झारखंड DGP नियुक्ति मामले में SC में सुनवाई टली, अब 7 सितंबर को होगी सुनवाई
रांची : झारखंड के डीजीपी की नियुक्ति से जुड़े मामले में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई नहीं हो सकी। सुनवाई के दौरान झारखंड सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि उन्हें कोर्ट द्वारा नियुक्त Amicus Curiae की रिपोर्ट नहीं मिली है, इसलिए वह फिलहाल मामले में अपना पक्ष रखने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने रिपोर्ट उपलब्ध कराने और सुनवाई सोमवार या उसके बाद की किसी तारीख पर करने का अनुरोध किया, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। अब मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर को होगी।
- झारखंड DGP नियुक्ति मामले में SC में सुनवाई टली, अब 7 सितंबर को होगी सुनवाई
- सरकार ने रखा पक्ष, सिलसिलवार ब्योरा दिया
- 2024 में शुरू हुआ झारखंड DGP नियुक्ति का घटनाक्रम
- UPSC से पैनल नहीं मिला तो राज्य ने बनाए नए नियम
- तीन अधिकारियों का पैनल बना, अनुराग गुप्ता बने नियमित DGP
- DGP पद के लिए अधिकारियों की कमी का हवाला
- 30 दिसंबर 2025 को चयन समिति की बैठक
- झारखंड की पहली महिला DGP हैं तदाशा मिश्रा
- नक्सल और संगठित अपराध के खिलाफ कार्रवाई का भी उल्लेख
- सरकार का तर्क- DGP नियुक्ति में नियमों का पालन हुआ
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहनन की पीठ में हुई। 18 अगस्त को हुई पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने डीजीपी नियुक्ति से जुड़े आवश्यक दस्तावेज Amicus Curiae को सौंपते हुए झारखंड में डीजीपी नियुक्ति के मामले में रिपोर्ट पेश करने को कहा था। Amicus Curiae ने अपनी रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल कर दी है, लेकिन उसकी सामग्री की जानकारी झारखंड सरकार को नहीं मिली है। इसी वजह से कपिल सिब्बल ने कोर्ट से रिपोर्ट उपलब्ध कराने का अनुरोध किया। यह मामला प्रकाश सिंह बनाम केंद्र सरकार से जुड़ा है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी कर यह बताने को कहा था कि डीजीपी नियुक्ति के लिए अधिकारियों के नाम UPSC को क्यों नहीं भेजे गए।
सरकार ने रखा पक्ष, सिलसिलवार ब्योरा दिया
झारखंड की पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामले के बीच राज्य सरकार ने अपना पक्ष रखा है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अनुपालन हलफनामे में तदाशा मिश्रा की नियमित DGP के रूप में नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया और इसके पीछे की परिस्थितियों का सिलसिलेवार ब्यौरा दिया है।
राज्य सरकार ने अदालत के समक्ष स्पष्ट किया है कि तदाशा मिश्रा की नियुक्ति मनमाने तरीके से नहीं हुई, बल्कि राज्य में लागू नियमों और निर्धारित चयन प्रक्रिया के तहत की गई है। सरकार ने वर्ष 2024 में शुरू हुए DGP नियुक्ति के घटनाक्रम से लेकर दिसंबर 2025 में तदाशा मिश्रा की नियमित नियुक्ति तक की पूरी पृष्ठभूमि सुप्रीम कोर्ट के सामने रखी है।
2024 में शुरू हुआ झारखंड DGP नियुक्ति का घटनाक्रम
सरकार के अनुसार, वर्ष 2024 में तत्कालीन DGP अजय कुमार सिंह के पद पर बने रहने को लेकर स्थिति उत्पन्न हुई। इसके बाद कानून-व्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए CID के तत्कालीन DG अनुराग गुप्ता को DGP का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया।
नियमित DGP की नियुक्ति के लिए राज्य सरकार ने UPSC को नया पैनल तैयार करने का प्रस्ताव भी भेजा था। इसी दौरान UPSC ने अजय कुमार सिंह को निर्धारित दो वर्ष का कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाए जाने के कारणों पर राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा।
इसके बाद विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गई। चुनाव के दौरान आचार संहिता और निर्वाचन आयोग के निर्देशों के कारण DGP के पद पर एक बार फिर बदलाव हुआ। अनुराग गुप्ता को प्रभार से हटाकर अजय कुमार सिंह को चुनाव अवधि तक DGP की जिम्मेदारी दी गई।
चुनाव समाप्त होने के बाद 28 नवंबर 2024 को अनुराग गुप्ता को फिर से DGP का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया।
UPSC से पैनल नहीं मिला तो राज्य ने बनाए नए नियम
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सितंबर से दिसंबर 2024 के बीच नियमित DGP की नियुक्ति को लेकर UPSC के साथ लगातार पत्राचार हुआ, लेकिन पैनल उपलब्ध नहीं हो सका।
इसके बाद झारखंड सरकार ने DGP के चयन और नियुक्ति के लिए नए नियम तैयार किए। Director General of Police and Inspector General of Police, Jharkhand (HoPF) Selection and Appointment Rules, 2025 को जनवरी 2025 में राज्य कैबिनेट ने मंजूरी दी।
नए नियमों के तहत DGP के चयन के लिए छह सदस्यीय चयन/नामांकन समिति गठित की गई। समिति की अध्यक्षता हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश को दी गई। इसके अलावा UPSC के नामित अधिकारी, JPSC के नामित अधिकारी, पूर्व DGP, मुख्य सचिव और गृह सचिव को समिति में शामिल किया गया।
