डेमोग्राफिक चेंज पर अमित शाह की हाई लेवल कमेटी : क्या संथाल परगना में फिर गरमाने वाला है ‘घुसपैठ’ का मुद्दा?

Anand Kumar
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Special Report : केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 26 मई को एक ऐसा फैसला लिया, जिसने झारखंड की राजनीति, खासकर संथाल परगना प्रमंडल की सियासत में अचानक नई हलचल पैदा कर दी है। यह फैसला केवल झारखंड तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि उन सभी राज्यों और क्षेत्रों पर इसका असर पड़ सकता है जहां “डेमोग्राफिक चेंज” यानी आबादी के असामान्य बदलाव का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक बहस का हिस्सा रहा है।

गृह मंत्रालय ने “डेमोग्राफिक चेंज” पर एक हाई लेवल कमेटी के गठन की घोषणा की है। केंद्र सरकार के अनुसार यह कमेटी अवैध प्रवास और अन्य असामान्य कारणों से देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे जनसंख्या परिवर्तन का अध्ययन करेगी। सरकार का दावा है कि यह सिर्फ जनगणना या आंकड़ों का मामला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक संरचना और जनजातीय समाज के अस्तित्व से जुड़ा विषय है।

लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस कमेटी के गठन से झारखंड के संथाल परगना में राजनीतिक तापमान अचानक क्यों बढ़ गया? इसका जवाब झारखंड की उस राजनीति में छिपा है, जहां “बांग्लादेशी घुसपैठ” और “डेमोग्राफिक बदलाव” पिछले कई वर्षों से भाजपा के सबसे आक्रामक राजनीतिक मुद्दों में शामिल रहे हैं।

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आखिर क्या है हाई लेवल कमेटी?

अमित शाह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी देते हुए बताया कि जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर की अध्यक्षता में गठित इस समिति में पूर्व आईएएस अधिकारी दुर्गा शंकर मिश्रा, पूर्व आईपीएस अधिकारी बालाजी श्रीवास्तव, अर्थशास्त्री डॉ. शमिका रवि और जनगणना आयुक्त जैसे सदस्य शामिल होंगे। गृह मंत्रालय का संयुक्त सचिव समिति के सदस्य सचिव होंगे।

गृह मंत्री ने कहा कि “अननेचुरल डेमोग्राफिक चेंज” यानी असामान्य जनसंख्या बदलाव देश की संप्रभुता, कानून व्यवस्था, सामाजिक संतुलन और विशेष रूप से जनजातीय समाज के संरक्षण के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।

सरकार के मुताबिक समिति निम्न बिंदुओं पर काम करेगी:

  • अवैध प्रवास और सीमा पार घुसपैठ का अध्ययन
  • धार्मिक और सामाजिक समुदायों के जनसंख्या पैटर्न का विश्लेषण
  • डेमोग्राफिक बदलाव के कारणों का मूल्यांकन
  • समाधान और नीति संबंधी सुझाव

यानी केंद्र सरकार अब इस मुद्दे को केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि इसे संस्थागत और प्रशासनिक ढांचे में भी ले जाने की तैयारी कर चुकी है।

भाजपा लंबे समय से उठा रही है ‘घुसपैठ’ का मुद्दा

झारखंड में भाजपा वर्षों से दावा करती रही है कि संथाल परगना प्रमंडल में बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण जनसंख्या संतुलन तेजी से बदल रहा है। भाजपा नेताओं का आरोप रहा है कि अवैध प्रवासियों को राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है और वोट बैंक की राजनीति के कारण इस मुद्दे को दबाया जाता रहा है।

लोकसभा और विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा ने इस मुद्दे को प्रमुख चुनावी हथियार बनाया था। हालांकि चुनावी परिणामों से यह साफ नहीं हुआ कि इस मुद्दे का भाजपा को कितना राजनीतिक लाभ मिला, लेकिन यह जरूर स्पष्ट है कि पार्टी ने इस मुद्दे को छोड़ा नहीं है।

अब अमित शाह की कमेटी ने इस बहस को एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर जीवित कर दिया है।

संथाल परगना भाजपा के निशाने पर क्यों?

संथाल परगना झारखंड का वह इलाका है जहां आदिवासी आबादी ऐतिहासिक रूप से मजबूत रही है। दुमका, पाकुड़, साहिबगंज, जामताड़ा, देवघर और गोड्डा जैसे जिले इस प्रमंडल में आते हैं। भाजपा का दावा है कि यहां दशकों से जनसंख्या संरचना में तेजी से बदलाव हुआ है।

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने संसद में दावा किया था कि 1951 में संथाल परगना में आदिवासियों की आबादी करीब 45 प्रतिशत थी, जो 2011 तक घटकर लगभग 28 प्रतिशत रह गई। वहीं मुस्लिम आबादी 9 प्रतिशत से बढ़कर करीब 24 प्रतिशत तक पहुंच गई।

भाजपा इन आंकड़ों को बांग्लादेशी घुसपैठ से जोड़ती है। हालांकि विपक्ष और कई सामाजिक संगठन इस दावे को राजनीतिक नैरेटिव बताते रहे हैं। उनका कहना है कि जनसंख्या बदलाव के पीछे केवल घुसपैठ नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और प्रवासन संबंधी कई कारण होते हैं।

