walter hauser : सात समंदर पार से बिहार लौटा एक बेटा : स्वामी सहजानंद के सच्चे अमेरिकी साधक की अंतिम यात्रा

Anand Kumar
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अमेरिका से गंगा तक… स्वामी सहजानंद के विचारों से प्रभावित प्रोफेसर walter hauser की अंतिम इच्छा ने रचा इतिहास

walter hauser
माता-पिता की अस्थियां गंगा में प्रवाहित करते माइकल हाउजर।

walter hauser : एक क्रांतिकारी विचारक की लौ इतनी तेज़ थी कि उसकी रौशनी सात समंदर पार भी पहुंच गई। बिहार की मिट्टी से उठी इस रोशनी को अमेरिका के प्रोफेसर वाल्टर हाउजर (walter hauser) ने न सिर्फ महसूस किया, बल्कि उसे जीवन भर की साधना बना लिया। 1957 में शिकागो यूनिवर्सिटी से भारत आकर स्वामी सहजानंद सरस्वती और किसान आंदोलन पर गहन शोध कर पीएचडी की उपाधि हासिल करने वाले पहले विदेशी शोधकर्ता दिवंगत प्रोफेसर वाल्टर हाउजर (walter hauser) की अस्थियां, उनकी पत्नी रोजमेरी हाउजर के साथ, गुरुवार (27 जून) को उनके परिजनों द्वारा पटना लाकर गंगा में प्रवाहित की गईं।

मिट्टी की ओर लौटता मन

1957 का साल था। शिकागो यूनिवर्सिटी का युवा शोधार्थी वाल्टर हाउजर (walter hauser) भारत आया। साथ में थी उसकी पत्नी रोजमेरी, जो गर्भवती थीं। उद्देश्य था – भारत के किसानों की हालत पर रिसर्च करना। लेकिन जब उन्होंने स्वामी सहजानंद सरस्वती का नाम सुना, तो उनकी दिशा ही बदल गई। बिहार की धरती, और उससे भी बढ़कर किसान आंदोलन की आत्मा, उन्हें इतना खींच ले गई कि उन्होंने यहीं डेरा डाल दिया।

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दिल से बना बिहारी

1927 में अमेरिका के वर्जीनिया में जन्मे वाल्टर हाउजर (walter hauser) एक शोध छात्र के रूप में भारत आए थे, लेकिन वे यहां की माटी में घुलते चले गए। उनका शोध ‘बिहार प्रांतीय किसान सभा (1929-42)’ पर था, और 1961 में उन्हें इसी विषय पर पीएचडी की उपाधि मिली। वह वर्षों तक बिहटा में स्वामी जी के आश्रम में रहे, और यहीं से अपने ज्ञान का दीप जलाते रहे।

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वाल्टर हाउजर

नई ज़मीन, पुरानी यादें

👉 1927 में अमेरिका के वर्जीनिया में हुआ था वाल्टर हाउज़र का जन्म
👉 स्वामी सहजानंद सरस्वती और किसान आंदोलन पर किया था शोध
👉 1961 में हाउज़र को पीएचडी की डिग्री मिली थी
👉 खुद को बिहार का बेटा कहते थे वाल्टर हाउज़र
👉 बिहारी कहलाने में गर्व महसूस करते थे हाउज़र
👉 वाल्टर की अंतिम इच्छा पूरी करने पटना पहुंचा पूरा परिवार

शोध के दस्तावेज और एक विवाद

प्रख्यात लेखक अनीश अंकुर बताते हैं कि अपने शोध के दौरान वाल्टर हाउजर कई ऐतिहासिक दस्तावेज अमेरिका ले गए थे। बाद में इन दस्तावेजों को लेकर विवाद भी हुआ, लेकिन स्वामी जी के परिवार और जागरूक नागरिकों की पहल से वे दस्तावेज वापस लाकर बिहार अभिलेखागार में सुरक्षित करवा दिए गए।

