परिसीमन और महिला आरक्षण से बदल जाएगी झारखंड में राजनीति की पूरी तस्वीर?

Anand Kumar
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विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ी तो खुल जायेगा विधान परिषद के गठन का रास्ता

Ranchi | News Analysis

झारखंड की राजनीति आने वाले वर्षों में एक बड़े संरचनात्मक बदलाव के दौर में प्रवेश कर सकती है। विधानसभा सीटों के 81 से बढ़कर 121 से 125 तक पहुंचने, लोकसभा सीटों के 14 से 21 और राज्यसभा सीटों के 6 से 9 होने की संभावनाएं केवल संख्या का विस्तार नहीं हैं, बल्कि यह राज्य की राजनीतिक दिशा, प्रतिनिधित्व और सत्ता संतुलन को नए सिरे से परिभाषित करने वाला कदम साबित हो सकता है।

क्यों हो रहा है यह बदलाव?

इस संभावित बदलाव की पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार की दो अहम पहलें हैं – महिला आरक्षण को लागू करने की तैयारी और परिसीमन अधिनियम में संशोधन। सरकार की योजना है कि महिला आरक्षण को भविष्य की जनगणना से अलग कर 2011 की जनगणना के आधार पर जल्द लागू किया जाए। यदि यह संशोधन पारित होता है, तो पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा सीटों का पुनर्गठन होगा, जिसका सीधा असर झारखंड पर भी पड़ेगा।

सत्ता का समीकरण पूरी तरह बदलेगा

वर्तमान में झारखंड विधानसभा में 81 सीटें हैं और बहुमत का आंकड़ा 41 है। सीटों की संख्या बढ़कर 121 या 125 होने पर बहुमत का आंकड़ा 61 या 63 तक पहुंच सकता है। यह बदलाव राजनीतिक दलों की रणनीति को पूरी तरह बदल देगा, क्योंकि चुनावी गणित, गठबंधन की जरूरत और उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया सभी नए सिरे से तय करनी होगी।

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महिला राजनीति का होगा उभार

महिला आरक्षण लागू होने की स्थिति में झारखंड की राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव महिला नेतृत्व के उभार के रूप में सामने आ सकता है। यदि विधानसभा की कुल सीटें 125 तक पहुंचती हैं, तो इनमें से एक-तिहाई यानी 40 से अधिक सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इसी तरह लोकसभा और राज्यसभा में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी। इसका असर यह होगा कि पारंपरिक राजनीतिक ढांचे में नई पीढ़ी और नए चेहरे तेजी से उभर सकते हैं।

क्षेत्रीय असर: शहरी बनाम ग्रामीण राजनीति

परिसीमन की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण पहलू क्षेत्रीय संतुलन भी होगा। रांची, धनबाद, पलामू और हजारीबाग जैसे क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व अधिक होने के कारण यहां सीटों की संख्या बढ़ने की संभावना है। इसका मतलब यह है कि शहरी राजनीति का प्रभाव और बढ़ेगा, जबकि पारंपरिक ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों का राजनीतिक वजन तुलनात्मक रूप से बदल सकता है। खासकर पलामू जैसे बड़े भौगोलिक क्षेत्रों के विभाजन की संभावना भी जताई जा रही है।

झारखंड

सबसे संवेदनशील मुद्दा: एसटी आरक्षण पर असर?

हालांकि इस पूरे परिदृश्य में सबसे संवेदनशील मुद्दा अनुसूचित जनजाति (ST) सीटों का रहेगा। झारखंड की राजनीति में आदिवासी प्रतिनिधित्व केंद्रीय भूमिका निभाता रहा है। वर्तमान में 28 सीटें ST और 9 सीटें SC के लिए आरक्षित हैं। सीटों की संख्या बढ़ने के बाद यह सवाल उठेगा कि क्या आरक्षण का प्रतिशत उसी अनुपात में बना रहेगा या इसमें बदलाव होगा। यदि इसमें किसी प्रकार की कमी या पुनर्संतुलन होता है, तो यह बड़ा राजनीतिक विवाद बन सकता है।

दो सदनों की व्यवस्था

झारखंड में विधानसभा सीटों के 121 से 125 तक पहुंचने की संभावना के साथ एक और बड़ा संस्थागत बदलाव सामने आ सकता है। यदि सीटों की संख्या 100 से अधिक होती है, तो राज्य में विधान परिषद (Legislative Council) के गठन का रास्ता भी खुल सकता है। यानी झारखंड में एक सदन की जगह दो सदनों—विधानसभा और विधान परिषद—की व्यवस्था लागू हो सकती है।

इस स्थिति में राजनीति केवल प्रत्यक्ष चुनाव तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि विधान परिषद के जरिए भी राजनीतिक समीकरण बनने लगेंगे। पार्टियों के लिए यह एक अतिरिक्त मंच होगा, जहां वे उन नेताओं को भी समायोजित कर सकेंगी जो सीधे चुनाव नहीं जीत पाते, लेकिन संगठन या रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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दलों के लिए संभावित चुनौतियां

राजनीतिक दलों के लिए यह बदलाव एक चुनौती और अवसर दोनों लेकर आएगा। झामुमो को अपने पारंपरिक आदिवासी आधार को बनाए रखते हुए नई सीटों पर संगठन विस्तार करना होगा। कांग्रेस महिला आरक्षण और शहरी क्षेत्रों में बढ़ती सीटों के कारण अपने प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश करेगी। वहीं भाजपा के लिए शहरी सीटों में विस्तार और नई राजनीतिक जमीन तैयार करने का अवसर होगा।

झारखंड विधानसभा ने पहले भी दो बार सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा है, लेकिन परिसीमन नहीं होने के कारण यह संभव नहीं हो पाया था। अब केंद्र की सक्रियता के बाद यह संभावना फिर से मजबूत हुई है।

2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की आबादी करीब 3.29 करोड़ थी, जो अब अनुमानित रूप से 4.5 से 5 करोड़ के बीच मानी जा रही है। ऐसे में प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग को राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों आधार मिल रहे हैं।

बदलेगा सामाजिक-सियासी संतुलन

सीटों के परिसीमन का सबसे बड़ा आधार जनसंख्या होता है और यहीं से झारखंड की राजनीति का सबसे संवेदनशील पहलू सामने आता है। राज्य में कुल आबादी बढ़ी है, लेकिन आदिवासी समुदाय की आबादी का प्रतिशत घटने की बात लगातार सामने आती रही है। ऐसे में यदि परिसीमन के बाद आरक्षित सीटें जनसंख्या अनुपात के आधार पर तय होती हैं, तो अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों की संख्या में कमी आ सकती है।

यह मुद्दा नया नहीं है। वर्ष 2006 में भी इसी आशंका को लेकर झारखंड में परिसीमन पर रोक लगाई गई थी। उस समय राज्य के लगभग सभी राजनीतिक दलों और नेताओं ने केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की थी। लेकिन यदि 2029 के चुनाव से पहले परिसीमन लागू होता है, तो यह पुराना विवाद एक बार फिर प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।

ऐसी स्थिति में झारखंड की मौजूदा आदिवासी आधारित राजनीति में भी बदलाव देखने को मिल सकता है। अब तक राज्य की सत्ता और चुनावी समीकरणों का बड़ा आधार आदिवासी वोट बैंक रहा है, लेकिन आरक्षित सीटों में संभावित बदलाव से यह संतुलन प्रभावित हो सकता है।

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राजनीति के केंद्र में आ सकते हैं कुड़मी

इसी के समानांतर एक और सामाजिक-राजनीतिक समूह उभर सकता है- कुड़मी समुदाय। संख्या के लिहाज से प्रभावी होने के बावजूद कुड़मी समुदाय अभी तक झारखंड की राजनीति के केंद्र में नहीं रहा है। लेकिन कई ऐसे विधानसभा क्षेत्र हैं जहां कुड़मी मतदाताओं की अच्छी-खासी संख्या है, खासकर उन इलाकों में जो फिलहाल आदिवासी आरक्षित सीटों के अंतर्गत आते हैं।

यदि सीटों की संख्या बढ़ती है और परिसीमन के बाद नए सामान्य (जनरल) या मिश्रित सीटों का गठन होता है, तो ऐसे क्षेत्रों में कुड़मी समुदाय की राजनीतिक भूमिका मजबूत हो सकती है। इससे वे कई सीटों पर निर्णायक स्थिति में आ सकते हैं।

इस संभावित बदलाव का असर राजनीतिक दलों की रणनीति पर भी पड़ेगा। भाजपा, कांग्रेस और अन्य दलों को अपने उम्मीदवार चयन और सामाजिक समीकरणों में कुड़मी समुदाय को अधिक महत्व देना पड़ सकता है। यानी झारखंड की राजनीति में एक नए शक्ति केंद्र के उभरने की जमीन तैयार हो सकती है।

कुल मिलाकर, सीटों की संख्या में बढ़ोतरी केवल प्रतिनिधित्व का विस्तार नहीं, बल्कि राज्य की राजनीतिक संरचना, सामाजिक संतुलन और सत्ता के नए समीकरणों को जन्म देने वाली प्रक्रिया साबित हो सकती है।

यदि ये सभी बदलाव लागू होते हैं, तो 2029 का चुनाव झारखंड की राजनीति के लिए पूरी तरह नया अध्याय साबित हो सकता है। यह चुनाव पुराने समीकरणों से नहीं, बल्कि नए राजनीतिक नक्शे, नए नेतृत्व और नए सामाजिक संतुलन के साथ लड़ा जाएगा।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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