हाई कोर्ट तक पहुंच चुका है मामला

यह मुद्दा केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रहा। जमशेदपुर निवासी दानियल दानिश द्वारा दायर याचिका में झारखंड हाई कोर्ट में संथाल परगना के छह जिलों में कथित बांग्लादेशी घुसपैठ और डेमोग्राफिक बदलाव का मुद्दा उठाया गया था।

याचिका में आरोप लगाया गया था कि सीमा पार से आए लोग स्थानीय आदिवासी महिलाओं से विवाह कर रहे हैं, जमीनों पर कब्जा कर रहे हैं और फर्जी दस्तावेजों के जरिए स्थानीय व्यवस्था में शामिल हो रहे हैं।

हाई कोर्ट ने इस मामले में केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा था। केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी अदालत में कहा था कि संथाल परगना में अवैध तरीके से बसाहट हुई है और इस पर कार्रवाई की जरूरत है।

इसके बाद केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की भी चर्चा हुई थी।

पश्चिम बंगाल मॉडल और उसका राजनीतिक संदेश

इस पूरे घटनाक्रम को पश्चिम बंगाल की राजनीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता। भाजपा लगातार पश्चिम बंगाल में “घुसपैठ” को बड़ा मुद्दा बनाती रही है।

हाल के महीनों में वहां संदिग्ध विदेशी नागरिकों के लिए होल्डिंग सेंटर बनाने, दस्तावेजों की जांच, बायोमेट्रिक डाटा संग्रह और “डिटेक्ट, डिलीट एंड डिपोर्ट” नीति की चर्चाओं ने इस मुद्दे को और आक्रामक बना दिया है।

अब जब अमित शाह ने राष्ट्रीय स्तर पर हाई लेवल कमेटी बनाई है, तो राजनीतिक विश्लेषक इसे भाजपा के बड़े वैचारिक और चुनावी एजेंडे से जोड़कर देख रहे हैं।

झारखंड सरकार की स्थिति क्या है?

झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार और सत्तारूढ़ गठबंधन हमेशा से भाजपा के इन आरोपों को खारिज करते रहे हैं। झामुमो और कांग्रेस का कहना रहा है कि भाजपा सामाजिक ध्रुवीकरण की राजनीति करती है और जनसंख्या के मुद्दे को चुनावी हथियार की तरह इस्तेमाल करती है।

लेकिन अब स्थिति थोड़ी अलग है। अगर केंद्र सरकार की समिति रिपोर्ट तैयार करती है और उसमें संथाल परगना को लेकर गंभीर टिप्पणियां आती हैं, तो यह झारखंड की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन सकता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे तीन स्तरों पर असर पड़ सकता है:

  1. आदिवासी राजनीति
  2. मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति
  3. भूमि और नागरिकता से जुड़े विवाद

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क्या यह केवल सुरक्षा का मुद्दा है या राजनीतिक रणनीति?

यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। भाजपा इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और जनजातीय अस्तित्व का सवाल बता रही है। वहीं विपक्ष इसे चुनावी ध्रुवीकरण की रणनीति मान रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि “डेमोग्राफिक चेंज” का मुद्दा आने वाले वर्षों में भाजपा की राजनीति का प्रमुख हिस्सा बन सकता है, खासकर पूर्वी भारत में।

असम में हिमंता बिस्वा सरमा पहले से इस मुद्दे पर आक्रामक हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा लगातार इसे उठा रही है। बिहार में भी यह मुद्दा धीरे-धीरे राजनीतिक विमर्श में प्रवेश कर रहा है। ऐसे में झारखंड, खासकर संथाल परगना, भाजपा की रणनीति का अगला केंद्र बन सकता है।

आदिवासी राजनीति पर क्या होगा असर?

संथाल परगना केवल राजनीतिक नहीं, सांस्कृतिक और भावनात्मक रूप से भी बेहद संवेदनशील इलाका है। यहां आदिवासी पहचान, जमीन, संस्कृति और जनसंख्या संतुलन जैसे मुद्दे हमेशा गहरे असर डालते रहे हैं।

अगर भाजपा इस मुद्दे को “आदिवासी अस्तित्व” बनाम “घुसपैठ” के रूप में पेश करती है, तो इसका असर झामुमो की पारंपरिक राजनीति पर पड़ सकता है।

हालांकि दूसरी तरफ यह भी सच है कि झामुमो और कांग्रेस इस मुद्दे को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति बताकर पलटवार करेंगे। यानी आने वाले समय में यह बहस और तेज हो सकती है।

बदल सकती है संथाल परगना की दिशा

अमित शाह द्वारा डेमोग्राफिक चेंज पर हाई लेवल कमेटी का गठन केवल प्रशासनिक कदम नहीं माना जा रहा। यह फैसला पूर्वी भारत की राजनीति, खासकर झारखंड के संथाल परगना की दिशा बदलने वाला मुद्दा बन सकता है।

फिलहाल समिति बनी है, रिपोर्ट आनी बाकी है, लेकिन राजनीतिक संदेश साफ है – भाजपा अब “घुसपैठ” और “जनसंख्या बदलाव” के मुद्दे को फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में लाना चाहती है।

अब देखने वाली बात यह होगी कि यह बहस केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहती है या वास्तव में बड़े प्रशासनिक और कानूनी कदमों का आधार बनती है।

संथाल परगना में फिलहाल सवाल सिर्फ डेमोग्राफी का नहीं, बल्कि राजनीति, पहचान और सत्ता संतुलन का बन चुका है।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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