रांची: भाजपा का ‘मिशन झारखंड’ पूरी तरह से शुरू हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने झारखंड भाजपा के आदिवासी नेताओं को एक स्पष्ट और कड़ा संदेश भेज दिया है कि यह देश क्रिकेट में वैभव सूर्यवंशी और अभिषेक शर्मा का दौर है। यहाँ आपको उसी अंदाज में क्रीज पर उतरकर बल्ला भांजना है और चौके-छक्के उड़ाने हैं। अब पुराने स्टाइल की राहुल द्रविड़ और चेतेश्वर पुजारा वाली ‘टुकटुकिया बैटिंग’ से काम नहीं चलने वाला है।
- फ्रंट फुट पर आकर गरजना होगा: दिल्ली का स्पष्ट संदेश
- हार से निराश नहीं, दोगुने जोश से वापसी की तैयारी
- अर्जुन मुंडा और चंपाई सोरेन की बदलती भाषा
- चंपाई सोरेन का ‘एक्स’ (Twitter) विस्फोट: वैश्विक उदाहरणों से घेरा
- “आरक्षण पर अतिक्रमण क्यों?”—मूलवासी बनाम मिशनरी
- क्या 2029 में बदलेगी झारखंड की राजनीतिक दिशा?
- फ्रंट फुट पर आकर गरजना होगा: दिल्ली का स्पष्ट संदेश
- हार से निराश नहीं, दोगुने जोश से वापसी की तैयारी
- अर्जुन मुंडा और चंपाई सोरेन की बदलती भाषा
- चंपाई सोरेन का ‘एक्स’ (Twitter) विस्फोट: वैश्विक उदाहरणों से घेरा
- “आरक्षण पर अतिक्रमण क्यों?”—मूलवासी बनाम मिशनरी
- क्या 2029 में बदलेगी झारखंड की राजनीतिक दिशा?
पश्चिम बंगाल को फतह करने (मजबूत विपक्ष बनने) और असम का किला बचाने के बाद, पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में जो भगवा चादर बिछ गयी है, उसपर झारखंड इस समय एक ‘नजर के टीके’ की तरह दिख रहा है। यह बात मोदी और शाह को लगातार खटक रही है। अब इस टीके को मिटाने यानी झारखंड में पूरी तरह कमल खिलाने का काम शुरू हो चुका है। चाहे वह डेमोग्राफी चेंज (जनसांख्यिकी बदलाव) पर हाई लेवल कमेटी बनाना हो, बिरसा मुंडा जनजातीय समागम के नाम पर डीलिस्टिंग के पक्ष में माहौल तैयार करना हो या एसआईआर (SIR) का मुद्दा हो; इन सबके जरिए जमीन तैयार की जा रही है।
यह भी पढ़ें – झारखंड राज्यसभा चुनाव : क्या कांग्रेस अपनी राजनीतिक हैसियत बचा पाएगी
फ्रंट फुट पर आकर गरजना होगा: दिल्ली का स्पष्ट संदेश
झारखंड के नेताओं, खासकर आदिवासी चेहरों को दिल्ली से साफ संदेश दे दिया गया है कि अब बैकफुट या रक्षात्मक होकर ‘सिमसिमाती पॉलीटिक्स’ करने से कुछ नहीं होगा। अब खुलकर सामने आना होगा और गरजना होगा।
भाजपा आलाकमान के सामने बंगाल का उदाहरण है। बंगाल में भाजपा ने जिस तरह से ममता बनर्जी के शासन के सामने आक्रामक रुख अपनाया, उसने टीएमसी को कई मोर्चों पर बैकफुट पर ला दिया। चाहे वह जंगल महल के आदिवासी और कुर्मी बहुल इलाके हों, या मालदा और मुर्शिदाबाद के मुस्लिम बहुल इलाके—हर जगह भाजपा ने अपनी आक्रामकता से कामयाबी की राह खोजी। अब ठीक यही फॉर्मूला झारखंड में आजमाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
“डेमोग्राफी चेंज पर जो हाई लेवल कमेटी बनी है, उसका कार्यक्षेत्र भले ही पूरा देश हो, लेकिन डेमोग्राफी चेंज की मुख्य चर्चा तो झारखंड के संथाल परगना से ही शुरू हुई थी।”
