Ayodhya Nath Mishra
(लेखक संसदीय एवं विधायी मामलों के विद्वान हैं)
संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष वह आईना है जिसके माध्यम से जन समस्यायें, लोकहित, सर्वजन हिताय नीतियां और चुनौतियों के सार्थक समाधान प्रतिबिंबित होते हैं। कार्यपालिका, विधायिका (ब्यूरोक्रेसी और लोक प्रतिनिधित्व) संसद और विधान मंडलों में संवैधानिक एवं संसदीय संव्यवहारों आचरणों के माध्यम से जनता के प्रति लोक उत्तरदायित्व का निर्वहन करती है।
संसद और विधान मंडलों के कार्य संचालन, उत्तरदायित्व या कर्तव्य बोध में संसदीय परम्पराओं, नियमनों एवं सर्वस्वीकार्यता आधारित प्रतीकों को भी समान अहमियत प्राप्त है। इन्हीं के बीच संसदीय मूल्यों मानकों की मर्यादा प्रत्येक पक्ष के लिए स्वीकार्य और समादरणीय होती हैं। विचलन, व्यतिरेक या किंचित अपवाद संसदीय प्रविधि या मर्यादा को प्रभावित नहीं करते।
विधानसभा/मंडल में संवैधानिक उपबंध के तहत माननीय राज्यपाल नवगठित विधानसभा/मंडल के प्रथम सत्र और वर्ष के प्रथम सत्र में अभिभाषण देते हैं, जिस पर सभा द्वारा आभार व्यक्त किये जाने की संसदीय परंपरा है। चूंकि यह अभिभाषण राज्य की नीति, विकास, ग्रोथ, कार्यप्रणाली अवं कार्यक्रम का उत्तरदायित्वपूर्ण प्रकटीकरण होता है, एतदर्थ सत्तापक्ष द्वारा पेश धन्यवाद प्रस्ताव पर विपक्ष अपनी दृष्टि में लोकहित के बिंदुओं को रखने के लिए प्रस्ताव पर संशोधन देता है।
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यही कारण है कि धन्यवाद प्रस्ताव पर प्राय: दो दिनों तक विमर्श/चर्चा होती है। अंत में सभा माननीय राज्यपाल का समवेत आभार प्रकट करती है। इस संशोधन के पीछे विमर्श में सम्यक सहभागिता का भाव निहित है जिसके केंद्र में लोक प्रतिनिधित्व होता है। खबरों के अनुसार झारखंड विधानसभा में प्रतिपक्ष अर्थात एनडीए ने इस आशय के धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकहित में संसदीय परम्पराओं को हाशिए में रखते हुए त्ता पक्ष के धन्यवाद प्रस्ताव पर संशोधन नहीं दिया।
तात्विक रूप से इसका दायित्व भाजपा पर आता है, जिसकी सदस्य संख्या अधिक है और जिसके विधायक दल के नेता को नेता, प्रतिपक्ष की आधिकारिता प्राप्त है। सदन में परंपरा के आलोक में संशोधन नहीं देने के अपने तर्क हो सकते हैं। पर वे संसदीय परम्पराओं से उपर नहीं होंगे। ऐसा भी नहीं कि विपक्षी सदस्यों को इस संदर्भ में कहने के लिए कुछ नहीं होगा! आश्चर्य तो यह है कि विपक्ष के किसी भी दल की ओर से यह बात नहीं आई।
सरकार या सदस्यों द्वारा सदन में विविध प्रस्ताव रखे जाते हैं, इनमें बजट, अनुपूरक मांगें, विधेयक, विशेषाधिकार या सदस्यों के निजी विधेयक आदि शामिल हैं। सब पर कटौती (मांगों पर), संशोधन (विधेयकों पर) सदस्यों, खासकर विपक्षी सदस्यों द्वारा दिए जाते हैं। इसके पीछे प्रतिनिधिक दायित्व हीं होता है। अब यह विपक्ष जाने कि उसने धन्यवाद प्रस्ताव पर संशोधन देना संसदीय संव्यवहार क्यों नहीं माना? उसके लिए अभिभाषण में निहित सरकार की नीतियां, कार्यक्रम, योजनाएं सहज स्वीकार्य क्यों हो गयीं या उनमें उनके मन की ही बातें थीं, पर सामान्य नागरिकों के लिए यह ग्राह्य क्यों हो! वह तो मुखर विपक्षी स्वरों के माध्यम से अपनी पीड़ा का प्रकटीकरण चाहता है, सदन में।
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