Ranchi : झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा 2025, जिसे 14वीं JPSC के रूप में जाना जा रहा है, में अधिकतम उम्र सीमा को लेकर चल रहे विवाद के बीच अभ्यर्थियों को बड़ी राहत मिली है। मामले में दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए झारखंड उच्च न्यायालय ने आयोग को निर्देश दिया है कि याचिका दायर करने वाले अभ्यर्थियों को ऑफलाइन आवेदन फॉर्म भरने की अनुमति दी जाए।
न्यायमूर्ति आनंद सेन की अदालत में सुनवाई
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति आनंद सेन की अदालत में हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रस्तुत पक्ष में कहा गया कि आयोग द्वारा निर्धारित अधिकतम उम्र सीमा के कारण करीब 200 से अधिक अभ्यर्थी आवेदन करने से वंचित हो गए हैं। अदालत ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर मानते हुए अंतरिम राहत प्रदान की है।
क्या है पूरा विवाद?
दरअसल, झारखंड लोक सेवा आयोग ने विज्ञापन संख्या 01/2026 के तहत 14वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा के लिए अधिकतम उम्र सीमा की गणना की कट-ऑफ तिथि 1 अगस्त 2026 निर्धारित की है। अभ्यर्थियों का तर्क है कि आयोग नियमित अंतराल पर परीक्षाएं आयोजित नहीं कर पाया, जिसके कारण बड़ी संख्या में योग्य उम्मीदवार बिना परीक्षा दिए ही अधिकतम आयु सीमा पार कर चुके हैं।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि आयोग समय पर परीक्षा आयोजित करता, तो वे उम्र सीमा के भीतर रहते। ऐसे में अधिकतम उम्र की गणना 1 अगस्त 2018 से की जानी चाहिए, ताकि परीक्षा में देरी का खामियाजा अभ्यर्थियों को न भुगतना पड़े।
देरी का संस्थागत असर और कानूनी सवाल
यह विवाद केवल व्यक्तिगत राहत का प्रश्न नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का मुद्दा भी बन गया है। लोक सेवा आयोग जैसी संवैधानिक संस्था से अपेक्षा की जाती है कि वह निर्धारित समय-सारणी के अनुरूप भर्ती प्रक्रिया पूरी करे। लंबे अंतराल के कारण प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे अभ्यर्थियों के करियर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
हाईकोर्ट का यह अंतरिम आदेश फिलहाल केवल याचिका दायर करने वाले अभ्यर्थियों तक सीमित है, लेकिन अंतिम निर्णय व्यापक प्रभाव डाल सकता है। यदि अदालत उम्र गणना की तिथि में संशोधन का निर्देश देती है, तो यह राज्य की भविष्य की भर्ती प्रक्रियाओं के लिए भी नजीर बन सकता है।
विधानसभा में भी गूंजा मुद्दा
उम्र सीमा का यह विवाद अदालत तक सीमित नहीं रहा। यह मुद्दा झारखंड विधानसभा में भी उठ चुका है। विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के कुछ विधायकों ने भी कट-ऑफ तिथि पर पुनर्विचार की मांग की थी। खासकर विधायक प्रदीप यादव ने इस विषय को प्रमुखता से उठाया था। संसदीय कार्य मंत्री ने भी सदन में आश्वासन दिया था कि सरकार इस मसले पर गंभीरता से विचार करेगी।
आगे क्या?
अब निगाहें अदालत की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। यदि आयोग और राज्य सरकार इस मामले में समन्वित समाधान नहीं निकालते, तो यह विवाद और लंबा खिंच सकता है। फिलहाल याचिकाकर्ता अभ्यर्थियों को ऑफलाइन आवेदन की अनुमति मिलना एक महत्वपूर्ण अंतरिम राहत माना जा रहा है।