झारखंड की सियासी बिसात: जयराम का दावा, असम में झामुमो की दावेदारी और बंगाल में ‘रणनीतिक मौन’

Anand Kumar
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Anand Kumar
राजनीति में जो सतह पर शांत दिखाई देता है, अक्सर असली कहानी उसके नीचे उठ रहे बवंडर में छिपी होती है। झारखंड की वर्तमान सियासत इन दिनों कुछ ऐसे ही दौर से गुजर रही है, जहां सत्ता के गलियारों में बाहर से सब कुछ सामान्य नजर आ रहा है, लेकिन भीतर ही भीतर कई नई राजनीतिक धाराएं अपना रास्ता तलाश रही हैं।

झामुमो-कांग्रेस-राजद का 56 सीटों वाला महागठबंधन फिलहाल संख्या बल के लिहाज से पूरी तरह सुरक्षित और स्थिर प्रतीत होता है। लेकिन, राज्य की सियासत कई विविध और विरोधाभासी दिशाओं में कदम बढ़ा रही है। एक तरफ जहां झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) के अध्यक्ष और डुमरी से विधायक जयराम कुमार महतो राज्य में ‘गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस’ सरकार बनाने का दावा कर राजनीतिक फिजां में गर्मी पैदा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को राज्य की सीमाओं से परे ले जाकर असम में आक्रामक विस्तार की रणनीति पर काम कर रहा है।

इसके ठीक उलट, पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल के चुनावी परिदृश्य को लेकर झामुमो ने एक रहस्यमयी रणनीतिक मौन साध रखा है। इन तीनों घटनाक्रमों का बारीकी से विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि झारखंड की राजनीति आने वाले समय में एक बड़े संरचनात्मक बदलाव की ओर बढ़ रही है।

सबसे पहले बात उस युवा चेहरे की, जिसने झारखंड की स्थापित राजनीतिक पार्टियों की नींद उड़ा रखी है। ‘टाइगर जयराम’ के नाम से मशहूर डुमरी के विधायक जयराम महतो ने हाल ही में एक बेहद साहसिक और बड़ी राजनीतिक भविष्यवाणी की है। उनका स्पष्ट दावा है कि “आगामी राज्यसभा चुनाव के बाद राज्य में गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेसी विकल्प उभर सकता है।”

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यह महज़ एक साधारण बयान नहीं है, बल्कि उस आत्मविश्वास की उपज है जो उन्हें सड़क से लेकर विधानसभा तक के सफर में हासिल हुआ है। जयराम महतो के इस दावे ने राजनीतिक गलियारों में न सिर्फ हलचल मचाई है, बल्कि कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी को असहज भी कर दिया है। इसी असहजता का परिणाम था कि कांग्रेस विधायक नामन बिक्सल कोंगारी ने उनके इस दावे पर तीखा प्रहार करते हुए सवाल दागा, “क्या जयराम महतो भगवान हैं, जो भविष्यवाणी कर रहे हैं?”

भले ही आज विधानसभा में जयराम महतो के पास केवल एक सीट हो, लेकिन उनके राजनीतिक कद को सीटों की संख्या से आंकना एक बड़ी रणनीतिक भूल होगी। सियासत की इस नई धार पर चलता यह युवा नेता स्थानीय मुद्दों, खतियान आधारित पहचान और ‘बाहरी’ के खिलाफ झारखंडी भावनाओं को जिस तरह से हवा दे रहा है, उसने एक मजबूत जनाधार तैयार कर लिया है। 1932 के खतियान का मुद्दा और भाषा-संस्कृति की रक्षा की बात कर उन्होंने राज्य के उस युवा और ग्रामीण तबके की नब्ज पकड़ ली है, जो खुद को ठगा हुआ महसूस करता था।

विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि जयराम महतो की यह पूरी कवायद केवल बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक सुविचारित रणनीति है। वह राज्य में एक ऐसा नया राजनीतिक विकल्प या ‘तीसरा मोर्चा’ खड़ा करना चाहते हैं, जो भविष्य में किसी भी गठबंधन के लिए अपरिहार्य बन जाए। अगर आने वाले समय में सत्ताधारी महागठबंधन के भीतर जरा सी भी दरार उभरती है या छोटे-छोटे असंतोष गहरे होते हैं, तो जयराम महतो ‘किंगमेकर’ की एक बड़ी और निर्णायक भूमिका में नजर आ सकते हैं।