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे लंबे समय से इस मुद्दे को संसद में उठाते रहे हैं। उन्होंने तो संथाल परगना, बिहार के सीमांचल और बंगाल के मालदा व मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों को मिलाकर एक अलग केंद्र शासित प्रदेश (UT) बनाने की मांग भी उठायी है। भाजपा ने लोकसभा चुनाव और फिर विधानसभा चुनाव में डेमोग्राफी बदलने और संथाल परगना के ‘जमाई टोला’ बनने के मुद्दे को पूरी ताकत से उठाया था।
हार से निराश नहीं, दोगुने जोश से वापसी की तैयारी
हालांकि, पिछले चुनावी आंकड़ों को देखें तो आदिवासी इलाकों में भाजपा को अपेक्षित कामयाबी नहीं मिली थी। लोकसभा में आदिवासियों के लिए रिजर्व सभी 5 सीटें बीजेपी हार गयी थी और विधानसभा में भी 28 एसटी (ST) रिजर्व सीटों में से 27 पर उसे हार का मुंह देखना पड़ा था। लेकिन भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का स्वभाव इतिहास देखकर बैठ जाने का नहीं है। वे इससे निराश होने के बजाय अब दोगुने जोश और आक्रामकता के साथ इस मुद्दे को दोबारा उठा रहे हैं।
भाजपा की रणनीति साफ है: अगले तीन-साढ़े तीन साल में वह आदिवासी समाज को धर्म के आधार पर यह समझाने की पूरी कोशिश करेगी कि अगर उन्होंने धर्म बदला, तो उन्हें जनजातियों के रूप में मिलने वाली संवैधानिक सुविधाओं और आरक्षण से हाथ धोना पड़ेगा। डीलिस्टिंग की मांग को आगे बढ़ाकर यह चक्रव्यूह रचना शुरू कर दिया गया है।
दिलचस्प बात यह है कि डेमोग्राफी पर हाई लेवल कमेटी बनाना हो, एसआईआर हो या डीलिस्टिंग की मांग को हवा देना—ये सारे फैसले दिल्ली से तय हो रहे हैं, जिसमें झारखंड भाजपा के स्थानीय नेताओं की भूमिका सिर्फ इसे जमीन पर लागू करने की है।
अर्जुन मुंडा और चंपाई सोरेन की बदलती भाषा
झारखंड भाजपा के आदिवासी नेता वैसे भी पहले मुसलमानों के मुद्दे पर तो बोलते थे और सोशल मीडिया पर अपनी बातें रखते थे—खासकर बाबूलाल मरांडी और चंपाई सोरेन इस पर ज्यादा मुखर रहते हैं। लेकिन सरना, सनातन और ईसाई के त्रिकोणीय विवादित मुद्दे पर भाजपा के आदिवासी नेता अब तक थोड़ा बचकर ही चलते थे। मगर अब आलाकमान के निर्देश के बाद इस मुद्दे पर भी वे खुलकर बैटिंग कर रहे हैं।
कुछ दिन पहले पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने एक इंटरव्यू में साफ कहा था कि:
“भगवान बिरसा मुंडा को पकड़वाने वाले या उन्हें जेल में बंद करने वाले अंग्रेज ईसाई ही थे।”
अर्जुन मुंडा जैसे गंभीर और नपे-तुले शब्दों का इस्तेमाल करने वाले नेता अगर ऐसी आक्रामक बातें कर रहे हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि ‘ऊपर से कमांड’ आ चुका है कि अब खुलकर खेलना होगा। ‘वैभव सूर्यवंशी’ के जमाने में राहुल द्रविड़ और चेतेश्वर पुजारा वाली धीमी बैटिंग को ड्रेसिंग रूम से ही खारिज कर दिया गया है।
चंपाई सोरेन का ‘एक्स’ (Twitter) विस्फोट: वैश्विक उदाहरणों से घेरा
इसी रणनीति के तहत अब ‘झारखंड के टाइगर’ कहे जाने वाले चंपाई सोरेन भी पूरी तरह खुलकर मैदान में उतर चुके हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक लंबा और बेहद तीखा पोस्ट साझा किया। चंपाई सोरेन ने केंद्र सरकार से मांग की है कि वह डीलिस्टिंग (Delisting) के जरिए अथवा अनुच्छेद 342 में जरूरी संशोधन करके, आदिवासियों के अस्तित्व पर आए इस संकट का स्थाई समाधान करे।
