Ranchi News: झारखंड के नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर के उस पत्र का जवाब दिया है, जिसमें उन्होंने MMDR संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर राज्य के आर्थिक हितों और संभावित नुकसान पर चिंता जताई थी। मरांडी ने अपने जवाबी पत्र में कहा है कि झारखंड के आर्थिक नुकसान का पूरा दोष केंद्र सरकार पर डालना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि MMDR संशोधन पूरे देश में समान रूप से लागू है, ऐसे में इससे केवल झारखंड की झामुमो-कांग्रेस सरकार को परेशानी होने की बात सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करती है।
- सेस से 7,500 करोड़ मिले, रॉयल्टी में 6,000 करोड़ की कमी का दावा
- ओडिशा का उदाहरण देते हुए खनन नीलामी पर सवाल
- वैध खनन पर बोझ और अवैध खनन को लेकर सरकार पर निशाना
- बालू घाट और पत्थर खदानों की नीलामी पर भी सवाल
- बजट खर्च और केंद्रीय अनुदान को लेकर भी घेरा
- वित्त मंत्री से पूछा- क्या मुख्यमंत्री और विभागों से सवाल पूछेंगे?
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि केंद्र से झारखंड का जायज हक मांगना गलत नहीं है, लेकिन राज्य को जिस आर्थिक नुकसान की चिंता है, उसके लिए दिल्ली से ज्यादा रांची की नीतियां जिम्मेदार हैं। उन्होंने वित्त मंत्री को संबोधित करते हुए कहा कि वे अंकगणित और तर्क दोनों समझते हैं, इसलिए उन्होंने अपने पत्र में राज्य के वित्तीय प्रबंधन से जुड़े आंकड़ों और सवालों को बिंदुवार रखा है।
सेस से 7,500 करोड़ मिले, रॉयल्टी में 6,000 करोड़ की कमी का दावा
मरांडी ने पत्र में उपकर (सेस) का जिक्र करते हुए कहा कि पिछले वर्ष इससे लगभग 7,500 करोड़ रुपये की आय हुई, लेकिन उसी वर्ष बजटीय अनुमान में करीब 22,000 करोड़ रुपये की खनन रॉयल्टी का लक्ष्य था, जो घटकर लगभग 16,000 करोड़ रुपये रह गया। उनके मुताबिक इससे करीब 6,000 करोड़ रुपये की कमी हुई।
उन्होंने आरोप लगाया कि कोयले पर 450 रुपये प्रति टन और लौह अयस्क पर 600 रुपये प्रति टन का उपकर लगाने से झारखंड के खनिज बाजार में अप्रतिस्पर्धी हो गए हैं। मरांडी के मुताबिक 30 टन क्षमता वाले कोयला ट्रक पर ही करीब 13,500 रुपये और लौह अयस्क पर 18,000 रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
उन्होंने दावा किया कि इसका असर सिंहभूम क्षेत्र की खदानों और आयरन क्रशरों पर पड़ा है तथा कोयला उत्पादन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। उन्होंने राज्य के स्थानीय मजदूरों की स्थिति को लेकर भी सरकार पर सवाल उठाए।
ओडिशा का उदाहरण देते हुए खनन नीलामी पर सवाल
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि खनन क्षेत्र से राजस्व बढ़ाने का सबसे बड़ा माध्यम केवल सेस नहीं, बल्कि खदानों की नीलामी और खनिज रॉयल्टी है। उन्होंने पड़ोसी राज्य ओडिशा का उदाहरण देते हुए दावा किया कि वहां 76 प्रमुख खनिज ब्लॉकों की नीलामी के बाद 34 खदानें क्रियाशील हो चुकी हैं और पिछले कुछ वर्षों में राज्य को इससे करीब 87,000 करोड़ रुपये की आय हुई है।
मरांडी ने आरोप लगाया कि झारखंड में लौह अयस्क की कई खदानें बंद हैं और केंद्र द्वारा दिए गए कुछ कोल ब्लॉक भी चालू नहीं हो सके हैं। उन्होंने कहा कि खदानों की नीलामी और खनिज उत्पादन बढ़ाकर झारखंड हर साल करीब 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त कमा सकता था।
वैध खनन पर बोझ और अवैध खनन को लेकर सरकार पर निशाना
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि वैध खनिजों पर भारी उपकर लगाने से अवैध खनन को बढ़ावा मिलने का खतरा है। उन्होंने आरोप लगाया कि वैध खनन महंगा होने से अवैध खनन करने वालों को फायदा मिल रहा है और इससे सरकार को राजस्व का नुकसान हो रहा है।
उन्होंने सवाल उठाया कि झारखंड की वैध खदानें आखिर कब तक चालू होंगी और इस लंबे विलंब के लिए जवाबदेह कौन है।
बालू घाट और पत्थर खदानों की नीलामी पर भी सवाल
मरांडी ने MMDR संशोधन के दायरे को लेकर कहा कि यह संशोधन प्रमुख खनिजों (Major Minerals) पर लागू है और लघु खनिजों पर इसका प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसी आधार पर उन्होंने राज्य में बालू घाटों और पत्थर खदानों की नीलामी को लेकर वित्त मंत्री से सवाल किया।
उन्होंने पूछा कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य में बालू घाटों और पत्थर खदानों की नीलामी क्यों नहीं हुई और जिनकी नीलामी हुई, वे भी पूरी तरह संचालित क्यों नहीं हो पाईं। उन्होंने इससे होने वाले राजस्व नुकसान की जिम्मेदारी भी तय करने की मांग की।
बजट खर्च और केंद्रीय अनुदान को लेकर भी घेरा
नेता प्रतिपक्ष ने राज्य के वित्तीय प्रबंधन पर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि चालू वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में सभी विभाग मिलकर कुल बजट का एक प्रतिशत भी खर्च नहीं कर पाए।
उन्होंने उपयोगिता प्रमाण पत्र, निकाय चुनाव और राज्य वित्त आयोग के गठन से जुड़े मामलों में कथित लापरवाही का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके कारण राज्य को हजारों करोड़ रुपये के संभावित केंद्रीय अनुदान से वंचित होना पड़ा।
मरांडी ने DMFT (District Mineral Foundation Trust) के तहत खनन प्रभावित क्षेत्रों के लिए उपलब्ध राशि के इस्तेमाल को लेकर भी सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राज्य को इससे करीब 19,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्राप्त हुई है और इसके इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।
वित्त मंत्री से पूछा- क्या मुख्यमंत्री और विभागों से सवाल पूछेंगे?
अपने पत्र के अंत में बाबूलाल मरांडी ने वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर से सीधे सवाल किया कि क्या वे वित्त मंत्री के रूप में ये सभी सवाल मुख्यमंत्री और संबंधित विभागों से पूछने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाएंगे।
मरांडी ने कहा कि “सरकारें आती-जाती हैं, राज्य स्थायी रहता है” वाली बात तभी सार्थक होगी, जब राज्य के प्रति जवाबदेही का हिसाब भी रखा जाए। उनके मुताबिक केंद्र से सवाल पूछने के साथ-साथ राज्य सरकार की नीतियों और वित्तीय प्रबंधन पर भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
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