आनंद कुमार
झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए हुए चुनाव के परिणाम आने के बाद राज्य की राजनीति में एक बार फिर वही सवाल गूंजने लगा है, जिसे पिछले कुछ वर्षों में लगभग भुला दिया गया था। सवाल यह है कि क्या झारखंड की राजनीति पर फिर से वही पुराना ‘दाग’ लौट आया है, जो कभी राज्यसभा चुनावों की पहचान बन गया था?
राज्यसभा चुनाव में झामुमो के बैद्यनाथ राम और निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी की जीत ने कई राजनीतिक बहसों को जन्म दे दिया है। विशेष रूप से कांग्रेस उम्मीदवार की हार ने महागठबंधन के भीतर क्रॉस वोटिंग, राजनीतिक सेंधमारी और नेतृत्व क्षमता को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा राजनीतिक असर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की छवि पर पड़ता दिखाई दे रहा है। झारखंड में इंडिया गठबंधन के प्रमुख नेता होने के नाते यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि महागठबंधन के भीतर सेंधमारी हुई तो क्या यह उनकी जानकारी और सहमति से हुई या फिर उनके नेतृत्व की पकड़ कमजोर पड़ गई? दोनों ही स्थितियां राजनीतिक रूप से मुख्यमंत्री के लिए चुनौतीपूर्ण हैं।
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यदि यह रणनीति गठबंधन की सहमति से बनी थी तो इंडिया ब्लॉक के अन्य दलों के बीच विश्वास का संकट पैदा हो सकता है। दूसरी ओर यदि यह सब मुख्यमंत्री की जानकारी के बिना हुआ तो उनके नेतृत्व और राजनीतिक नियंत्रण पर सवाल उठेंगे। राष्ट्रीय राजनीति में हेमंत सोरेन को विपक्षी गठबंधन के एक प्रभावशाली आदिवासी चेहरे के रूप में देखा जाता रहा है। ऐसे में यह परिणाम उनके राजनीतिक कद की नई परीक्षा भी बन सकता है।
चुनाव परिणाम के बाद मुख्यमंत्री का चर्चित नारा “झारखंड झुकेगा नहीं” भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया है। विपक्ष और राजनीतिक पर्यवेक्षक इस नारे को राज्यसभा चुनाव के नतीजों के संदर्भ में देख रहे हैं। हालांकि अंतिम फैसला जनता को ही करना है कि यह केवल राजनीतिक रणनीति थी या फिर राज्य की राजनीतिक संस्कृति में किसी पुराने दौर की वापसी।
झारखंड गठन के बाद लंबे समय तक राज्यसभा चुनावों को लेकर यह धारणा बनी रही कि बाहरी प्रभाव और संसाधनों के दम पर चुनावी समीकरण बदले जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में इस छवि को बदलने की कोशिश हुई और स्थानीय प्रतिनिधित्व को बढ़ावा मिला। बैद्यनाथ राम की जीत इसी दिशा में एक सकारात्मक संदेश भी देती है। लेकिन परिमल नाथवानी की जीत के बाद पुरानी बहसें फिर से जीवित हो गई हैं।
अब निगाहें मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अगली राजनीतिक प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। कांग्रेस, राजद और वाम दलों के नेताओं द्वारा लगाए जा रहे आरोपों के बीच यदि कोई राजनीतिक या संगठनात्मक कार्रवाई होती है तो यह संदेश जाएगा कि गठबंधन इस हार को गंभीरता से ले रहा है। लेकिन यदि मामला केवल बयानबाजी तक सीमित रह जाता है तो विपक्ष को मुख्यमंत्री की भूमिका पर सवाल उठाने का और अवसर मिल सकता है।
राज्यसभा चुनाव का परिणाम केवल दो सीटों का फैसला नहीं है। यह झारखंड की राजनीतिक संस्कृति, गठबंधन राजनीति और नेतृत्व क्षमता पर भी एक महत्वपूर्ण जन-बहस की शुरुआत है।
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