झारखंड की सीमाओं के भीतर जहां एक तीसरा मोर्चा आकार ले रहा है, वहीं झामुमो का नेतृत्व अब अपनी क्षेत्रीय पहचान को राष्ट्रीय पटल पर स्थापित करने की जद्दोजहद में है। बिहार के चुनावी अनुभवों के बाद झामुमो की नजरें अब सीधे तौर पर पूर्वोत्तर, विशेषकर 9 अप्रैल 2026 को होने वाले असम विधानसभा चुनाव पर टिक गई हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झामुमो ने असम में अपनी सक्रियता इस कदर बढ़ा दी है कि उसने वहां 30 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं।

इस आक्रामकता के पीछे का गणित बहुत सीधा है। असम के चाय बागानों में करीब 70 लाख आदिवासी वोटर बसे हुए हैं, जिनकी पैदाइशी और सांस्कृतिक जड़ें झारखंड से गहराई से जुड़ी हुई हैं। संथाली, मुंडा और उरांव समाज का यह विशाल तबका दशकों से असम की राजनीति में एक वोट बैंक रहा है, लेकिन उसे वह राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिला जिसका वह हकदार है। झामुमो के एक वरिष्ठ नेता ने पार्टी की इस रणनीति को स्पष्ट करते हुए कहा, “असम की बड़ी जनजातीय आबादी पार्टी के विस्तार के लिए अच्छा अवसर है।”

लेकिन झामुमो के लिए जो ‘अवसर’ है, वह उसकी अपनी ही सहयोगी पार्टी कांग्रेस के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है। असम में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभा रही कांग्रेस को यह डर सता रहा है कि अगर झामुमो वहां अकेले चुनाव लड़ती है, तो गैर-भाजपा और आदिवासी वोटों का सीधा बंटवारा होगा, जिसका अंतिम और सीधा लाभ सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को मिलेगा।

कांग्रेस की इस बेचैनी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि असम कांग्रेस के अध्यक्ष गौरव गोगोई ने विशेष रूप से रांची आकर हेमंत सोरेन से मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद राजनीतिक हलकों में यह खबर भी तैरी कि कांग्रेस झामुमो के लिए कुछ सीटें छोड़ने पर विचार कर सकती है, ताकि मूलभूत विपक्षी वोट एकजुट रहें। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बंधु तिर्की ने इसी चिंता को स्वर देते हुए स्पष्ट कहा, “असम की 38 सीटों में रहने वाले आदिवासी वोटर परिणाम तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे, इसलिए इंडिया ब्लॉक का एकजुट रहना जरूरी है।”

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कांग्रेस की तमाम चिंताओं और मान-मनौव्वल के बावजूद, झामुमो असम में पीछे हटने के मूड में कतई नहीं दिख रहा है। पार्टी ने चुनाव आयोग को अपने 20 स्टार प्रचारकों की सूची तक सौंप दी है, जो उसके इरादों की गंभीरता को दर्शाता है। झामुमो के महासचिव विनोद पांडेय ने पूरे आत्मविश्वास के साथ घोषणा की है, “अगले दो-तीन दिनों में असम के चुनाव की पूरी रणनीति बताई जाएगी। झामुमो निश्चित रूप से चुनाव लड़ेगा।” हालांकि, झामुमो नेता सुदिव्य कुमार ने एक कूटनीतिक बयान देते हुए कहा कि परिस्थितियों के हिसाब से ही गठबंधन का फैसला होगा।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद असम के दो दौरे कर चुके हैं और आदिवासी इलाकों में पार्टी के आधार को मजबूत करने की कवायद लगातार जारी है। कांग्रेस की पूरी कोशिश है कि झामुमो को गठबंधन के दायरे में बांधकर रखा जाए, अन्यथा विपक्षी वोटों का यह बिखराव कांग्रेस के लिए सत्ता वापसी की राह में एक बड़ा रोड़ा बन सकता है।

इस पूरी राजनीतिक रस्साकशी के पीछे एक बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण भी है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। झामुमो को बिहार विधानसभा चुनाव में हुआ वह कटु अनुभव और राजनीतिक अपमान आज भी याद है। बिहार चुनाव में जिस तरह झामुमो को महागठबंधन के भीतर आखिरी वक्त तक सीटें देने का आश्वासन देकर इंतजार कराया गया और फिर अंत में एक भी सीट नहीं दी गई, वह घटना हेमंत सोरेन के जहन में अब भी ताजा होगी। राजनीति में ऐसे जख्म इतनी जल्दी नहीं भरते। यही कारण है कि असम के मामले में झामुमो कांग्रेस के किसी भी वादे पर आंख मूंदकर भरोसा करने को तैयार नहीं है। पार्टी ने असम की जमीन पर ठीक-ठाक मेहनत की है और वह इस मेहनत को केवल गठबंधन धर्म के नाम पर कुर्बान नहीं करना चाहती।