चंपाई सोरेन ने अपने पोस्ट में धर्मांतरण को सीधे तौर पर आदिवासी अस्तित्व, उनकी मूल संस्कृति और परंपराओं के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया। उनके पोस्ट के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- पारंपरिक ताने-बाने पर चोट: चंपाई का तर्क है कि आदिवासी और मूलवासी समाज सदियों से साथ रहते आए हैं। वे एक-दूसरे के धार्मिक स्थलों और परंपराओं का सम्मान करते रहे हैं, जिससे कभी किसी की मूल पहचान नहीं बदली। लेकिन ईसाई मिशनरियों ने पिछले 150-200 वर्षों में आदिवासी समाज की पारंपरिक जीवनशैली, भाषा, संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं को लगातार कमजोर किया है।
- वैश्विक विलुप्ति का हवाला: उन्होंने चेतावनी देते हुए लिखा कि केवल झारखंड या भारत ही नहीं, बल्कि मिशनरियों की वजह से दुनिया के कई हिस्सों में आदिवासी संस्कृति पूरी तरह विलुप्त हो गई है। उन्होंने वैश्विक उदाहरण देते हुए लिखा कि:
- लैटिन अमेरिका की अयोरेओ (Ayoreo) जनजाति
- केन्या की संबुरु (Samburu) जनजाति
- ब्राजील की वाई वाई (Wai Wai) जनजाति
- फिजी और पैसिफिक आइलैंड्स की जनजातियां
- ये सभी जनजातियां धर्मांतरण के बाद अपने पारंपरिक रीति-रिवाज, त्योहार, भाषा, नृत्य, पूजा-पाठ और मूल सामाजिक संरचना को पूरी तरह खो चुकी हैं।
“आरक्षण पर अतिक्रमण क्यों?”—मूलवासी बनाम मिशनरी
चंपाई सोरेन ने अपने बयान में एक और बड़ा कानूनी और संवैधानिक सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि जो लोग स्वयं को अल्पसंख्यक (Minority) बताते हैं, वे आरक्षण और अन्य संवैधानिक लाभों के लिए ‘आदिवासी’ पहचान का इस्तेमाल दोहरा लाभ लेने के लिए कैसे कर सकते हैं? इसके साथ ही उन्होंने चर्चों के लिए आदिवासी जमीनों के उपयोग की उच्च स्तरीय जांच की भी मांग कर डाली।
सनातन और मूलवासी समाज का पक्ष लेते हुए चंपाई ने लिखा:
“हजारों सालों के हमारे इतिहास में, आपको ऐसा कोई भी मूलवासी या सनातनी नहीं मिलेगा, जिसने किसी मदद, सहायता या सहयोग के बदले, अथवा लालच या धमकी देकर हमारे लोगों का धर्म परिवर्तन करवाने की कोशिश की हो। वे कभी स्वयं को आदिवासी नहीं बताते और न ही हमारे आरक्षण या अधिकारों को छीनने का प्रयास करते हैं, तो फिर उनसे कैसा बैर? इसके विपरीत, ईसाई मिशनरियों ने 1845 में यहाँ कदम रखा और मात्र 180 वर्षों में हमारी परंपराओं एवं धार्मिक आस्था पर गहरी चोट पहुंचाई। आरक्षण पर कब्जा किया और हमारी मूल भाषाओं/लिपियों का विरोध किया।”
उन्होंने जमीनी हकीकत का दावा करते हुए भावुक अंदाज में लिखा कि हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि सिमडेगा समेत झारखंड के कई हिस्सों में हमारे ‘जाहेरस्थानों’ और ‘सरना स्थलों’ पर ताले लग चुके हैं, क्योंकि वहाँ धर्मांतरण की वजह से अब पारंपरिक पूजा करने वाला कोई बचा ही नहीं है।
क्या 2029 में बदलेगी झारखंड की राजनीतिक दिशा?
