतरपुर और लातेहार जैसी आरक्षित सीटें भी हैं। इस कारण क्षेत्र में दलित प्रतिनिधित्व का सवाल राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

भाजपा के लिए चुनौती अपने पुराने जनाधार को बनाए रखने और संगठन को मजबूत करने की है। झामुमो और कांग्रेस के सामने भी दलित समुदायों के बीच अपने नेतृत्व तथा राजनीतिक आधार को मजबूत करने का सवाल है।

इसके लिए तीन पहलू महत्वपूर्ण होंगे।

पहला, दलित नेताओं को संगठन में वास्तविक जिम्मेदारी और निर्णय लेने के अवसर मिलें।

दूसरा, शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, सरकारी योजनाओं तक पहुंच और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर ठोस काम हो।

तीसरा, चुनावी परिणामों का विश्लेषण जातीय समीकरणों तक सीमित न रहे। उम्मीदवारों की भूमिका, स्थानीय असंतोष, गठबंधन और शासन के प्रदर्शन को भी समझा जाए।

पलामू को दलित राजनीति की प्रयोगशाला कहना फिलहाल एक विश्लेषणात्मक संभावना है, स्थापित तथ्य नहीं। लेकिन क्षेत्र की जनसांख्यिकी, आरक्षित सीटों और विभिन्न दलों के नेताओं की मौजूदगी इसे राजनीतिक अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण बनाती है।

पदों से आगे बढ़कर भरोसे की राजनीति

ब्रज मोहन राम की राज्यपाल नियुक्ति, बैद्यनाथ राम का राज्यसभा पहुंचना और राधाकृष्ण किशोर का वित्त मंत्री होना झारखंड में दलित प्रतिनिधित्व की चर्चा को एक नया संदर्भ देते हैं।

भाजपा के लिए 2024 के विधानसभा चुनाव में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर छह से तीन तक पहुंचना आत्ममंथन का विषय है। वहीं झामुमो और कांग्रेस के लिए भी चुनौती यह है कि वे प्रतिनिधित्व को संगठनात्मक भागीदारी और सामाजिक मुद्दों पर काम से कैसे जोड़ते हैं।

ब्रज मोहन राम की नियुक्ति को भाजपा की दलित राजनीति के संदर्भ में देखा जा सकता है, लेकिन इसके पीछे किसी विशिष्ट चुनावी उद्देश्य की पुष्टि के लिए अतिरिक्त प्रमाण जरूरी होंगे। इसी तरह किसी नेता को पद मिलने से पूरे समुदाय के राजनीतिक समर्थन का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

राजनीति में पद प्रतिनिधित्व का संदेश देता है। लेकिन स्थायी भरोसा संगठन, नीतियों, सामाजिक सम्मान और जमीनी काम से बनता है।

झारखंड की दलित राजनीति को अब केवल आदिवासी राजनीति के सहायक संदर्भ में देखने के बजाय राज्य की व्यापक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के हिस्से के रूप में समझने की जरूरत है। आने वाले समय में भाजपा, झामुमो और कांग्रेस इस चुनौती का सामना किस तरह करते हैं, यही इस राजनीतिक बहस का महत्वपूर्ण पहलू होगा।

यह भी पढ़ें –श्वेता शर्मा को मंत्री बनाया जायेगा तो सोमेश सोरेन को क्यों नहीं बनाया? हेमंत सोरेन पर उठ रहे बड़े सवाल

Share This Article
Follow:
वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *