कल पेश हो रहे आम बजट में टैक्स को लेकर कोई राहत भरा कदम उठाया जाता है, तो बाजार में दोबारा तेजी देखने को मिल सकती है
Jan-man Desk : भारतीय शेयर बाजार में लगातार गिरावट को देखकर निवेशकों के मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा है कि आखिर बाजार क्यों टूट रहा है और विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) भारत से पैसा क्यों निकाल रहे हैं। क्या भारत की ग्रोथ स्टोरी कमजोर पड़ गई है या इसके पीछे कोई और ठोस कारण हैं। और क्या 1 फरवरी को पेश हो रहे बजट में इसके लिए कोई प्रावधान किया जायेगा कि एफआईआई को वापस लाया जा सके।
आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2025 में एफआईआई ने भारतीय बाजार से 1.66 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की निकासी की। 2026 की शुरुआत होते ही फिर से भारी बिकवाली देखने को मिली है। बाजार जानकारों का मानना है कि इसके पीछे एक नहीं, बल्कि छह बड़े फैक्टर एक साथ काम कर रहे हैं।
एफआईआई क्या होते हैं
एफआईआई वे विदेशी संस्थागत निवेशक होते हैं, जिनमें विदेशी म्यूचुअल फंड, पेंशन फंड और हेज फंड शामिल हैं। ये भारत के शेयर, बॉन्ड और अन्य वित्तीय बाजारों में निवेश करते हैं। एफआईआई की खरीदारी से बाजार में तेजी आती है और रुपया मजबूत होता है, जबकि बिकवाली से बाजार दबाव में आ जाता है और रुपये पर भी असर पड़ता है।
2025 में एफआईआई ने सेकेंडरी मार्केट में करीब 2.4 लाख करोड़ रुपये के शेयर बेचे। प्राइमरी मार्केट से कुछ निवेश जरूर आया, लेकिन कुल मिलाकर तस्वीर नकारात्मक ही रही।
वजह 1 : रुपये की गिरावट ने रिटर्न खत्म कर दिया
एफआईआई की बिकवाली की सबसे बड़ी वजह रुपये की कमजोरी है। 2025 में रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 5.8 प्रतिशत गिरा और प्रमुख वैश्विक मुद्राओं में सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वालों में शामिल रहा।
जनवरी 2025 में एक डॉलर करीब 86 रुपये का था, जबकि जनवरी 2026 में यह 91 रुपये के आसपास पहुंच गया। डॉलर में सोचने वाले विदेशी निवेशकों के लिए इससे भारत में निवेश महंगा और ज्यादा जोखिम भरा हो गया।
कैलकुलेशन से समझिए
मान लीजिए किसी अमेरिकी एफआईआई ने जनवरी 2025 में भारत में 1 लाख डॉलर निवेश किए। उस समय डॉलर 86 रुपये का था, यानी उसने 86 लाख रुपये लगाए। अगर पूरे साल में बाजार से करीब 7 प्रतिशत का रिटर्न मिला, तो रकम बढ़कर करीब 92.2 लाख रुपये हो गई। इसमें करीब 6.2 लाख रुपये का मुनाफा हुआ।
अब इस मुनाफे पर 12.5 प्रतिशत लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगता है, यानी करीब 75 हजार रुपये टैक्स देने के बाद निवेशक के हाथ में करीब 91.26 लाख रुपये बचे।
लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती। जब निवेशक यह रकम डॉलर में वापस बदलता है, तब डॉलर 91 रुपये का हो चुका होता है। ऐसे में उसे करीब 1,01,294 डॉलर मिलते हैं। यानी पूरे साल का शुद्ध रिटर्न सिर्फ 0.29 प्रतिशत रह जाता है। रुपये की गिरावट और टैक्स ने विदेशी निवेशक का लगभग पूरा मुनाफा खा लिया।
वजह 2 : अमेरिका में वही पैसा ज्यादा कमाई कर रहा है