एक लंबा रिश्ता… और एक आखिरी वादा

वाल्टर हाउजर का भारत से रिश्ता केवल शैक्षणिक नहीं था, वह आत्मिक था। उन्होंने अपने परिजनों से वादा लिया था कि उनका अंतिम संस्कार हिंदू विधि से किया जाए और उनकी अस्थियां गंगा में प्रवाहित हों। 1 जून 2019 को जब उनका निधन हुआ, तो यह वादा भी जीवित रहा।

कौन-कौन आए हैं बिहार

  • पुत्र: माइकल हाउज़र
  • पुत्रवधू: एलिजाबेथ हाउज़र
  • पुत्री: शीला हाउज़र
  • विलियम आर पिंच – वाल्टर के शिष्य
  • वैंडी सिंगर – वाल्टर के शिष्य

पटना में भावनाओं की बाढ़

पांच साल बाद, उनके पुत्र माइकल हाउजर, पुत्रवधू एलिज़ाबेथ, पुत्री शीला और पोती रोज मेरी उनके अस्थि कलश के साथ पटना पहुंचे। वे भावुक थे, लेकिन गर्वित भी। उनके साथ उनके दो शिष्य — प्रो. विलियम आर. पिंच और प्रो. वेंडी सिंगर — भी आए, जो आज खुद भारत और किसान आंदोलन पर गहरी पकड़ रखने वाले विद्वान हैं।

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माइकल ने बताया कि माइकल ने बताया कि उनके पिता ने भारतीय किसान आंदोलन और स्वामी सहजानंद सरस्वती पर गहराई से शोध कर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की थी। उनका मानना था कि सहजानंद सरस्वती भारत के सबसे बड़े जननेता और क्रांतिकारी विचारक थे, जिन्हें विश्व स्तर पर जाना जाना चाहिए। जब मैं छोटा बच्चा था, तब अपने माता-पिता के साथ भारत आया था। उस वक्त मुझे पटना के शिशु भवन में रखा जाता था। मेरी स्मृतियों में उस दौर की छवियाँ आज भी बहुत स्पष्ट हैं। मेरे पिताजी यद्यपि अमेरिका में रहते थे, लेकिन उनका हृदय हमेशा बिहार, खासकर पटना में ही रमा रहता था।”

माइकल कहते हैं –

“मेरे माता-पिता की यह दृढ़ इच्छा थी कि उनके अस्थि अवशेष गंगा नदी में, विशेष रूप से पटना शहर के भीतर ही प्रवाहित किए जाएं। उनके इस अंतिम संकल्प को पूरा करने के लिए ही हमारा पूरा परिवार अमेरिका से भारत आया है।”

शोध से सिलेबस तक

वाल्टर हाउजर की बदौलत आज वर्जीनिया यूनिवर्सिटी में स्वामी सहजानंद सरस्वती के जीवन और विचारधारा को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। उनके शिष्य प्रो. पिंच कहते हैं, “हमने रिसर्च की शुरुआत वाल्टर हाउजर से प्रेरित होकर की। भारत और बिहार की क्रांतिकारी विरासत को दुनिया तक पहुंचाने में उनका योगदान अमूल्य है।”

(walter hauser)
वाल्टर हाउजर की याद में पटना में कार्यक्रम। वाल्टर की 01 जून 2019 को मृत्यु हो गयी थी।

फ्रेम में बिहार, फ़िल्टर में अमेरिका

  • 1957 में शिकागो यूनिवर्सिटी के छात्र के रूप में वाल्टर पहली बार बिहार आए थे।
  • शोध कार्य के दौरान बिहार से उनका भावनात्मक जुड़ाव गहरा होता चला गया।
  • बाद में वे वर्जीनिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर नियुक्त हुए।
  • उन्होंने सहजानंद सरस्वती पर लिखी गई कई पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद किया।
  • वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में सहजानंद सरस्वती को शामिल करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सहजानंद और किसान आंदोलन

स्वामी सहजानंद सरस्वती भारतीय किसान आंदोलन के जनक माने जाते हैं। उन्होंने 1929 में बिहार प्रांतीय किसान सभा की नींव रखी, जो आगे चलकर 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा में परिवर्तित हुई। उन्होंने किसान, दलित, मजदूर सभी को एक मंच पर लाकर ज़मींदारी उन्मूलन की दिशा में क्रांति की शुरुआत की।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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