Delimitation Bill 2026: क्या झारखंड में घटेंगी ST आरक्षित सीटें? जानिए बिल में क्या है और आदिवासी प्रतिनिधित्व पर क्या पड़ेगा असर

Anand Kumar
13 Min Read

आनंद कुमार

Ranchi: झारखंड में परिसीमन को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नई परिसीमन प्रक्रिया से राज्य की ST आरक्षित विधानसभा और लोकसभा सीटों पर असर पड़ेगा? क्या आदिवासी आरक्षण कम हो सकता है? और क्या नए परिसीमन के बाद झारखंड में आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मौजूदा तस्वीर बदल जाएगी?

इन सवालों का जवाब पाने के लिए Delimitation Bill, 2026 के प्रावधानों को ध्यान से समझना जरूरी है। बिल के मूल पाठ से एक बात स्पष्ट है कि इसमें ST आरक्षण खत्म करने का कोई प्रावधान नहीं है। इसके उलट, बिल में ST के लिए आरक्षित सीटों को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है। हालांकि, नई जनगणना के आधार पर सीटों की संख्या और निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन की व्यवस्था भविष्य में झारखंड की ST आरक्षित सीटों के नक्शे को बदल सकती है।

बिल की धारा 8 इस मामले में महत्वपूर्ण है। इसमें Delimitation Commission को नवीनतम Census आंकड़ों के आधार पर लोकसभा और विधानसभा की सीटों का निर्धारण करने के साथ-साथ SC और ST के लिए आरक्षित सीटों की संख्या तय करने की जिम्मेदारी दी गई है। यानी बिल के मूल पाठ में ST आरक्षण को हटाने की बात नहीं है। बल्कि आयोग को ST आरक्षित सीटों का निर्धारण करने की जिम्मेदारी दी गई है। इसलिए यह कहना कि “Delimitation Bill में ST आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है”, बिल के पाठ के मुताबिक सही नहीं होगा।

हालांकि चिंता आरक्षण के अस्तित्व से ज्यादा उसकी संख्या और भौगोलिक स्थिति को लेकर हो सकती है। बिल में कहा गया है कि परिसीमन के दौरान ST आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों को, जहां तक संभव हो, उन इलाकों में रखा जाएगा जहां ST आबादी का अनुपात सबसे अधिक है। इसका मतलब यह है कि आज जो विधानसभा क्षेत्र ST के लिए आरक्षित हैं, जरूरी नहीं कि नई परिसीमन प्रक्रिया के बाद भी वही क्षेत्र ST आरक्षित रहें।

सीटों की सीमाएं बदल सकती हैं। किसी मौजूदा सीट का स्वरूप बदल सकता है और किसी दूसरे क्षेत्र में ST आबादी के अनुपात को देखते हुए आरक्षित सीट बनाई जा सकती है। इसलिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ST आरक्षण बना रहेगा, लेकिन ST आरक्षित सीटों का नक्शा बदल सकता है।

फिलहाल झारखंड विधानसभा में कुल 81 सीटें हैं, जिनमें 28 सीटें ST के लिए आरक्षित हैं। इनमें बोरियो, बरहैत, लिट्टीपाड़ा, महेशपुर, शिकारीपाड़ा, दुमका, जामा, घाटशिला, पोटका, सरायकेला, चाईबासा, मझगांव, जगन्नाथपुर, मनोहरपुर, चक्रधरपुर, खरसावां, तमाड़, तोरपा, खूंटी, खिजरी, मांडर, सिसई, गुमला, बिशुनपुर, सिमडेगा, कोलेबिरा, लोहरदगा और मनिका शामिल हैं।

लोकसभा की बात करें तो झारखंड में फिलहाल कुल 14 सीटें हैं, जिनमें 5 सीटें ST के लिए आरक्षित हैं। इस लिहाज से राज्य की राजनीति में ST आरक्षित सीटों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।

अब सवाल यह है कि झारखंड की कुल आबादी में ST की हिस्सेदारी कितनी है और इसका परिसीमन से क्या संबंध है। 2011 Census के अनुसार झारखंड में ST आबादी करीब 26.21 प्रतिशत थी। इसके मुकाबले विधानसभा की 28 ST आरक्षित सीटें कुल 81 सीटों का करीब 34.57 प्रतिशत हैं।

यहीं से परिसीमन के बाद संभावित बदलाव का सवाल पैदा होता है। अगर केवल 2011 के ST आबादी प्रतिशत को 81 विधानसभा सीटों पर गणितीय रूप से लागू किया जाए तो करीब 21 सीटें आती हैं। लेकिन इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि परिसीमन के बाद झारखंड में 28 ST सीटें घटकर 21 हो जाएंगी। यह केवल अनुपात समझने का गणित है। अंतिम संख्या तय करने के लिए नई Census, विधानसभा की कुल सीटों का पुनर्निर्धारण और संविधान के संबंधित प्रावधानों को एक साथ देखना होगा।

