[स्थान: डिब्रूगढ़, तिनसुकिया और जोरहाट | 21 मार्च 2026]
By Our Special Corrospondent : असम के ऊपरी हिस्सों में फैले हरे-भरे चाय के बागान इस समय केवल चाय की पत्तियों की खुशबू नहीं, बल्कि चुनावी गहमागहमी से महक रहे हैं। डिब्रूगढ़ से लेकर तिनसुकिया तक, इन बागानों में रहने वाले करीब 70 लाख ‘टी-ट्राइब’ (चाय बागान मजदूर) इस बार असम विधानसभा चुनाव 2026 की दिशा तय करने वाले हैं।
हमने ऊपरी असम के उन इलाकों का जायजा लिया है, जहां झामुमो (JMM) अपनी जड़ें जमाने की कोशिश कर रहा है और भाजपा अपने गढ़ को बचाने में जुटी है।
280 की दिहाड़ी और ‘अधूरे’ वादे
चाय बागानों में सबसे बड़ा मुद्दा आज भी न्यूनतम मजदूरी है। हालांकि असम सरकार ने 1 अप्रैल 2026 से दिहाड़ी बढ़ाकर ₹280 (ब्रह्मपुत्र घाटी) करने का नोटिफिकेशन जारी कर दिया है, लेकिन ज़मीन पर श्रमिक इससे खुश नहीं हैं।
- श्रमिकों की आवाज़: तिनसुकिया के एक बागान में काम करने वाले बिरसा मुंडा (बदला हुआ नाम) कहते हैं, “केरल में 500 रुपये से ज्यादा दिहाड़ी मिलती है, यहां 280 रुपये में क्या होगा? चुनाव आते ही 30 रुपया बढ़ा दिया जाता है, लेकिन महंगाई उससे कहीं ज़्यादा है।”
- राजनीति: झामुमो इसी ‘मजदूरी की खाई’ को अपना हथियार बना रहा है। हेमंत सोरेन अपनी रैलियों में झारखंड के कल्याणकारी मॉडल और वहां के श्रमिकों की स्थिति का हवाला देकर यहां के लोगों को लामबंद कर रहे हैं।
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‘मिशन वसुंधरा’ और ज़मीन का पट्टा: भाजपा का मास्टरस्ट्रोक
ऊपरी असम में भाजपा के प्रति समर्थन की एक बड़ी वजह ‘मिशन वसुंधरा’ के तहत करीब 3.54 लाख परिवारों को डिजिटल लैंड पट्टा (ज़मीन का अधिकार) देना है।
- जमीनी हकीकत: 75 साल बाद पहली बार इन परिवारों को उस ज़मीन का मालिकाना हक मिला है जिस पर वे पीढ़ियों से रह रहे हैं। जोरहाट के चाय श्रमिकों के बीच यह मुद्दा भाजपा के पक्ष में एक मज़बूत ‘साइलेंट वेव’ (शांत लहर) पैदा कर रहा है।
ST दर्जे की मांग: दशकों पुराना ज़ख्म
असम के आदिवासियों (संताल, मुंडा, उरांव, खड़िया) की सबसे पुरानी मांग उन्हें अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देना है। फिलहाल वे असम में ओबीसी (OBC) श्रेणी में हैं।
- JMM की एंट्री: झामुमो का तर्क है कि जो जनजातियां झारखंड में अनुसूचित जनजाति (ST) में शामिल हैं, उन्हें असम में यह अधिकार क्यों नहीं? हाल ही में झारखंड के मंत्री चमरा लिंडा के नेतृत्व में एक डेलीगेशन ने यहां का दौरा कर इस मुद्दे को फिर से हवा दी है।
- पेचीदगी: जनवरी 2026 के सर्वे (Mood of Assam) के अनुसार, 45% लोग ST दर्जे के समर्थन में हैं, लेकिन मौजूदा जनजातियां इसका विरोध कर रही हैं। भाजपा इस पर ‘संतुलन’ बनाने की कोशिश कर रही है, जबकि झामुमो इसे ‘आर-पार’ की लड़ाई बता रहा है।
4. ‘झारखंडी’ बनाम ‘असमिया’ पहचान का द्वंद्व
डिब्रूगढ़ के बाज़ारों में चर्चा इस बात की है कि क्या हेमंत सोरेन का ‘झारखंडी नेतृत्व’ असम के आदिवासियों को स्वीकार्य होगा?
- कांग्रेस का डर: कांग्रेस को डर है कि JMM उनके पारंपरिक ‘टी-ट्राइब’ वोट बैंक में सेंध लगा देगा। कांग्रेस नेता बार-बार कह रहे हैं कि हेमंत सोरेन को ‘वोट कटवा’ बनने के बजाय गठबंधन धर्म निभाना चाहिए।
- स्थानीय संगठनों का रुख: ‘आसा’ (All Adivasi Students Association of Assam) जैसे संगठन फिलहाल तटस्थ दिख रहे हैं, लेकिन उनका झुकाव उस पार्टी की ओर होगा जो ‘स्थायी समाधान’ की गारंटी देगी।
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30 सीटों का गणित
ऊपरी असम की लगभग 30-35 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां चाय बागान श्रमिक हार-जीत तय करते हैं। यानी दिसपुर की गद्दी का रास्ता इन्हीं बागानों से होकर गुज़रता है। झामुमो का ‘तीर-धनुष’ अगर इन बागानों में अपनी जगह बना लेता है, तो यह उसकी बड़ी कामयाबी होगी और साथ ही हेमंत सोरेन राष्ट्रीय राजनीति में देश के सबसे बड़े आदिवासी नेता के रूप में स्थापित हो जायेंगे।