Anand Kumar
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा ने न सिर्फ शानदार प्रदर्शन किया बल्कि झारखंड की सीमा से सटे जंगल महल के घने साल वाले जंगलों में पूरी तरह अपना परचम लहरा दिया। अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सभी 16 सीटों पर भाजपा ने क्लीन स्वीप कर लिया। ये वही इलाके हैं जहां का भूगोल, जंगल, पहाड़, आदिवासी बहुल आबादी, बोली-भाषा और खान-पान झारखंड से लगभग मेल खाता है।
इससे पहले ओडिशा और छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती आदिवासी क्षेत्रों में भी भाजपा अपनी जड़ें मजबूत कर चुकी है। लेकिन झारखंड में पिछले दो चुनावों से पार्टी को निरंतर नाकामी का सामना करना पड़ रहा है।
2019 में 28 ST सीटों में से सिर्फ 2 और 2024 में महज एक सीट (चंपाई सोरेन के जरिए) ही हाथ लगी। ऐसे में बंगाल की इस लहर ने भाजपा को झारखंड पर फिर से नजर डालने का मौका दे दिया है।
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बंगाल जीत के पीछे के बड़े कारण
इस सफलता का एक अहम कारण पहचान का संकट रहा। 2011 की जनगणना में झारखंड-बंगाल सीमा क्षेत्र में करीब 52 लाख अनुसूचित जनजाति की आबादी दर्ज थी, लेकिन हालिया प्रशासनिक आंकड़ों में यह संख्या घटकर मात्र 27 लाख के आसपास रह गई। फर्जी ST प्रमाण पत्रों की भरमार, वोट बैंक की राजनीति और प्रशासनिक मिलीभगत के आरोपों ने आदिवासी समाज में गहरा आक्रोश पैदा कर दिया।
भाजपा ने यहां स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) जैसी योजना का वादा कर फर्जी एंट्रीज हटाने और असली आदिवासियों की पहचान बचाने का संकल्प दिखाया। इससे युवा मतदाताओं, खासकर बांकुरा और पश्चिम मेदिनीपुर में, पार्टी को मजबूत समर्थन मिला। इसके अलावा शिक्षा की बदहाली भी बड़ा मुद्दा बनी।
आदिवासी छात्रावासों की संख्या 1,000 से घटकर 300 रह गई। उत्सश्री योजना ने शिक्षकों को शहरों की ओर खींच लिया, जिससे दूरदराज के गांव “शिक्षक-विहीन” हो गए। लक्ष्मी भंडार जैसी कल्याणकारी योजनाएं राहत तो दे रही थीं, लेकिन शिक्षा, रोजगार और सशक्तिकरण की भूख को शांत नहीं कर पा रही थीं। गरिमा का मुद्दा भी निर्णायक साबित हुआ।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के दौरे के दौरान प्रोटोकॉल में हुई कथित अनदेखी और “मेरी छोटी बहन ममता” वाले बयान ने भावनात्मक रूप से आदिवासियों को झकझोर दिया। संथाल, ओरांव, मुंडा समुदाय के लिए मुर्मू सिर्फ संवैधानिक पद पर नहीं, बल्कि “भूमिपुत्री” का प्रतीक हैं। इसने कल्याण से आगे बढ़कर पहचान, गरिमा और प्रतिनिधित्व के मुद्दे को केंद्र में ला दिया।
चंपाई सोरेन: BJP की छुपी हुई ताकत
झारखंड में भाजपा की इस नई रणनीति में चंपाई सोरेन सबसे अहम कड़ी बनकर उभरे हैं। जब बंगाल चुनाव के लिए स्टार प्रचारकों की सूची बनी तो अर्जुन मुंडा, बाबूलाल मरांडी और अन्नपूर्णा देवी का नाम तो था, लेकिन झारखंड के इकलौते भाजपा विधायक और पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन का नाम झारखंड इकाई ने भेजा ही नहीं।
केंद्रीय नेतृत्व को जब इसकी जानकारी हुई तो भूपेंद्र यादव और अमित शाह ने खुद दखल दिया। चंपाई सोरेन ने करीब 15 दिन जंगल महल के जंगलों-पहाड़ों वाले गांवों में प्रचार किया। झारखंड आंदोलन के दिनों के साथी, जिन पर आज भी बंगाल में मुकदमे और वारंट लंबित हैं, उनसे संपर्क किया। उन्हें भरोसा दिलाया कि भाजपा सरकार बनी तो उनके केस वापस होंगे और उन्हें आंदोलनकारी का सम्मान मिलेगा।
प्रधानमंत्री मोदी की झाड़ग्राम रैली में मंच पर हाथ मिलाने के बाद अलग से चंपाई से मिलने का दृश्य और चुनाव के बाद अमित शाह के साथ मुलाकात की फोटो ने साफ संकेत दिया कि पार्टी चंपाई के योगदान को अहम मान रही है।
चंपाई सोरेन भाजपा के उन गिने-चुने नेताओं में से हैं जो संथाल से कोल्हान तक बांग्लादेशी घुसपैठ, धर्मांतरण और डेमोग्राफी चेंज जैसे मुद्दों को लगातार उठाते हैं। वे आदिवासी पाहन, पुजारी, माझी-बाबा और ग्राम प्रधानों से सीधा संवाद रखते हैं। संथाली और बांग्ला बोलने की क्षमता तथा झारखंड आंदोलन की पृष्ठभूमि उन्हें जमीनी स्तर पर मजबूत बनाती है।
झारखंड के लिए क्या मतलब?
अब झारखंड के चारों तरफ भाजपा की सरकारें हैं – यूपी, बिहार, बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और केंद्र। अकेला झारखंड JMM-Congress-RJD गठबंधन के पास है। लेकिन झारखंड में आदिवासियों का भरोसा हासिल करना आसान नहीं।
हेमंत सोरेन ने इस वर्ग का बड़ा हिस्सा अपने साथ जोड़ लिया है। सरना बनाम ईसाई और जमाई टोलों का मुद्दा उठ रहा है, लेकिन अभी तक आम आदिवासी इससे पूरी तरह जुड़ नहीं पाया। ऐसे में चंपाई सोरेन ही वह कड़ी हो सकते हैं जो बंगाल की सफलता को झारखंड में दोहराने में मदद करें।
बाबूलाल मरांडी लगातार असफल रहे, अर्जुन मुंडा एलीट छवि के नेता माने जाते हैं। चंपाई गुरुजी शिबू सोरेन के भरोसेमंद साथी रहे हैं और जमीनी संघर्ष से निकले हैं। आने वाले दिनों में भाजपा अगर जंगल महल की इस जीत को झारखंड में भुनाना चाहती है तो चंपाई सोरेन को बड़ी जिम्मेदारी देना लगभग तय माना जा रहा है।
बंगाल का चुनाव सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि आदिवासी राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। कल्याण से आगे बढ़कर अब पहचान, गरिमा और असली प्रतिनिधित्व की लड़ाई शुरू हो चुकी है। झारखंड में भाजपा इस लहर को पकड़ पाती है या नहीं, यह 2029 से पहले होने वाले चुनावों में साफ हो जाएगा। और चंपाई सोरेन इस पूरे समीकरण में सबसे अहम चरित्र बनकर उभर रहे हैं।
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