रांची। झारखंड के महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल) राजीव रंजन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपने त्यागपत्र में निजी कारणों और स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों का हवाला दिया है। फरवरी 2020 में महाधिवक्ता नियुक्त किए गए राजीव रंजन पिछले छह वर्षों से राज्य के सर्वोच्च विधि अधिकारी के रूप में कार्य कर रहे थे। उनके इस्तीफे को राज्यपाल ने स्वीकार कर लिया है।
राज्य सरकार ने उनके स्थान पर झारखंड हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता रोहितश्य रॉय को नया महाधिवक्ता नियुक्त किया है। इसके साथ ही अपर महाधिवक्ता अचुत्य केशव को पदोन्नत कर वरीय अपर महाधिवक्ता की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस बदलाव ने राज्य के राजनीतिक, प्रशासनिक और कानूनी हलकों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
अचानक इस्तीफे से बढ़ीं राजनीतिक चर्चाएं
राजीव रंजन के इस्तीफे के बाद राजनीतिक गलियारों में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि उन्होंने अपने त्यागपत्र में स्वास्थ्य और निजी कारणों का उल्लेख किया है, लेकिन विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच इस घटनाक्रम को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं सामने आ रही हैं।
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि उनकी नियुक्ति उस समय हुई थी जब महागठबंधन सरकार अपने शुरुआती दौर में थी। ऐसे में उनके अचानक पद छोड़ने के फैसले को लेकर कई सवाल खड़े किए जा रहे हैं। कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे आगामी राज्यसभा चुनावों और बदलते राजनीतिक समीकरणों के संदर्भ में भी देख रहे हैं, जबकि कुछ का मानना है कि यह महज व्यक्तिगत निर्णय हो सकता है।
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संवैधानिक पद पर बदलाव के क्या हैं मायने?
महाधिवक्ता राज्य सरकार का प्रमुख विधिक सलाहकार होता है और हाईकोर्ट में सरकार का पक्ष रखने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाता है। ऐसे में इस पद पर किसी भी बदलाव को प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।
राज्य सरकार की नीतियों, विधायी निर्णयों और विभिन्न संवैधानिक मामलों में महाधिवक्ता की भूमिका बेहद अहम होती है। इसलिए राजीव रंजन के इस्तीफे और नए महाधिवक्ता की नियुक्ति को केवल एक प्रशासनिक परिवर्तन के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसके राजनीतिक और कानूनी प्रभावों पर भी चर्चा शुरू हो गई है।
हाई प्रोफाइल मामलों को लेकर भी उठ रही हैं चर्चाएं
राजनीतिक और कानूनी हलकों में यह चर्चा भी सामने आई है कि हाल के कुछ महत्वपूर्ण मामलों को लेकर सरकार और विधिक तंत्र के भीतर मतभेद की स्थिति बनी थी। हालांकि इस संबंध में किसी भी पक्ष की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन विभिन्न स्तरों पर इस मुद्दे को लेकर चर्चाएं जारी हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि राज्य में कई संवेदनशील और हाई प्रोफाइल मामलों की सुनवाई चल रही है। ऐसे समय में महाधिवक्ता का पद छोड़ना स्वाभाविक रूप से कई सवालों को जन्म देता है। हालांकि वास्तविक कारणों को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
भाजपा ने सरकार को घेरा, मांगा श्वेत पत्र
महाधिवक्ता के इस्तीफे के बाद भाजपा ने राज्य सरकार पर निशाना साधा है। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता अजय साह ने आरोप लगाया कि झारखंड में प्रशासनिक स्थिरता का अभाव दिखाई दे रहा है और संवैधानिक पदों पर लगातार बदलाव हो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार को राजीव रंजन के पूरे कार्यकाल का श्वेत पत्र जारी करना चाहिए। भाजपा ने यह जानने की मांग की है कि उनके कार्यकाल के दौरान राज्य सरकार ने कितने मामलों में सफलता प्राप्त की, कितने मामलों में हार का सामना करना पड़ा तथा बाहरी अधिवक्ताओं पर कितना खर्च किया गया।
भाजपा ने यह सवाल भी उठाया है कि यदि उनके कार्यकाल का प्रदर्शन संतोषजनक था तो इस्तीफे की नौबत क्यों आई और यदि प्रदर्शन संतोषजनक नहीं था तो उन्हें इतने लंबे समय तक पद पर क्यों बनाए रखा गया।
आगे क्या?
राज्य सरकार ने नए महाधिवक्ता के रूप में रोहितश्य रॉय की नियुक्ति कर दी है। अब कानूनी और राजनीतिक हलकों की निगाह इस बात पर रहेगी कि नए नेतृत्व में राज्य का विधिक पक्ष किस तरह आगे बढ़ता है। वहीं राजीव रंजन के इस्तीफे के वास्तविक कारणों को लेकर राजनीतिक चर्चाओं का दौर फिलहाल थमता नहीं दिख रहा है।
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