Gumla : गुमला सदर प्रखंड के तिलगा गांव में रविवार को आयोजित सामूहिक विवाह समारोह ने 121 जोड़ों को वैवाहिक बंधन में बांधते हुए उन्हें सामाजिक पहचान और सम्मान दिलाया। यह आयोजन नवयुवक संघ की पहल पर हुआ, जिसने वर्षों से सामाजिक बहिष्कार झेल रहे परिवारों को मुख्यधारा में लौटने का अवसर दिया।
तेलगांव पंचायत स्थित सामुदायिक भवन परिसर में आयोजित सामूहिक विवाह समारोह ने न केवल 101 जोड़ों को वैवाहिक बंधन में जोड़ा, बल्कि ‘ढुकू’ प्रथा से जुड़े सामाजिक कलंक को समाप्त करने की दिशा में भी एक ठोस संदेश दिया। आयोजन पूर्व थानेदार एवं समाजसेवी जगन्नाथ उरांव के संरक्षण और नेतृत्व में संपन्न हुआ।
विभिन्न राज्यों से पहुंचे जोड़े
इस आयोजन में झारखंड के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों से भी जोड़े शामिल हुए।
- ओडिशा से 3 जोड़े
- छत्तीसगढ़ से 7 जोड़े
- लोहरदगा जिले से 9 जोड़े
- गुमला जिले के विभिन्न प्रखंडों से आए जोड़ों सहित कुल 101 जोड़े विवाह बंधन में बंधे
इनमें सदान समाज के 20 जोड़े भी शामिल रहे। इस तरह समारोह ने सामाजिक समरसता और अंतरराज्यीय सहभागिता का संदेश दिया।
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लिव-इन में जी रहे थे, समाज ने नहीं किया स्वीकार
विवाह बंधन में बंधे अधिकतर जोड़े वे थे, जो विभिन्न सामाजिक कारणों से वर्षों से लिव-इन संबंध (‘ढुकू प्रथा’ ) में जीवन बिता रहे थे। सामाजिक स्वीकृति के अभाव में उन्हें किसी भी शुभ-अशुभ कार्यक्रम में शामिल होने से वंचित रखा जाता था। कई परिवारों को पैतृक संपत्ति के अधिकार से भी वंचित कर दिया गया था।
इस अस्वीकार्यता का असर अगली पीढ़ी तक पहुंचा। उनके बच्चे वयस्क हो गए, लेकिन सामाजिक मान्यता नहीं होने के कारण उनकी शादियां भी तय नहीं हो पा रही थीं। सामूहिक विवाह ने इस लंबे सामाजिक गतिरोध को तोड़ने का प्रयास किया।
एक ही मंडप में मां और बेटी ने लिए फेरे
समारोह का सबसे भावनात्मक क्षण तब आया, जब आश्रिता उरांव अपने होने वाले पति के साथ फेरे ले रही थीं, और उसी मंडप में उनकी मां झांझो उरांइन अपने पति विष्णु उरांव के साथ वैवाहिक संस्कार पूरा कर रही थीं। एक ही मंडप के नीचे दो पीढ़ियों का वैवाहिक बंधन में बंधना सामाजिक बदलाव का प्रतीक बना।
कई जोड़े ऐसे थे, जिनकी गोद में बच्चे थे। कुछ महिलाएं पहले से मां थीं, तो कुछ उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुंचकर सामाजिक मान्यता पाने आई थीं। उनके लिए यह केवल रस्म नहीं, बल्कि सम्मान की पुनर्स्थापना थी।
क्या है ‘ढुकू’ प्रथा और क्यों बना कलंक?
स्थानीय जनजातीय समाज में ‘ढुकू’ उस स्थिति को कहा जाता है, जब युवक-युवती सामाजिक या पारिवारिक कारणों से बिना औपचारिक विवाह के साथ रहने लगते हैं। वर्षों से यह व्यवस्था सामाजिक अस्वीकृति, बहिष्कार और अधिकारों के हनन का कारण बनती रही। सामूहिक विवाह ने ऐसे संबंधों को वैधानिक और सामाजिक मान्यता दिलाने का प्रयास किया।
वैदिक मंत्र और जनजातीय परंपरा का संगम
विवाह समारोह में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ-साथ जनजातीय परंपराओं के गीत भी गूंजे। इससे आयोजन में सांस्कृतिक समन्वय का दृश्य देखने को मिला। यह कार्यक्रम केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्स्वीकृति का सार्वजनिक घोषणा-पत्र बन गया।
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समाज में वापसी का रास्ता
आयोजन के बाद अब इन जोड़ों और उनके परिवारों को सामाजिक कार्यक्रमों में भागीदारी का अधिकार मिलेगा। बच्चों के भविष्य पर मंडरा रहा अनिश्चितता का बादल छंटेगा। सामूहिक विवाह ने यह संदेश दिया कि सामाजिक सुधार की पहल समुदाय के भीतर से भी संभव है।
कार्यक्रम को सफल बनाने में नवयुवक संघ के संस्थापक सह सेवानिवृत्त पुलिस पदाधिकारी जगरनाथ उरांव, सेवानिवृत्त प्रशासनिक पदाधिकारी पुनई उरांव, सेवानिवृत्त कृषि पदाधिकारी विजय कुजूर और अन्य लोगों की सक्रिय भागीदारी रही।
तिलगा गांव की यह पहल दर्शाती है कि यदि समाज सामूहिक इच्छा से आगे बढ़े, तो वर्षों की दूरी और बहिष्कार को भी संवाद और स्वीकार्यता से समाप्त किया जा सकता है।