झारखंड में परिसीमन: क्या आदिवासी बहुल राज्य में बदल जाएगा चुनावी नक्शा? ST सीटों पर क्या होगा असर

Anand Kumar
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झारखंड में परिसीमन का सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितनी सीटें बढ़ेंगी। असली सवाल यह है कि नए राजनीतिक नक्शे में किसकी आवाज मजबूत होगी और किसकी कमजोर।

शशि सिंह

परिसीमन की बहस ने देश के सामने प्रतिनिधित्व का एक पुराना सवाल फिर खड़ा कर दिया है। किस राज्य की संसद में कितनी हिस्सेदारी होनी चाहिए और क्या आबादी ही इसका सबसे उचित आधार है? झारखंड के लिए यह सवाल कुछ ज्यादा जटिल है।

एक ओर नई जनगणना के बाद परिसीमन से राज्य की लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ने की संभावना है। दूसरी ओर, नए चुनावी नक्शे में झारखंड के भीतर राजनीतिक शक्ति का संतुलन बदलने की आशंका भी है। खासकर आदिवासी बहुल क्षेत्रों और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों को लेकर चिंता स्वाभाविक है। लेकिन इस बहस के बीच एक बुनियादी सवाल लगभग गायब है: क्या झारखंड कभी पूरे तौर पर आदिवासी बहुल राज्य रहा है? यह सवाल झारखंड की पहचान पर सवाल उठाने के लिए नहीं, बल्कि उसे बेहतर ढंग से समझने के लिए है।

झारखंड की आदिवासी पहचान निर्विवाद है। राज्य के निर्माण की राजनीतिक यात्रा में आदिवासी समाज की भूमिका केंद्रीय रही है। भूमि, जंगल, जल, परंपरागत अधिकार, विस्थापन, शोषण और राजनीतिक स्वायत्तता से जुड़े संघर्षों ने अलग झारखंड की मांग को आकार दिया। लेकिन किसी क्षेत्र की राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान और उसकी जनसांख्यिकीय बहुलता एक ही चीज नहीं होती। झारखंड के मामले में यही फर्क आज की परिसीमन बहस को समझने की कुंजी है।

आज के झारखंड की सीमाओं को इतिहास में पीछे ले जाएं तो कोई एक ऐसा राजनीतिक भूगोल नहीं मिलता जिसे सदियों से झारखंड कहा जाता रहा हो। छोटानागपुर, सिंहभूम, संथाल परगना, पलामू, हजारीबाग और मानभूम जैसे क्षेत्रों की अपनी अलग राजनीतिक और सामाजिक यात्राएं थीं। कुछ इलाकों में आदिवासी समाज का स्पष्ट प्रभुत्व था, लेकिन पूरा क्षेत्र एक समान आदिवासी भूभाग नहीं था।

जनगणना वर्षST आबादी का हिस्सा
1951लगभग 35%
1991लगभग 28%
2001लगभग 26%
2011लगभग 26%

औपनिवेशिक दौर में संथालों का बड़े पैमाने पर बसना, फिर रेल, खनन और उद्योगों का विस्तार और जमशेदपुर जैसे औद्योगिक शहरों का विकास इस क्षेत्र की जनसांख्यिकी को लगातार बदलता रहा। जनगणना के आंकड़े भी इसी विविधता की ओर इशारा करते हैं। औपनिवेशिक दौर की वर्गीकरण पद्धतियां आज की अनुसूचित जनजाति की श्रेणी से पूरी तरह समान नहीं थीं, इसलिए अलग-अलग समय के आंकड़ों की तुलना सावधानी से करनी चाहिए। फिर भी स्वतंत्र भारत के आंकड़े स्पष्ट हैं।

1951 में आज के झारखंड से जुड़े क्षेत्रों में अनुसूचित जनजाति की आबादी लगभग 35 प्रतिशत थी। 1991 में यह करीब 28 प्रतिशत, 2001 में करीब 26 प्रतिशत और 2011 में भी लगभग 26 प्रतिशत रही। यानी आधुनिक जनगणना के रिकॉर्ड में पूरे झारखंड की आबादी में आदिवासी कभी बहुमत में नहीं रहे। लेकिन राज्य का औसत उसकी पूरी कहानी नहीं बताता।

2011 में खूंटी में अनुसूचित जनजाति की आबादी लगभग 73 प्रतिशत थी, सिमडेगा में 71 प्रतिशत, गुमला में 69 प्रतिशत और पश्चिमी सिंहभूम में करीब 67 प्रतिशत। दूसरी ओर धनबाद में यह लगभग 9 प्रतिशत, गिरिडीह में करीब 10 प्रतिशत, चतरा में 4 प्रतिशत और कोडरमा में लगभग 1 प्रतिशत थी। यानी झारखंड में आदिवासी बहुल क्षेत्र हैं, लेकिन पूरा राज्य आदिवासी बहुल नहीं है। यही बात झारखंड आंदोलन को समझने में भी महत्वपूर्ण है।

झारखंड की आदिवासी आबादी कितनी है? आंकड़े क्या कहते हैं?

