बिहार में भाजपा के लिए आसान नहीं है सुशासन

Anand Kumar
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अयोध्या नाथ मिश्र

बिहार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा में नामांकन और मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र को लेकर वैश्विक चर्चा में है। अब प्रश्न है, अगला मुख्यमंत्री कौन? यह प्रश्न-चर्चा सामान्य नहीं है। नीतीश कुमार ने न केवल मुख्यमंत्री पद की दो दशकों की लंबी पारी खेली है अपितु संपूर्ण कठिनाइयों के बावजूद एक नयी सामाजिक राजनीतिक, प्रशासनिक संस्कृति के उद्धव का सफल प्रयत्न किया है। नब्बे के दशक की राजनीतिक संस्कृति के बाद वर्तमान मुख्यमंत्री की राजनीतिक कार्यशैली साझे की सरकारों के लिए एक प्रतीक है, उदाहरण है। उन पर की जाती रही राजनीतिक फब्तियां, टिप्पणियां अर्थहीन रही हैं।

लोकतंत्र की जननी बिहार ने, पाटलिपुत्र की गंगा ने इतिहास के अनेक अभिनव पृष्ठों, कथानकों का रेखांकन किया है। न केवल नंद वंश के विनाशक चाणक्य की रणनीति और चंद्रगुप्त के अभ्युदय की गाथा लिखी है बल्कि कई बार प्रजातांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए इतिहास गढ़ा है। आंशिक ही सफल संपूर्ण क्रांति का बिगुल भी यहीं की भूमि की हुंकार था।

जैन बौद्ध धर्म की व्याप्ति  और सर्वधर्म  की भाव भूमि भी रही है बिहार की माटी। बड़ा परिपक्व है यहां का राजनीतिक सामाजिक चिंतन‌,  भले ही कालक्रम से इसे वरदान की जगह कुछ और मान लिया गया हो। इसमें राजनीति का बहुत बड़ा हाथ है। 

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प्रकारांतर से राज्य ने कुशासन और अनाचार की पराकाष्ठा का काल भी देखा। ऐसे में नीतीश ने बिना वृहद आधार, बड़ी राजनीतिक पूंजी और परंपरा के किंचित आत्मिक शुचिता के आधार पर एक बार राज्य को दिशा बोध कराया। परिस्थितियां चाहे जो बनी हों, वह मेरा विषय नहीं है, पर अगला मुख्यमंत्री कैसा हो यह प्रश्न तो बड़ा है ही? वैसे  तो लोकतंत्र में जनता जिसे मुकुट पहनावे अर्थात सत्ता संचालक जिसे बिठा दे। ऐसे में कभी-कभी राजनीति को समाज के जीवन में झांक कर समस्याओं का समाधान करना चाहिए। एक पक्षीय  नहीं! कभी लोगों की भी तो सुनो भाई! उनकी पीड़ा को सहलाने, उससे समवेत होना और कभी-कभी सम अनुभूति का भाव रखना भी सुशासन का सबसे बड़ा मंत्र हो सकता है। 

आज यह प्रश्न है और चारों ओर घूम कर अपना समाधान ढूंढ रहा है। जल्दी ही कोई आएगा चाहे वह चर्चित चेहरा हो या सूक्ष्म परीक्षित अथवा कोई मसीहाई सूरमा। पर उसके सामने अनेक यक्ष प्रश्न होंगे ही! सबसे बड़ा प्रश्न होगा नीतीश की विश्वसनीयता, प्रशासन के विविध तत्वों जो लंबे अरसे से एक गति संस्कृति का अभ्यस्त हो गया है, उसके साथ सामंजस्य से पूर्ण “शासन का अदब”। अर्थात ठोस परिणामी प्रयास की प्रतिबद्धता और उसका बोध। इसी के साथ जातिगत समूहगत वर्ग गत और किंचित स्वार्थगत अपेक्षाओं कुंठाओं का सहज सरल समाधान भी मुंह बाए खड़ा होगा! 

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संभव है केंद्र सरकार भाजपाई मुख्यमंत्री को चुनौतियों को देखते हुए पूर्व की अपेक्षा अधिक संसाधन समर्थित कर आगे बढ़ाने में मदद करे, पर राज्य स्व संसाधन के मामले में आगे आएगा या अपेक्षा अनुकूल वृद्धि कर पाएगा, यह मुद्दा राज्य के समक्ष खड़ा तो है। हाल में जो बजट सामने आया है उसका निहितार्थ यही है कि राज्य की सार्वदेशिक अपेक्षाओं के लिए, संपर्क की सड़क और घरों में अहर्निश जलने वाले बल्ब ही पर्याप्त नहीं है। जब बिहार के सभी संसाधन प्राकृतिक, मानवीय, तकनीकी, वाणिज्यिक परिणामी प्रयास को प्रबंधित होंगे तो स्वरूप बदलेगा। घरों में न्यूनतम समर्थित बिजली की रोशनी के साथ उत्पादक संस्कृति का एक और बल्ब जलाकर ही क्रमिक समृद्धि लाई जा सकती है।

शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन, राजस्व संग्रहण में जो अराजक दशा है, उससे उबरना ही बिहार का सुशासन होगा। ऐसे में भाजपाई मुख्यमंत्री कितना आगे निकलेगा समय बताएगा, बिहार प्रतीक्षारत भी है। 

आज उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कई मामलों में समग्र विकास के, सुशासन के प्रतीक बन गए हैं। बड़ी बात है, उनके विरोधी भी राजहित के पहलुओं पर निंदा नहीं करते। पर हर जगह एक ही फसल कहां होती है! योगी यूपी में हैं बिहार में नहीं! बिहार के मुख्यमंत्री के मूल्यांकन के लिए नीतीश ने बड़ी लकीर खींच दी है। अभाव में प्रयास की दक्षता, उलझन के बीच से समाधान। यह बड़ा टास्क है भाजपा के नीति-नियामकों के सामने अर्थात मोदी -शाह के सामने। यदि किसी और की राय या निर्देशन प्रभावोत्पादक हो तो उसके लिए भी।

भाजपाई मुख्यमंत्री के लिए भाजपा के प्रति लोक विश्वास समेटने की चुनौती तो है ही, अन्य मूर्धन्य मानकों, मूल्यों को भी सहेजने के ज्वलंत प्रश्न सामने खड़े हैं !

जनसंघ- भाजपा की रीति नीति से जो परिचित हैंं, वह जानते हैं कि वह नई पौध तैयार करती है। इसी को दूसरे शब्दों में कैडर कहा गया है। वह कैडर नीचे से ऊपर तक सुव्यवस्थित एवं परिष्कृत परिमार्जित होते रहा है। पर आज सत्तात्मक राजनीतिक अपेक्षाएं तेजी से बलवती हो गई हैं तथा कैडर कुछ हद तक उदास है, ठगा महसूस करता है। इसके अपने निहितार्थ हैं और सत्ता की राजनीति की अलग विवशताएं भी हैं और रहेंगी। पर कैडर तो है और वैचारिकी के आधार पर कमोबेश आगे भी बना रहेगा, आप उसकी सुनिए या अपेक्षा कीजिए। शेष तो चतुर चालाक लोग सत्ता सुख की साझेदारी के लिए सब कुछ गिरवी रख कितनी नावों में कितनी बार छलांग लगाएंगे ही।

भाजपा की पूंजी अक्षत है, भाजपा का शीर्ष इसे बखूबी समझता है और यथा अपेक्षित उपयोग करना भी जानता है। उसे तो विविध धाराओं के बीच से अपनी नांव निकालनी है, मजबूती के साथ। भाजपा का संघ प्रतीक्षित नेतृत्व “Not to loose sunt”  की थ्योरी को जानता है। इसलिए संघ से अनुप्राणित भाजपाई राजनीति गाढ़ी नींद में नहीं सोती है ,वह सामयिक और चौक-चौराहे की भाषा के प्रति अभ्यस्त हो गई है।

बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री का पद पहली बार भाजपा को मिलने वाला है, यह एक अवसर है दूर की राजनीतिक चुनौती भी, नेतृत्व इसे कैसे भूलेगा। जनता पार्टी कार्यकाल में जनसंघ की सर्वाधिक सदस्यता के कारण मंत्रिमंडल में वर्चस्व तो था, पर दोनों ही बार मुख्यमंत्री दूसरे दलों के बने। यह बात अलग है कि जनसंघ के नेता कैलाशपति मिश्र का कालक्रम से कैबिनेट में वर्चस्व था। रही बात आज की तो भाजपा की भी परीक्षा यही होगी “चढ़े तो चाखै प्रेम रस …।

नीतीश के चर्चित सुशासन ने मार्ग बनाने का प्रयास किया है पर कई सामाजिक प्रशासनिक आर्थिक शक्तियां उसमें छेद करने के लिए उद्धत हैं। देखना है बीजेपी कौन सा अभिनव प्रयोग बिहार के लिए लेकर आती है। समय के चाणक्य के सामने किसी चंद्रगुप्त को लाने की चुनौती बिहार विकास के आईने में सर्वाधिक महत्व रखती है! यह प्रयोग प्रयास और परीक्षा तीनों है।

(नोट – लेखक सामाजिक, आर्थिक, संसदीय अध्ययन केंद्र के सचिव हैं और लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैंं।)

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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