चंपाई सोरेन और अर्जुन मुंडा के इन कड़े बयानों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। इसे भाजपा की उस व्यापक और दीर्घकालिक रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसके तहत आदिवासी राजनीति को विकास के पारंपरिक दावों से हटाकर धर्मांतरण, पहचान, घुसपैठ और सांस्कृतिक अस्तित्व के मुद्दों के इर्द-गिर्द पुनर्गठित (Restructure) किया जा रहा है।
यही कारण है कि भाजपा के आदिवासी चेहरे अब पहले की तुलना में कहीं अधिक आक्रामक और मुखर दिखाई दे रहे हैं। डेमोग्राफी, घुसपैठ, एसआईआर, डीलिस्टिंग और धर्मांतरण जैसे मुद्दों को जिस तरह दिल्ली से लगातार खाद-पानी दिया जा रहा है, उससे साफ संकेत मिलता है कि ‘मिशन 2029’ की बिसात अभी से बिछाई जा चुकी है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि झारखंड का आदिवासी समाज इन मुद्दों को किस रूप में स्वीकार करेगा? चूंकि पिछले चुनावों में पूरी तरह पराजित होने के बावजूद भाजपा ने इन मुद्दों को ठंडे बस्ते में नहीं डाला, बल्कि और अधिक आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाया है। आने वाले तीन-चार वर्षों में झारखंड की राजनीति का केंद्र सिर्फ विकास, रोजगार और भ्रष्टाचार नहीं रहेगा; बल्कि इसके केंद्र में डेमोग्राफी, डीलिस्टिंग, धर्मांतरण और आदिवासी पहचान के मुद्दे सबसे ऊपर तैरेंगे। अगर ऐसा हुआ, तो आगामी चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की सामान्य लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह झारखंड की सामाजिक और राजनीतिक दिशा को हमेशा के लिए तय करने वाला ऐतिहासिक टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है।
पश्चिम बंगाल को फतह करने (मजबूत विपक्ष बनने) और असम का किला बचाने के बाद, पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में जो भगवा चादर बिछ गयी है, उसपर झारखंड इस समय एक ‘नजर के टीके’ की तरह दिख रहा है। यह बात मोदी और शाह को लगातार खटक रही है। अब इस टीके को मिटाने यानी झारखंड में पूरी तरह कमल खिलाने का काम शुरू हो चुका है। चाहे वह डेमोग्राफी चेंज (जनसांख्यिकी बदलाव) पर हाई लेवल कमेटी बनाना हो, बिरसा मुंडा जनजातीय समागम के नाम पर डीलिस्टिंग के पक्ष में माहौल तैयार करना हो या एसआईआर (SIR) का मुद्दा हो; इन सबके जरिए जमीन तैयार की जा रही है।
फ्रंट फुट पर आकर गरजना होगा: दिल्ली का स्पष्ट संदेश
झारखंड के नेताओं, खासकर आदिवासी चेहरों को दिल्ली से साफ संदेश दे दिया गया है कि अब बैकफुट या रक्षात्मक होकर ‘सिमसिमाती पॉलीटिक्स’ करने से कुछ नहीं होगा। अब खुलकर सामने आना होगा और गरजना होगा।