जनगणना वर्षST आबादी का हिस्सा
1951लगभग 35%
1991लगभग 28%
2001लगभग 26%
2011लगभग 26%

अलग झारखंड की मांग केवल जनसंख्या के आंकड़े पर आधारित नहीं थी। यह भूमि, जंगल, जल, परंपरागत अधिकार, शोषण, विस्थापन, सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक स्वायत्तता का सवाल था। बिरसा मुंडा से लेकर संथाल विद्रोह और बाद के झारखंड आंदोलन तक आदिवासी राजनीतिक चेतना ने इस पूरे क्षेत्र की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। इसलिए झारखंड की आदिवासी पहचान संख्या से कहीं बड़ी है। लेकिन उसे आदिवासी बहुमत समझ लेना ऐतिहासिक और जनसांख्यिकीय दोनों स्तरों पर सही नहीं होगा।

अब परिसीमन को इसी पृष्ठभूमि में देखिए।

1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए 1971 की जनगणना के आधार पर राज्यों के बीच लोकसभा सीटों के बंटवारे और विधानसभाओं की कुल सीटों के पुनर्समायोजन पर रोक लगाई गई। यह रोक एक साथ 50 साल की नहीं थी। इसे लगभग 25-25 साल के दो चरणों में आगे बढ़ाया गया। पहला चरण 1976 से 2001 तक और फिर 2001 में 84वें संविधान संशोधन के जरिए दूसरा चरण 2026 तक पहुंचा। उद्देश्य था कि जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में नुकसान न हो।

जिलाST आबादी
खूंटी~73%
सिमडेगा~71%
गुमला~69%
पश्चिमी सिंहभूम~67%
धनबाद~9%
गिरिडीह~10%
चतरा~4%
कोडरमा~1%

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है।

राज्य को कितनी सीटें मिलेंगी और उन सीटों की सीमाएं कहां होंगी, ये दो अलग सवाल हैं। पिछले वर्षों में राज्यों के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदली जा सकती थीं, जबकि राज्यों के बीच लोकसभा सीटों के बंटवारे और विधानसभाओं की कुल सीटों के पुनर्समायोजन को स्थगित रखा गया। झारखंड ने इस प्रक्रिया का अपना अनोखा अनुभव देखा। 2001 की जनगणना के आधार पर परिसीमन आयोग ने झारखंड के लिए नया चुनावी नक्शा तैयार किया और 2007 में आदेश जारी किए। लेकिन यह नक्शा लागू नहीं हो पाया।

प्रस्तावित व्यवस्था में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित विधानसभा सीटें 28 से घटाकर 22 और लोकसभा की आरक्षित सीटें पांच से चार करने का प्रस्ताव था। विरोध के बाद संसद ने विशेष प्रावधान के जरिए झारखंड से संबंधित उन आदेशों को प्रभावी होने से रोक दिया। यही अनुभव आज की चिंता को समझाता है। झारखंड के लिए परिसीमन केवल सीटों की संख्या का सवाल नहीं होगा। सवाल यह भी होगा कि नई सीटें कहां बनेंगी और आरक्षित सीटों का स्वरूप क्या होगा।

आज 81 विधानसभा सीटों में 28 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं, यानी लगभग 35 प्रतिशत, जबकि 2011 में राज्य की आबादी में अनुसूचित जनजाति की हिस्सेदारी करीब 26 प्रतिशत थी। यह अंतर बताता है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व केवल आबादी के सीधे अनुपात पर आधारित नहीं है। आरक्षण का उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना भी है।

यहीं झारखंड का विरोधाभास सामने आता है।

एक ओर अधिक लोकसभा सीटें राज्य की संसद में आवाज बढ़ा सकती हैं। दूसरी ओर वही परिसीमन राज्य के भीतर राजनीतिक भूगोल बदल सकता है। अगर झारखंड की सीटें बढ़ती हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों की सीटें उससे कहीं ज्यादा बढ़ती हैं, तो झारखंड के पास सांसद अधिक होंगे, लेकिन पूरी लोकसभा में उसका अनुपातिक वजन घट सकता है। यानी सीटें ज्यादा, लेकिन सापेक्ष राजनीतिक ताकत कम। इसलिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के परिसीमन-विरोध को भी केवल समर्थन या विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

असली सवाल यह है कि वह किस तरह का परिसीमन चाहता है। क्या 1971 के आधार पर मौजूदा व्यवस्था जारी रहनी चाहिए? क्या झारखंड को अधिक सीटें मिलनी चाहिए लेकिन राज्यों के बीच राजनीतिक संतुलन भी बचा रहना चाहिए? क्या आदिवासी प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखने के लिए जनसंख्या के अलावा दूसरे आधार भी होने चाहिए? क्या 28 आरक्षित विधानसभा सीटों को बनाए रखना जरूरी है? अगर हां, तो क्यों?

लेकिन यही सवाल भाजपा और दूसरे दलों से भी पूछा जाना चाहिए। यदि आबादी के आधार पर समान प्रतिनिधित्व लोकतंत्र का सिद्धांत है, तो ऐतिहासिक रूप से कमजोर समुदायों का संरक्षित प्रतिनिधित्व भी संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है। सवाल किसी एक दल का नहीं, दोनों सिद्धांतों के बीच संतुलन का है। झारखंड को शायद इस बहस को “आदिवासी राज्य बनाम गैर-आदिवासी राज्य” के रूप में देखने से बचना चाहिए।

झारखंड आदिवासी बहुल राज्य नहीं है, लेकिन उसकी राजनीतिक आत्मा और ऐतिहासिक पहचान पर आदिवासी समाज की गहरी छाप है। दोनों बातें एक साथ सच हैं। इसीलिए परिसीमन झारखंड के लिए केवल सीटों की गिनती नहीं है। यह तय करेगा कि बदलती जनसंख्या के साथ राजनीतिक प्रतिनिधित्व कैसे बदलेगा और उस बदलाव में ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण आदिवासी क्षेत्रों की आवाज कितनी सुरक्षित रहेगी। आखिरकार सवाल यह नहीं है कि झारखंड को ज्यादा सीटें मिलेंगी या नहीं। सवाल यह है कि नए राजनीतिक नक्शे में झारखंड की आवाज कितनी बड़ी होगी और उस आवाज में उसके आदिवासी समाज की जगह कितनी सुरक्षित रहेगी।

यही झारखंड की परिसीमन परीक्षा है।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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