ST आरक्षण का आधार केवल Delimitation Bill नहीं है। इसका मूल आधार संविधान का Article 332 है। Article 332 राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीट आरक्षण का प्रावधान करता है। इसमें यह भी व्यवस्था है कि आरक्षित सीटों की संख्या, जहां तक संभव हो, संबंधित राज्य की कुल आबादी में ST आबादी के अनुपात के अनुरूप हो। इसलिए किसी परिसीमन कानून में ST आरक्षण को खत्म करने के लिए केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदलना पर्याप्त नहीं होगा। संवैधानिक प्रावधान अपनी जगह मौजूद हैं।

नई परिसीमन प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव सीटों की लोकेशन में हो सकता है। बिल की धारा 9 कहती है कि ST के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों को, जहां तक संभव हो, उन क्षेत्रों में रखा जाए जहां ST आबादी का अनुपात सबसे अधिक है।

झारखंड में आदिवासी आबादी पूरे राज्य में समान रूप से नहीं फैली है। कुछ जिले और क्षेत्र ऐसे हैं जहां ST आबादी बहुत अधिक है। 2011 Census के अनुसार प्रमुख आदिवासी बहुल जिलों में खूंटी, सिमडेगा, गुमला, पश्चिमी सिंहभूम, लोहरदगा, लातेहार, दुमका और पाकुड़ शामिल हैं। इन क्षेत्रों में ST आबादी का अनुपात राज्य के कई अन्य हिस्सों की तुलना में काफी अधिक है।

ऐसे में नई परिसीमन प्रक्रिया में इन क्षेत्रों की constituency boundaries और reservation status पर विशेष नजर रहेगी।

संताल परगना में भी परिसीमन का असर महत्वपूर्ण हो सकता है। यहां वर्तमान में बोरियो, बरहैत, लिट्टीपाड़ा, महेशपुर, शिकारीपाड़ा, दुमका और जामा जैसी प्रमुख ST आरक्षित विधानसभा सीटें हैं। नई परिसीमन प्रक्रिया में दो चीजें महत्वपूर्ण होंगी—पहली, नई Census में संबंधित क्षेत्रों की आबादी का आंकड़ा और दूसरी, परिसीमन के बाद निर्वाचन क्षेत्रों की नई सीमाएं।

अगर किसी क्षेत्र में ST आबादी का अनुपात अधिक पाया जाता है तो बिल की धारा 9 उस क्षेत्र को ST आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र के लिए प्राथमिकता देती है।

इसी तरह कोल्हान भी परिसीमन की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। वर्तमान में घाटशिला, पोटका, सरायकेला, चाईबासा, मझगांव, जगन्नाथपुर, मनोहरपुर, चक्रधरपुर और खरसावां जैसी सीटें ST आरक्षित हैं। विशेषकर पश्चिमी सिंहभूम में ST आबादी का अनुपात बहुत अधिक है। इसलिए यदि बिल में दिए गए सिद्धांतों के आधार पर नई सीटों का निर्धारण होता है तो कोल्हान का आदिवासी बहुल क्षेत्र परिसीमन के केंद्र में रह सकता है।

दक्षिणी छोटानागपुर में भी बड़ा असर संभव है। खूंटी, गुमला, सिमडेगा और लोहरदगा जैसे इलाके झारखंड के मजबूत आदिवासी बहुल क्षेत्रों में आते हैं। वर्तमान ST आरक्षित सीटों में तोरपा, खूंटी, खिजरी, मांडर, सिसई, गुमला, बिशुनपुर, सिमडेगा, कोलेबिरा और लोहरदगा शामिल हैं। यहां भी नई जनगणना के आंकड़े और नई constituency boundaries महत्वपूर्ण होंगी। हालांकि अभी यह कहना संभव नहीं है कि इनमें से कौन-सी सीट ST आरक्षित रहेगी और कौन-सी नहीं। अंतिम फैसला Delimitation Commission के आदेश से ही होगा।

अब सबसे बड़ा सवाल—क्या 28 ST सीटें कम हो सकती हैं?

