असम में हेमंत सोरेन का चुनाव अभियान : झामुमो के ‘अबुआ राज’ की राष्ट्रीय यात्रा शुरू!

Anand Kumar
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Anand Kumar

झारखंड के मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के प्रमुख हेमंत सोरेन ने 28 मार्च 2026 को असम के कोकराझार जिले के गोसाईंगांव विधानसभा क्षेत्र में अपनी पहली चुनावी जनसभा को संबोधित कर न सिर्फ असम विधानसभा चुनाव 2026 की औपचारिक शुरुआत की, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़े आदिवासी चेहरे के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी।

हेलीकॉप्टर से पहुंचे सोरेन ने जेएमएम प्रत्याशी फ्रेडरिक्सन हांसदा के समर्थन में भारी जनसभा को संबोधित किया, जहां हजारों की भीड़ चाय बागान श्रमिकों, आदिवासी कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों से भरी थी।

यह सभा मात्र एक चुनावी कार्यक्रम नहीं, बल्कि झामुमो की दीर्घकालिक रणनीति का प्रतीक है। झारखंड से बाहर आदिवासी बहुल क्षेत्रों में पैठ बनाना और ‘अबुआ राज’ (हमारा राज) का नारा राष्ट्रीय स्तर पर गुंजाना।

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आदिवासी संघर्ष और चाय बागानों की पीड़ा: सोरेन का भावुक और आक्रामक भाषण

अपने संबोधन में हेमंत सोरेन ने आदिवासी इतिहास, उनके सदियों पुराने संघर्षों और आज भी जारी वंचना का जिक्र करते हुए कहा, “यह चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि वंचित समाज को उनका हक दिलाने का अभियान है।”

उन्होंने चाय बागान श्रमिकों (टी-ट्राइब) की स्थिति पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि देश की अर्थव्यवस्था में अहम योगदान देने के बावजूद इन 60-70 लाख लोगों को अब तक उचित अधिकार, भूमि, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिली। सोरेन ने भरोसा दिलाया कि झामुमो इन समुदायों के साथ खड़ा रहेगा।

उन्होंने भाजपा पर भी जमकर निशाना साधा। आरोप लगाया कि चुनाव के समय आर्थिक प्रलोभन दिए जाते हैं, लेकिन बाद में वादे धरे रह जाते हैं। उनका कहना था – “भाजपा आम लोगों के हित में नहीं, अपने हित साधने में लगी है।”

इसके विपरीत, झारखंड मॉडल का उदाहरण देते हुए सोरेन ने वादा किया कि असम में भी सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारकर शिक्षा क्रांति लाई जाएगी, ठीक वैसे जैसे झारखंड में छात्रों का नामांकन बढ़ा है। उन्होंने संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग का भी आरोप लगाया और कहा कि उनका मकसद सिर्फ भाषण नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत बदलना और आने वाली पीढ़ी को बेहतर भविष्य देना है।

झामुमो की रणनीति: 15 साल बाद असम में वापसी, 18 सीटों पर अकेला दांव

लगभग 15 साल बाद असम में सक्रिय झामुमो ने इस बार कोई समझौता नहीं किया। कांग्रेस से सीट शेयरिंग की बातचीत विफल होने के बाद पार्टी ने 21 सीटों पर स्वतंत्र उम्मीदवार उतारे। इनमें चाय बागान क्षेत्रों और आदिवासी बहुल इलाकों पर खास फोकस है।

पार्टी महासचिव विनोद पांडेय पहले से असम में कैंप कर रणनीति तैयार कर चुके हैं। स्टार प्रचारकों की लंबी लिस्ट में हेमंत सोरेन के साथ कल्पना मुर्मू सोरेन, महुआ माजी, सरफराज अहमद, सुप्रियो भट्टाचार्य, दीपक बिरुवा और चमरा लिंडा जैसे नाम शामिल हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम झामुमो को मात्र क्षेत्रीय पार्टी से राष्ट्रीय ट्राइबल फोर्स में बदलने की सोची-समझी रणनीति है। चाय जनजाति की ऐतिहासिक जड़ें छोटानागपुर (झारखंड) से जुड़ी हैं, इसलिए सोरेन श्रमिक अधिकार, भूमि सुधार और एसटी दर्जा के मुद्दे उठाकर खुद को ‘राष्ट्रीय आदिवासी नेता’ के रूप में स्थापित कर रहे हैं। “अबुआ राज” नारा अब असम के चाय बगानों तक पहुंच गया है।

सियासी समीकरण पर क्या असर? INDIA ब्लॉक में दरार या नई धुरी?

यह अभियान सिर्फ असम तक सीमित नहीं। यह झामुमो की राष्ट्रीय विस्तार की बड़ी परियोजना का हिस्सा है। हेमंत सोरेन की नजर देश के उन सभी राज्यों पर है, जहां आदिवासी आबादी निर्णायक है। कांग्रेस से अलग चुनाव लड़ने का फैसला विपक्षी वोटों के विभाजन का खतरा पैदा करता है, लेकिन झामुमो के लिए स्वतंत्र पहचान बनाने का सुनहरा मौका भी है।

असम में भाजपा की सत्ता को चुनौती देने के साथ ही सोरेन इंडिया ब्लॉक के अंदर भी नई शक्ति संतुलन की बिसात बिछा रहे हैं। क्या यह प्रयोग सफल होगा? चाय बागानों की पीड़ा, शिक्षा की कमी और आदिवासी अस्मिता के मुद्दे अगर जमीनी स्तर पर छाए तो झामुमो असम में नई जमीन तलाश सकती है। साथ ही, हेमंत सोरेन का यह कदम उन्हें झारखंड से बाहर राष्ट्रीय पटल पर मजबूत करता है।

आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा कि यह रणनीति झामुमो को कितना बड़ा विस्तार देती है और क्या सोरेन वाकई राष्ट्रीय ट्राइबल राजनीति के नए केंद्र बन पाते हैं।

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चाय बगानों से उठ रही सियासी क्रांति

हेमंत सोरेन की गोसाईंगांव रैली सिर्फ एक सभा नहीं है। यह आदिवासी राजनीति की नई लहर का संकेत है। झारखंड के मुख्यमंत्री अब असम की धरती पर ‘तीर-धनुष’ का प्रतीक बनकर खड़े हैं। अगर यह प्रयोग कामयाब हुआ तो 2026 के बाद झामुमो की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा और भी मजबूत हो जाएगी। असम चुनाव 2026 अब सिर्फ स्थानीय लड़ाई नहीं, बल्कि आदिवासी हक और पहचान की राष्ट्रीय जंग का अखाड़ा बन चुका है।

(स्रोत: घटना की रिपोर्ट्स और झामुमो की आधिकारिक गतिविधियां, 28-29 मार्च 2026)

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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