भाजपा आलाकमान के सामने बंगाल का उदाहरण है। बंगाल में भाजपा ने जिस तरह से ममता बनर्जी के शासन के सामने आक्रामक रुख अपनाया, उसने टीएमसी को कई मोर्चों पर बैकफुट पर ला दिया। चाहे वह जंगल महल के आदिवासी और कुर्मी बहुल इलाके हों, या मालदा और मुर्शिदाबाद के मुस्लिम बहुल इलाके—हर जगह भाजपा ने अपनी आक्रामकता से कामयाबी की राह खोजी। अब ठीक यही फॉर्मूला झारखंड में आजमाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
“डेमोग्राफी चेंज पर जो हाई लेवल कमेटी बनी है, उसका कार्यक्षेत्र भले ही पूरा देश हो, लेकिन डेमोग्राफी चेंज की मुख्य चर्चा तो झारखंड के संथाल परगना से ही शुरू हुई थी।”
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे लंबे समय से इस मुद्दे को संसद में उठाते रहे हैं। उन्होंने तो संथाल परगना, बिहार के सीमांचल और बंगाल के मालदा व मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों को मिलाकर एक अलग केंद्र शासित प्रदेश (UT) बनाने की मांग भी उठायी है। भाजपा ने लोकसभा चुनाव और फिर विधानसभा चुनाव में डेमोग्राफी बदलने और संथाल परगना के ‘जमाई टोला’ बनने के मुद्दे को पूरी ताकत से उठाया था।
हार से निराश नहीं, दोगुने जोश से वापसी की तैयारी
हालांकि, पिछले चुनावी आंकड़ों को देखें तो आदिवासी इलाकों में भाजपा को अपेक्षित कामयाबी नहीं मिली थी। लोकसभा में आदिवासियों के लिए रिजर्व सभी 5 सीटें बीजेपी हार गयी थी और विधानसभा में भी 28 एसटी (ST) रिजर्व सीटों में से 27 पर उसे हार का मुंह देखना पड़ा था। लेकिन भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का स्वभाव इतिहास देखकर बैठ जाने का नहीं है। वे इससे निराश होने के बजाय अब दोगुने जोश और आक्रामकता के साथ इस मुद्दे को दोबारा उठा रहे हैं।
भाजपा की रणनीति साफ है: अगले तीन-साढ़े तीन साल में वह आदिवासी समाज को धर्म के आधार पर यह समझाने की पूरी कोशिश करेगी कि अगर उन्होंने धर्म बदला, तो उन्हें जनजातियों के रूप में मिलने वाली संवैधानिक सुविधाओं और आरक्षण से हाथ धोना पड़ेगा। डीलिस्टिंग की मांग को आगे बढ़ाकर यह चक्रव्यूह रचना शुरू कर दिया गया है।
दिलचस्प बात यह है कि डेमोग्राफी पर हाई लेवल कमेटी बनाना हो, एसआईआर हो या डीलिस्टिंग की मांग को हवा देना—ये सारे फैसले दिल्ली से तय हो रहे हैं, जिसमें झारखंड भाजपा के स्थानीय नेताओं की भूमिका सिर्फ इसे जमीन पर लागू करने की है।
अर्जुन मुंडा और चंपाई सोरेन की बदलती भाषा
झारखंड भाजपा के आदिवासी नेता वैसे भी पहले मुसलमानों के मुद्दे पर तो बोलते थे और सोशल मीडिया पर अपनी बातें रखते थे—खासकर बाबूलाल मरांडी और चंपाई सोरेन इस पर ज्यादा मुखर रहते हैं। लेकिन सरना, सनातन और ईसाई के त्रिकोणीय विवादित मुद्दे पर भाजपा के आदिवासी नेता अब तक थोड़ा बचकर ही चलते थे। मगर अब आलाकमान के निर्देश के बाद इस मुद्दे पर भी वे खुलकर बैटिंग कर रहे हैं।
कुछ दिन पहले पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने एक इंटरव्यू में साफ कहा था कि:
“भगवान बिरसा मुंडा को पकड़वाने वाले या उन्हें जेल में बंद करने वाले अंग्रेज ईसाई ही थे।”
अर्जुन मुंडा जैसे गंभीर और नपे-तुले शब्दों का इस्तेमाल करने वाले नेता अगर ऐसी आक्रामक बातें कर रहे हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि ‘ऊपर से कमांड’ आ चुका है कि अब खुलकर खेलना होगा। ‘वैभव सूर्यवंशी’ के जमाने में राहुल द्रविड़ और चेतेश्वर पुजारा वाली धीमी बैटिंग को ड्रेसिंग रूम से ही खारिज कर दिया गया है।
चंपाई सोरेन का ‘एक्स’ (Twitter) विस्फोट: वैश्विक उदाहरणों से घेरा
इसी रणनीति के तहत अब ‘झारखंड के टाइगर’ कहे जाने वाले चंपाई सोरेन भी पूरी तरह खुलकर मैदान में उतर चुके हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक लंबा और बेहद तीखा पोस्ट साझा किया। चंपाई सोरेन ने केंद्र सरकार से मांग की है कि वह डीलिस्टिंग (Delisting) के जरिए अथवा अनुच्छेद 342 में जरूरी संशोधन करके, आदिवासियों के अस्तित्व पर आए इस संकट का स्थाई समाधान करे।
चंपाई सोरेन ने अपने पोस्ट में धर्मांतरण को सीधे तौर पर आदिवासी अस्तित्व, उनकी मूल संस्कृति और परंपराओं के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया। उनके पोस्ट के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- पारंपरिक ताने-बाने पर चोट: चंपाई का तर्क है कि आदिवासी और मूलवासी समाज सदियों से साथ रहते आए हैं। वे एक-दूसरे के धार्मिक स्थलों और परंपराओं का सम्मान करते रहे हैं, जिससे कभी किसी की मूल पहचान नहीं बदली। लेकिन ईसाई मिशनरियों ने पिछले 150-200 वर्षों में आदिवासी समाज की पारंपरिक जीवनशैली, भाषा, संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं को लगातार कमजोर किया है।
- वैश्विक विलुप्ति का हवाला: उन्होंने चेतावनी देते हुए लिखा कि केवल झारखंड या भारत ही नहीं, बल्कि मिशनरियों की वजह से दुनिया के कई हिस्सों में आदिवासी संस्कृति पूरी तरह विलुप्त हो गई है। उन्होंने वैश्विक उदाहरण देते हुए लिखा कि:
- लैटिन अमेरिका की अयोरेओ (Ayoreo) जनजाति
- केन्या की संबुरु (Samburu) जनजाति
- ब्राजील की वाई वाई (Wai Wai) जनजाति
- फिजी और पैसिफिक आइलैंड्स की जनजातियां
- ये सभी जनजातियां धर्मांतरण के बाद अपने पारंपरिक रीति-रिवाज, त्योहार, भाषा, नृत्य, पूजा-पाठ और मूल सामाजिक संरचना को पूरी तरह खो चुकी हैं।
“आरक्षण पर अतिक्रमण क्यों?”—मूलवासी बनाम मिशनरी
चंपाई सोरेन ने अपने बयान में एक और बड़ा कानूनी और संवैधानिक सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि जो लोग स्वयं को अल्पसंख्यक (Minority) बताते हैं, वे आरक्षण और अन्य संवैधानिक लाभों के लिए ‘आदिवासी’ पहचान का इस्तेमाल दोहरा लाभ लेने के लिए कैसे कर सकते हैं? इसके साथ ही उन्होंने चर्चों के लिए आदिवासी जमीनों के उपयोग की उच्च स्तरीय जांच की भी मांग कर डाली।
सनातन और मूलवासी समाज का पक्ष लेते हुए चंपाई ने लिखा:
“हजारों सालों के हमारे इतिहास में, आपको ऐसा कोई भी मूलवासी या सनातनी नहीं मिलेगा, जिसने किसी मदद, सहायता या सहयोग के बदले, अथवा लालच या धमकी देकर हमारे लोगों का धर्म परिवर्तन करवाने की कोशिश की हो। वे कभी स्वयं को आदिवासी नहीं बताते और न ही हमारे आरक्षण या अधिकारों को छीनने का प्रयास करते हैं, तो फिर उनसे कैसा बैर? इसके विपरीत, ईसाई मिशनरियों ने 1845 में यहाँ कदम रखा और मात्र 180 वर्षों में हमारी परंपराओं एवं धार्मिक आस्था पर गहरी चोट पहुंचाई। आरक्षण पर कब्जा किया और हमारी मूल भाषाओं/लिपियों का विरोध किया।”
उन्होंने जमीनी हकीकत का दावा करते हुए भावुक अंदाज में लिखा कि हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि सिमडेगा समेत झारखंड के कई हिस्सों में हमारे ‘जाहेरस्थानों’ और ‘सरना स्थलों’ पर ताले लग चुके हैं, क्योंकि वहाँ धर्मांतरण की वजह से अब पारंपरिक पूजा करने वाला कोई बचा ही नहीं है।
यह भी पढ़ें – डेमोग्राफिक चेंज पर अमित शाह की हाई लेवल कमेटी : क्या संथाल परगना में फिर गरमाने वाला है ‘घुसपैठ’ का मुद्दा?
क्या 2029 में बदलेगी झारखंड की राजनीतिक दिशा?
चंपाई सोरेन और अर्जुन मुंडा के इन कड़े बयानों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। इसे भाजपा की उस व्यापक और दीर्घकालिक रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसके तहत आदिवासी राजनीति को विकास के पारंपरिक दावों से हटाकर धर्मांतरण, पहचान, घुसपैठ और सांस्कृतिक अस्तित्व के मुद्दों के इर्द-गिर्द पुनर्गठित (Restructure) किया जा रहा है।
यही कारण है कि भाजपा के आदिवासी चेहरे अब पहले की तुलना में कहीं अधिक आक्रामक और मुखर दिखाई दे रहे हैं। डेमोग्राफी, घुसपैठ, एसआईआर, डीलिस्टिंग और धर्मांतरण जैसे मुद्दों को जिस तरह दिल्ली से लगातार खाद-पानी दिया जा रहा है, उससे साफ संकेत मिलता है कि ‘मिशन 2029’ की बिसात अभी से बिछाई जा चुकी है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि झारखंड का आदिवासी समाज इन मुद्दों को किस रूप में स्वीकार करेगा? चूंकि पिछले चुनावों में पूरी तरह पराजित होने के बावजूद भाजपा ने इन मुद्दों को ठंडे बस्ते में नहीं डाला, बल्कि और अधिक आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाया है। आने वाले तीन-चार वर्षों में झारखंड की राजनीति का केंद्र सिर्फ विकास, रोजगार और भ्रष्टाचार नहीं रहेगा; बल्कि इसके केंद्र में डेमोग्राफी, डीलिस्टिंग, धर्मांतरण और आदिवासी पहचान के मुद्दे सबसे ऊपर तैरेंगे। अगर ऐसा हुआ, तो आगामी चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की सामान्य लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह झारखंड की सामाजिक और राजनीतिक दिशा को हमेशा के लिए तय करने वाला ऐतिहासिक टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है।