झारखंड में 1.64 लाख पद खाली, ‘अधियाचना’ के मकड़जाल और आउटसोर्सिंग के बीच फंसा युवाओं का भविष्य

Anand Kumar
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Jan-Man ki baat : किसी भी राज्य के विकास का पहिया उसके अधिकारियों और कर्मचारियों (मानव बल) पर निर्भर करता है। लेकिन झारखंड का सरकारी सिस्टम इस समय ‘हाफ इंजन’ पर चल रहा है। विधानसभा के बजट सत्र में मानव संसाधन प्रबंधन प्रणाली (Human Resource Management System) के जो आंकड़े सामने आए, वे केवल संख्या नहीं हैं, बल्कि राज्य की चरमराती प्रशासनिक व्यवस्था का आईना हैं।

राज्य में कुल 3,51,000 स्वीकृत पदों के मुकाबले 1,64,000 पद रिक्त हैं। यानी राज्य का करीब 45 प्रतिशत सरकारी ढांचा खाली कुर्सियों के सहारे काम कर रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच हुई बहस का अगर हम सूक्ष्म विश्लेषण (Micro-analysis) करें, तो तीन बड़े सवाल उभर कर सामने आते हैं।

1. ‘अधियाचना’ (Requisition) का पेंच: लालफीताशाही का सबसे बड़ा हथियार

सदन में मंत्री दीपक बिरुआ ने एक तकनीकी तर्क दिया कि ‘विभागों से अधियाचना आने पर ही JPSC और JSSC विज्ञापन निकालते हैं।’

यह शासन व्यवस्था में नियुक्तियों में देरी का यह सबसे क्लासिक बहाना है। अगर किसी विभाग (जैसे कृषि या स्वास्थ्य) में पद खाली हैं और विभागीय सचिव कार्मिक विभाग को रिक्ति का ब्यौरा (अधियाचना) नहीं भेज रहे हैं, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? विधायक सीपी सिंह का यह सवाल बिल्कुल जायज है कि क्या जनप्रतिनिधि या कैबिनेट मंत्री अपने ही सचिवों की खुशामद करेंगे? यह स्थिति दर्शाती है कि ब्यूरोक्रेसी (नौकरशाही) पर सरकार का नियंत्रण कमजोर है। अधियाचना भेजने की कोई ‘टाइम-लिमिट’ तय न होना इस पूरी व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी है।

2. 40 साल का गणित: नियुक्तियों की धीमी रफ्तार

सरकार की ओर से वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने दावा किया कि उनके कार्यकाल में 30,000 से ज्यादा नियुक्तियां की गई हैं।

यदि हम इस आंकड़े का गणितीय मूल्यांकन करें, तो तस्वीर चिंताजनक है। पिछले साढ़े चार वर्षों (लगभग 54 महीने) में 30,000 नियुक्तियां हुईं। इसका मतलब है कि सालाना औसतन 6,600 पदों पर बहाली हुई। विधायक सत्येंद्र नाथ तिवारी की गणना सटीक बैठती है कि अगर सरकार इसी रफ्तार से 1.64 लाख रिक्त पदों को भरेगी, तो इसके लिए लगभग 25 से 30 साल (या 40 साल) लग जाएंगे। यह उन लाखों युवाओं के साथ अन्याय है जो उम्र सीमा पार कर रहे हैं।

3. आउटसोर्सिंग का ‘सिंडिकेट’ और फंड की राजनीति

वर्तमान सरकार ने माना कि राज्य के कई विभाग आउटसोर्सिंग के भरोसे चल रहे हैं, हालांकि इसका ठीकरा पिछली सरकार पर फोड़ा गया।

आउटसोर्सिंग एक ऐसा ‘सॉफ्ट टारगेट’ बन गया है जिससे सरकारें अपनी पेंशन और भत्तों की जिम्मेदारी से बचती हैं। ठेकेदारी प्रथा ने सरकारी विभागों की कार्यकुशलता को बुरी तरह प्रभावित किया है। वित्त मंत्री ने सदन में स्पष्ट किया कि सरकार ‘दिवालिया’ (Bankrupt) नहीं है, लेकिन केंद्र से फंड न मिलने की बात कहकर उन्होंने अपनी राजनीतिक ढाल भी तैयार कर ली। सवाल यह है कि यदि वेतन देने के लिए पैसा है, तो रिक्तियों को भरने के लिए ‘संसाधन की कमी’ का तर्क क्यों दिया जा रहा है?

क्या होना चाहिए समाधान?

झारखंड को इस समय बहानेबाजी की नहीं, बल्कि एक ‘मिशन मोड’ की जरूरत है।

  1. जवाबदेही तय हो: जो विभागीय सचिव 30 दिनों के भीतर रिक्तियों की अधियाचना (Requisition) नहीं भेजते, उनके खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई होनी चाहिए।
  2. टास्क फोर्स का गठन: जेपीएससी और जेएसएससी को ‘फास्ट-ट्रैक’ पर लाने के लिए एक विशेष मॉनिटरिंग कमिटी बननी चाहिए।
  3. कैलेंडर का पालन: परीक्षाओं और नियुक्तियों का एक अकाट्य वार्षिक कैलेंडर लागू होना चाहिए।

जब तक सिस्टम से यह ‘अधियाचना का मकड़जाल’ नहीं हटेगा, तब तक झारखंड के युवा सड़कों पर भटकने और आंदोलन करने को मजबूर रहेंगे।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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