अगर वही 1 लाख डॉलर अमेरिका के शेयर बाजार में लगाए जाते, तो न करेंसी रिस्क होता और न ही विदेशी निवेशकों पर कैपिटल गेन टैक्स का बोझ। अमेरिकी बाजार में औसतन 16 प्रतिशत से ज्यादा का रिटर्न मिला, यानी सीधे डॉलर में शुद्ध मुनाफा। यही कारण है कि एफआईआई भारत की तुलना में अमेरिका को ज्यादा आकर्षक मान रहे हैं।
वजह 3 : चीन में रिटर्न, टैक्स और करेंसी तीनों का फायदा
चीन के बाजारों ने भी विदेशी निवेशकों को आकर्षित किया। वहां बाजार ने करीब 27 प्रतिशत का रिटर्न दिया, टैक्स दर भारत से कम रही और करेंसी भी मजबूत हुई। नतीजा यह रहा कि डॉलर में निवेश करने वाले एफआईआई को चीन में करीब 30 प्रतिशत तक का रिटर्न मिला, जो भारत और अमेरिका दोनों से ज्यादा है।
वजह 4 : वैश्विक जियोपॉलिटिकल तनाव
यह समस्या सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। पूरी दुनिया में जियोपॉलिटिकल टेंशन बढ़ी हुई है। अमेरिका और यूरोप के बीच टैरिफ विवाद, रूस से जुड़े प्रतिबंध, ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता और अन्य अंतरराष्ट्रीय घटनाओं ने निवेशकों को सतर्क कर दिया है।
ऐसे माहौल में विदेशी निवेशक जोखिम वाले शेयर बाजारों से पैसा निकालकर सोना, बॉन्ड और अन्य सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख करते हैं। इसी वजह से भारत समेत कई उभरते बाजारों से पूंजी बाहर जा रही है।
वजह 5 : भारतीय बाजार की ऊंची वैल्यूएशन
भारतीय शेयर बाजार की वैल्यूएशन भी एक कड़वा सच है। निफ्टी का पीई रेशियो अपने लंबे समय के औसत से ऊपर बना हुआ है। लार्ज कैप, मिड कैप और स्मॉल कैप, तीनों सेगमेंट में शेयर ऐतिहासिक औसत से महंगे दिख रहे हैं।
जब डॉलर टर्म में भारत में रिटर्न 1–2 प्रतिशत के आसपास सिमट जाए और दूसरी ओर अमेरिका या चीन में 15–30 प्रतिशत तक का रिटर्न मिले, तो एफआईआई स्वाभाविक रूप से वहीं पैसा लगाना पसंद करते हैं जहां वैल्यू दिखती है।
वजह 6 : कमजोर कॉरपोरेट नतीजे और घरेलू दबाव
घरेलू मोर्चे पर भी हालात पूरी तरह अनुकूल नहीं रहे। हालिया तिमाही नतीजों में कई बड़ी कंपनियों के प्रदर्शन उम्मीद से कमजोर रहे। पिछले क्वार्टर में केवल करीब 17 प्रतिशत कंपनियां ही मजबूत ग्रोथ दिखा पाईं, जबकि बाकी कंपनियों के नतीजे कमजोर रहे या अनुमान घटाए गए।
इसके अलावा, एफपीआई के लिए टैक्स नियम पहले से ही सख्त बने हुए हैं, जिससे भारत में निवेश का आकर्षण और कम हुआ है। दूसरी ओर चीन लगातार अपने बाजार को सहारा देने के लिए स्टिमुलस पर स्टिमुलस और सुधारात्मक कदम उठा रहा है। मजबूत रिफॉर्म, सरकारी समर्थन और नीतिगत स्पष्टता के कारण चीन विदेशी निवेशकों को भारत की तुलना में ज्यादा आकर्षक नजर आ रहा है।
इन सभी कारणों को देखते हुए विदेशी संस्थागत निवेशक भारत से पैसा निकालकर दूसरे देशों की ओर रुख कर रहे हैं। बाजार जानकारों के मुताबिक यही वे छह ठोस वजहें हैं, जिनके चलते एफआईआई लगातार भारतीय बाजार से बाहर जा रहे हैं।
एफआईआई की वापसी कब संभव
हालांकि तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। भारत की जीडीपी ग्रोथ अब भी मजबूत बनी हुई है और घरेलू संस्थागत निवेशक लगातार बाजार को सपोर्ट कर रहे हैं। जैसे ही कॉरपोरेट अर्निंग्स में सुधार आएगा या एक फरवरी को पेश होनेवाले आम बजट में टैक्स को लेकर कोई राहत भरा कदम उठाया जाता है, तो बाजार में दोबारा तेजी देखने को मिल सकती है। टैक्स स्ट्रक्चर में नरमी और निवेशकों के लिए अनुकूल संकेत एफआईआई की वापसी का बड़ा ट्रिगर साबित हो सकते हैं।