तीन अधिकारियों का पैनल बना, अनुराग गुप्ता बने नियमित DGP
नए नियम लागू होने के बाद 21 जनवरी 2025 को चयन/नामांकन समिति की बैठक हुई। समिति ने DG रैंक के तीन अधिकारियों का पैनल तैयार कर राज्य सरकार को सौंपा।
सरकार के अनुसार, इसी पैनल में शामिल अधिकारियों की वरिष्ठता को ध्यान में रखते हुए अनुराग गुप्ता को नियमित DGP नियुक्त किया गया।
बाद में अनुराग गुप्ता ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) के लिए आवेदन दिया और 6 नवंबर 2025 से उनकी सेवा समाप्त हो गई। इसके बाद तदाशा मिश्रा को DGP का कार्यवाहक प्रभार सौंपा गया। 12 नवंबर 2025 को तदाशा मिश्रा को DG रैंक में प्रोन्नत किया गया।
DGP पद के लिए अधिकारियों की कमी का हवाला
तदाशा मिश्रा की नियुक्ति के बचाव में राज्य सरकार ने झारखंड कैडर में DG रैंक के अधिकारियों की संख्या का भी हवाला दिया है।
सरकार के अनुसार, उस समय झारखंड कैडर में DG रैंक के केवल चार अधिकारी थे, जबकि ADG रैंक के आठ अधिकारी थे। इनमें से पांच अधिकारी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर थे।
सरकार का कहना है कि इस स्थिति में राज्य के पास DGP पद के लिए उपलब्ध अधिकारियों की संख्या सीमित थी। इसी परिस्थिति को देखते हुए वर्ष 2025 के नियुक्ति नियमों में बदलाव किया गया।
नियम 5(सी) में संशोधन के बाद ऐसे अधिकारियों को भी चयन के दायरे में लाया गया, जिनके पास पुलिस सेवा में कम से कम 30 वर्ष का अनुभव और ADG या DG स्तर पर काम करने का अनुभव हो।
30 दिसंबर 2025 को चयन समिति की बैठक
संशोधित नियमों के तहत 30 दिसंबर 2025 को चयन/नामांकन समिति की बैठक हुई। सेवानिवृत्त हाईकोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली समिति ने योग्य अधिकारियों के नामों पर विचार किया।
सरकार के अनुसार, समिति की सिफारिश के आधार पर तदाशा मिश्रा को नियमित DGP यानी DGP (HoPF) नियुक्त करने का निर्णय लिया गया।
हलफनामे में सरकार ने कहा है कि नियुक्ति के समय तदाशा मिश्रा राज्य के चार वरिष्ठतम DG रैंक के अधिकारियों में शामिल थीं। इसलिए उनका चयन वरिष्ठता, योग्यता और लागू नियमों को ध्यान में रखते हुए किया गया।
झारखंड की पहली महिला DGP हैं तदाशा मिश्रा
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया है कि तदाशा मिश्रा झारखंड की पहली महिला DGP हैं।
सरकार ने उनके 30 वर्ष से अधिक के पुलिस सेवा अनुभव का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में काम किया है और CID में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं।
हलफनामे में महिला एवं बाल अपराध, महिला सुरक्षा और पुलिसिंग में सुधार से जुड़े उनके काम को भी उनके सेवा रिकॉर्ड का हिस्सा बताया गया है।
नक्सल और संगठित अपराध के खिलाफ कार्रवाई का भी उल्लेख
सरकार ने तदाशा मिश्रा के कार्यकाल के दौरान राज्य में नक्सल और संगठित अपराध के खिलाफ हुई कार्रवाई का भी ब्यौरा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखा है।
सरकार के अनुसार, वर्ष 2026 में अब तक 103 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया, 49 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जबकि 22 नक्सली मुठभेड़ में मारे गए या निष्प्रभावी किए गए।
हलफनामे में कुख्यात नक्सली मिसिर बेसरा उर्फ भास्कर की गिरफ्तारी को भी बड़ी उपलब्धि बताया गया है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वांछित साफी की गिरफ्तारी, प्रिंस खान गिरोह से जुड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई और गिरोह के सदस्यों के खिलाफ लुकआउट सर्कुलर जारी करने का भी उल्लेख किया गया है।
सरकार ने राहुल दुबे गैंग, प्रिंस खान गैंग और देविल्स ग्रुप से जुड़े कई कुख्यात अपराधियों की गिरफ्तारी का भी हवाला दिया है।
सरकार का तर्क- DGP नियुक्ति में नियमों का पालन हुआ
सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार का मुख्य तर्क है कि तदाशा मिश्रा की नियुक्ति किसी एक अधिकारी को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से नहीं की गई है।
सरकार के अनुसार, उस समय राज्य में DG रैंक के अधिकारियों की सीमित उपलब्धता, प्रशासनिक जरूरत, पुलिस व्यवस्था और वर्ष 2025 में बनाए गए नियुक्ति नियमों को ध्यान में रखते हुए चयन प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।
सरकार ने यह भी बताया है कि DGP की नियुक्ति से संबंधित प्रस्ताव UPSC को भेजा गया है। हलफनामे के जरिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को नियुक्ति की पूरी पृष्ठभूमि से अवगत कराते हुए कहा है कि तदाशा मिश्रा की नियुक्ति निर्धारित प्रक्रिया और लागू नियमों के अनुरूप हुई है।
राज्य सरकार ने यह दलील भी दी है कि संवेदनशील पदों पर नियुक्ति के मामले में राज्य सरकार को अधिकारियों की योग्यता और सेवा रिकॉर्ड के आधार पर प्रशासनिक निर्णय लेने की भूमिका हासिल है। इसी आधार पर सरकार ने तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को नियमसम्मत बताते हुए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपना पक्ष रखा है।
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