असम में जहां झामुमो अपने पत्ते पूरी तरह खोल चुका है, वहीं मार्च-अप्रैल 2026 में होने वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों को लेकर पार्टी ने एक हैरान करने वाली चुप्पी साध रखी है। यह ‘रणनीतिक मौन’ कई सियासी कयासों को जन्म दे रहा है। गौरतलब है कि दिसंबर 2025 में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, हेमंत सोरेन ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी से सीमावर्ती कुछ सीटों पर पूर्व-सहयोग को लेकर बातचीत की थी। उस समय झामुमो ने बंगाल की 12 सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी, विशेषकर झाड़ग्राम, पुरुलिया और बांकुड़ा (जंगलमहल क्षेत्र) के उन इलाकों में जहां 2021 के चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को भाजपा के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। उस दौर में झामुमो के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने बयान दिया था, “हम पश्चिम बंगाल में पूर्व-सहयोग के लिए खुले हैं। फिलहाल बातचीत अनौपचारिक चरण में है।”

लेकिन, चुनाव की तारीखें नजदीक आ जाने के बावजूद झामुमो की तरफ से कोई पुख्ता फैसला या आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है। अभी तक न तो किसी गठबंधन का पर्चा सामने आया है और न ही पार्टी के बड़े नेता इस विषय पर खुलकर कुछ बोल रहे हैं। मीडिया और राजनीतिक हलकों में इसे झामुमो की ‘चुप्पी’ कहा जा रहा है, लेकिन राजनीति में मौन भी एक संवाद होता है।

इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि झामुमो ने गठबंधन के लिए अपने दरवाजे पूरी तरह से बंद नहीं किए हैं और वह संभावनाओं को खुला रखे हुए है। अंततः टीएमसी के साथ हाथ मिलाना है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि टीएमसी उन्हें कितनी तरजीह देती है। झामुमो अपनी उपस्थिति से बंगाल की सियासत में एक माथापच्ची बनाए रखना चाहता है, बिना अपनी ताकत को अनावश्यक रूप से बिखेरे।

निष्कर्षतः, झारखंड की राजनीति आज एक ऐसे चौराहे पर है जहां से राज्य के भविष्य की कई नई इबारतें लिखी जा रही हैं। सत्ताधारी महागठबंधन भले ही आज बहुमत के आंकड़े के साथ सुरक्षित हो, लेकिन इसके भीतर और बाहर चल रहे राजनीतिक मंथन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राज्य के भीतर जयराम महतो का “गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस” का नारा एक नए क्षेत्रीय उभार का प्रतीक है, जो स्थापित दलों के लिए खतरे की घंटी है। वहीं, राज्य के बाहर झामुमो का क्षेत्रीय विस्तारवाद गठबंधन की राजनीति के लिए एक नई चुनौती पेश कर रहा है।

असम में आक्रामकता और बंगाल में मौन, दोनों ही झामुमो की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हैं। आने वाले महीनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि जयराम महतो की राजनीतिक भविष्यवाणी हकीकत में तब्दील होती है या महज चुनावी शोर बनकर रह जाती है, और क्या हेमंत सोरेन का क्षेत्रीय विस्तार का दांव कांग्रेस के साथ उनके घरेलू समीकरणों की कीमत पर तो नहीं आ रहा।

सवाल-जवाब

सवाल: जयराम महतो की पार्टी का क्या नाम है?

  • जवाब: जयराम महतो की पार्टी का नाम झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) है।

सवाल: असम में झामुमो कितनी सीटों पर चुनाव लड़ रही है?

  • जवाब: झामुमो (JMM) ने असम विधानसभा चुनाव में करीब 30 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने के संकेत दिए हैं।

सवाल: जयराम महतो किस विधानसभा सीट से विधायक हैं?

  • जवाब: ‘टाइगर’ जयराम महतो झारखंड की डुमरी (धनबाद) विधानसभा सीट से विधायक हैं।
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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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