New Delhi : बड़ी खबर सामने आई है। राज्यसभा के उपसभापति रह चुके हरिवंश नारायण सिंह का कार्यकाल शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026 को सदस्य के तौर पर समाप्त हो रहा था। जेडीयू द्वारा इस बार उन्हें दोबारा राज्यसभा नहीं भेजे जाने के कारण उनकी विदाई तय मानी जा रही थी। लेकिन अंतिम दिन घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया।
जानकारी के अनुसार, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने कोटे से हरिवंश को राज्यसभा के लिए मनोनीत कर दिया है। इस संबंध में आधिकारिक नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया गया है। राष्ट्रपति के इस फैसले के बाद उनकी सदन से विदाई टल गई है और अब वे अगले छह वर्षों तक राज्यसभा के सदस्य बने रहेंगे।
हरिवंश का तीसरा कार्यकाल
यह हरिवंश का राज्यसभा में तीसरा कार्यकाल होगा। उन्हें उस सीट पर मनोनीत किया गया है जो पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के सेवानिवृत्त होने के बाद खाली हुई थी। गृह मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राष्ट्रपति को राज्यसभा में 12 सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार है।
संविधान के प्रावधानों के अनुसार, राष्ट्रपति साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्तियों को राज्यसभा के लिए नामित कर सकती हैं। ऐसे मनोनीत सदस्यों का कार्यकाल छह वर्ष का होता है।
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करीब 69 वर्षीय हरिवंश नारायण सिंह बिहार से दो बार राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं और वे सदन के उपसभापति पद पर भी रह चुके हैं। पेशे से पत्रकार रहे हरिवंश पहली बार 2014 में जेडीयू के टिकट पर राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए थे।
इसके बाद 9 अगस्त 2018 को वे पहली बार राज्यसभा के उपसभापति चुने गए। फिर 14 सितंबर 2020 को लगातार दूसरी बार इस पद पर निर्वाचित हुए। अब मनोनयन के जरिए उन्हें तीसरा कार्यकाल मिल गया है।
क्या फिर उपसभापति बन सकते हैं हरिवंश?
राज्यसभा में हरिवंश नारायण सिंह की विदाई टलने के बाद अब उनकी अगली भूमिका को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। खासतौर पर 18 मार्च को दिए गए प्रधानमंत्री के बयान को इस पूरे घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है।
18 मार्च को पीएम मोदी ने दिया था संकेत
बजट सत्र के दूसरे चरण के दौरान 18 मार्च को राज्यसभा में रिटायर हो रहे सदस्यों के लिए आयोजित विदाई समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरिवंश नारायण सिंह को लेकर अहम टिप्पणी की थी।
उन्होंने कहा था कि हरिवंश इस सदन में लंबे समय तक अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते रहे हैं और अब वे विदा ले रहे हैं। हालांकि, उनके बयान को केवल औपचारिक विदाई नहीं माना गया, बल्कि इसमें एक राजनीतिक संकेत भी देखा गया।
पीएम मोदी ने यह भी इशारा किया था कि हरिवंश की सार्वजनिक जीवन में भूमिका अभी समाप्त नहीं हुई है और वे आगे भी जनहित में काम करते रहेंगे। अब राष्ट्रपति द्वारा मनोनयन के बाद इस बयान को “कमबैक हिंट” के तौर पर देखा जा रहा है।
अहम सवाल: अब राज्यसभा में क्या होगी भूमिका?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा मनोनीत किए जाने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि हरिवंश अब राज्यसभा में किस भूमिका में नजर आएंगे।
संविधान के अनुसार, मनोनीत सदस्य भी राज्यसभा के उपसभापति बन सकते हैं।
- अनुच्छेद 89 के तहत राज्यसभा अपने सदस्यों में से उपसभापति का चुनाव करती है
- इसमें निर्वाचित या मनोनीत सदस्य होने की कोई बाध्यता नहीं है
- शर्त सिर्फ यह है कि उम्मीदवार राज्यसभा का सदस्य हो
इसका मतलब है कि हरिवंश, बतौर मनोनीत सांसद भी, दोबारा उपसभापति पद के लिए चुने जा सकते हैं।
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कैसे होता है उपसभापति का चुनाव?
राज्यसभा में उपसभापति का चुनाव एक तय प्रक्रिया के तहत होता है:
- किसी सदस्य के नाम का प्रस्ताव लाया जाता है
- प्रस्ताव पर सदन में चर्चा होती है
- फिर मतदान के जरिए फैसला होता है
- साधारण बहुमत से चुनाव संपन्न होता है
इस प्रक्रिया में:
- मनोनीत सदस्य वोट डाल सकते हैं
- मनोनीत सदस्य उम्मीदवार भी बन सकते हैं
आमतौर पर सरकार और विपक्ष के बीच सहमति बनने पर चुनाव आसान हो जाता है।
क्या दोबारा उपसभापति बनेंगे हरिवंश?
हरिवंश 2018 से 2024 तक राज्यसभा के उपसभापति रह चुके हैं और सदन संचालन के अनुभव के कारण उनकी दावेदारी मजबूत मानी जा रही है।
अब चूंकि वे फिर से राज्यसभा सदस्य बन गए हैं, इसलिए:
- अगर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच सहमति बनती है
- या सरकार उन्हें फिर से आगे बढ़ाती है
तो उनका दोबारा उपसभापति बनना संभव है।
पत्रकार से राजनीति तक का सफर
हरिवंश नारायण सिंह का करियर एक पत्रकार के रूप में शुरू हुआ था। बाद में वे राजनीति में आए और जेडीयू के जरिए राज्यसभा पहुंचे।
- 2014 में पहली बार राज्यसभा सदस्य बने
- 2018 में पहली बार उपसभापति चुने गए
- 2020 में दूसरी बार इस पद पर निर्वाचित हुए
- अब 2026 में मनोनीत सदस्य के रूप में तीसरा कार्यकाल
उनका यह सफर उन्हें एक अनुभवी संसदीय चेहरे के रूप में स्थापित करता है।
राजनीतिक संकेत
हरिवंश का मनोनयन सिर्फ एक औपचारिक नियुक्ति नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संकेत भी माना जा रहा है। पीएम मोदी के पहले दिए गए बयान और अब राष्ट्रपति के फैसले के बाद यह साफ है कि उनकी भूमिका अभी खत्म नहीं हुई है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या वे एक बार फिर राज्यसभा के उपसभापति बनकर सदन संचालन की जिम्मेदारी संभालेंगे या उनकी भूमिका किसी और रूप में सामने आएगी।