इस संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन अभी ऐसा होने का दावा भी नहीं किया जा सकता। 2026 Bill Commission को नई Census के आधार पर सीटों का निर्धारण करने की जिम्मेदारी देता है। अगर नई जनगणना में ST आबादी का अनुपात बढ़ता है और विधानसभा की कुल सीटों की संख्या भी बढ़ती है तो ST आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ भी सकती है। वहीं यदि सीटों की कुल संख्या और ST आबादी का अनुपात अलग दिशा में जाता है तो संख्या बदल सकती है या घट भी सकती है।

इसलिए अभी सबसे सुरक्षित निष्कर्ष यही है कि 28 ST सीटों की मौजूदा संख्या को भविष्य के लिए स्थायी मानना भी सही नहीं है और उनके घटकर 21 हो जाने का दावा करना भी सही नहीं है।

लोकसभा में भी परिसीमन के बाद राजनीतिक गणित बदल सकता है। झारखंड में फिलहाल 14 लोकसभा सीटें हैं, जिनमें पांच ST आरक्षित हैं। नई परिसीमन प्रक्रिया में पहले यह तय होगा कि झारखंड को लोकसभा में कुल कितनी सीटें मिलेंगी। इसके बाद ST आरक्षित सीटों की संख्या और उनका क्षेत्र निर्धारित होगा। इसलिए लोकसभा में भी सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि ST सीटें कितनी हैं, बल्कि यह भी होगा कि कौन-कौन से क्षेत्र ST आरक्षित होंगे।

परिसीमन में महिलाओं के आरक्षण का नया आयाम भी जुड़ सकता है। Delimitation Bill, 2026 में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में लगभग एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की व्यवस्था को ध्यान में रखा गया है। इसमें SC/ST महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें भी शामिल हैं। बिल में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों की अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में rotation का प्रावधान है और SC/ST महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों की rotation संबंधित SC/ST आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के भीतर होगी।

इसका अर्थ यह है कि भविष्य में झारखंड की ST आरक्षित सीटों पर केवल परिसीमन और आरक्षण के पुनर्विन्यास का ही नहीं, बल्कि महिला आरक्षण की rotation का भी असर पड़ सकता है।

पूरे मामले को देखें तो कानून की नजर से ST आरक्षण समाप्त नहीं हो रहा है। लेकिन परिसीमन के बाद कुल विधानसभा सीटों की संख्या बदल सकती है, ST आरक्षित सीटों की संख्या बदल सकती है, ST आरक्षित सीटों की सीमाएं बदल सकती हैं, कुछ मौजूदा सीटें सामान्य हो सकती हैं, कुछ दूसरे क्षेत्र ST आरक्षित हो सकते हैं और ST आरक्षित सीटों के भीतर महिला आरक्षण की rotation भी हो सकती है।

इसलिए परिसीमन का प्रभाव केवल नक्शे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राज्य की राजनीतिक शक्ति-संरचना पर भी पड़ सकता है।

अंततः झारखंड में परिसीमन की बहस को केवल “आरक्षण रहेगा या खत्म होगा” के दो विकल्पों में देखना सही नहीं होगा। Delimitation Bill, 2026 में ST आरक्षण को खत्म करने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। बल्कि बिल में ST आरक्षित सीटों के निर्धारण का स्पष्ट प्रावधान है।

लेकिन नई Census के आधार पर सीटों के पुनर्गठन की वजह से झारखंड की मौजूदा 28 ST विधानसभा सीटों और पांच ST लोकसभा सीटों का भविष्य नए सिरे से तय होगा। अभी यह पता नहीं है कि नई परिसीमन प्रक्रिया के बाद झारखंड में ST की कितनी विधानसभा और लोकसभा सीटें होंगी। यह संख्या नई जनगणना और Delimitation Commission के अंतिम आदेश के बाद ही स्पष्ट होगी।

इसलिए इस पूरे विवाद का मूल सवाल यह नहीं है कि “ST आरक्षण खत्म होगा या नहीं?” बल्कि असली सवाल यह है—

“नई परिसीमन प्रक्रिया में झारखंड के आदिवासी बहुल क्षेत्रों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व किस अनुपात में और किस भौगोलिक संरचना के साथ तय होगा?”

यही सवाल आने वाले समय में झारखंड की राजनीति के लिए सबसे महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

यह भी पढ़ें – आदिवासी एकता महाजुटान पर सियासत तेज | भाजपा ने कांग्रेस-चर्च पर साधा निशाना | बाबूलाल बोले- बदलती डेमोग्राफी पर चुप्पी घातक

यह भी पढ़ें – आदिवासी महाजुटान रैली : राहुल गांधी को प्रदीप वर्मा का जवाब- ‘परिसीमन पर भ्रम क्यों? पहले घटती आदिवासी आबादी का जवाब खोजिए’

यह भी पढ़ें – Ranchi Adivasi Mahajutan: परिसीमन पर मोरहाबादी से आदिवासियों की हुंकार, बोले- ST आरक्षित सीटों में कटौती मंजूर नहीं

Share This Article
Follow:
वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *