झारखंड में BJP की हार की असली कहानी आदिवासी वोट से कहीं आगे है

Anand Kumar
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आनंद कुमार

झारखंड में भाजपा की चुनावी कहानी को समझने के लिए अक्सर सबसे पहले आदिवासी वोट की तरफ देखा जाता है। यह स्वाभाविक भी है। आखिर जिस राज्य में विधानसभा की 28 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं, वहां किसी भी राजनीतिक दल के लिए आदिवासी मतदाता की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

भाजपा के मामले में तो यह सवाल और भी बड़ा है। 2000 में पार्टी ने 28 ST सीटों में से 14 सीटें जीती थीं। 2024 में उसके खाते में इनमें से सिर्फ एक सीट आई।

पहली नजर में कहानी बिल्कुल सीधी लगती है—आदिवासी भाजपा से दूर हुए और भाजपा झारखंड में कमजोर होती चली गई।

लेकिन राजनीति की दिलचस्पी अक्सर पहली नजर में दिखाई देने वाली कहानी के पीछे छिपी होती है।

झारखंड के पिछले कुछ चुनावों के आंकड़े देखें तो एक सवाल बार-बार सामने आता है। अगर भाजपा का वोट वास्तव में खत्म हो रहा है, तो उसका वोट प्रतिशत 2019 और 2024 में लगभग एक जैसा क्यों रहा?

2019 में भाजपा को 33.37 प्रतिशत वोट मिले थे।

2024 में 33.18 प्रतिशत।

यानी पांच साल बाद भाजपा का वोट शेयर लगभग वहीं खड़ा था।

लेकिन सीटें 25 से घटकर 21 हो गईं।

और अगर थोड़ा और पीछे जाएं तो मामला और दिलचस्प हो जाता है। 2014 में भाजपा को 31.26 प्रतिशत वोट मिले थे और उसने 37 सीटें जीत ली थीं।

2014 से 2024 के बीच भाजपा का वोट प्रतिशत लगभग दो प्रतिशत बढ़ा, लेकिन सीटें 37 से घटकर 21 रह गईं।

यहीं से झारखंड की चुनावी कहानी एक दूसरी दिशा में मुड़ती है।

शायद सवाल यह नहीं है कि भाजपा के पास कितना वोट है।

शायद असली सवाल यह है कि उसके खिलाफ कितना वोट एक जगह खड़ा हो रहा है।

और यही वह जगह है जहां आदिवासी वोट की कहानी से आगे निकलकर झारखंड की राजनीति का असली चुनावी गणित दिखाई देने लगता है।

2000 में भाजपा की ताकत और आज की स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर

झारखंड अलग राज्य के रूप में 15 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आया। लेकिन अलग झारखंड विधानसभा के लिए चुनाव नहीं हुआ था। बिहार विधानसभा चुनाव के परिणामों के आधार पर झारखंड क्षेत्र की 81 सीटों से पहली विधानसभा बनी।

उस पहली विधानसभा में भाजपा के 32 विधायक थे।

यानी नए राज्य की राजनीति में भाजपा शुरुआत से ही हाशिये की पार्टी नहीं थी। वह सबसे बड़ी राजनीतिक ताकतों में से एक थी।

और केवल सामान्य सीटों पर नहीं। 28 ST आरक्षित सीटों में भाजपा ने 14 सीटें जीती थीं। यानी आधी सीटें।

यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज जब भाजपा की आदिवासी राजनीति पर सवाल उठते हैं, तब 2000 का यह आंकड़ा अपने आप में एक बड़ा जवाब है। भाजपा कभी झारखंड के आदिवासी इलाकों में इतनी कमजोर पार्टी नहीं थी कि उसे वहां केवल गैर-आदिवासी वोट की पार्टी कहा जा सके।

फिर धीरे-धीरे तस्वीर बदली।

2005 में भाजपा ने 30 सीटें जीतीं। उसका वोट शेयर करीब 23.57 प्रतिशत रहा। ST सीटों पर उसकी जीत घटकर आठ रह गई।

2009 में पार्टी 18 सीटों पर सिमट गई। वोट शेयर 20.18 प्रतिशत रह गया और ST सीटों पर जीत सात रह गई।

उस समय अगर कोई कहता कि भाजपा का झारखंड में आधार कमजोर हो रहा है, तो उसके पास आंकड़े थे।

लेकिन राजनीति कभी सीधी रेखा में नहीं चलती। और 2014 इसका सबसे बड़ा उदाहरण था।

2014 में भाजपा की वापसी सिर्फ वोट बढ़ने की कहानी नहीं थी

2014 में भाजपा ने 31.26 प्रतिशत वोट हासिल किए और 37 सीटें जीत लीं।

आजसू को 3.68 प्रतिशत वोट मिले और पांच सीटें मिलीं।

दोनों को जोड़िए तो 42 सीटें।

बहुमत से सिर्फ एक ज्यादा।

ST सीटों पर भी भाजपा की वापसी हुई और पार्टी ने 11 सीटें जीत लीं।

अगर कोई केवल 2009 और 2014 के आंकड़े देखे तो उसे लगेगा कि भाजपा ने जबरदस्त वापसी की और आदिवासी समाज फिर उसके साथ आ गया।

लेकिन चुनाव को थोड़ा और करीब से देखने पर एक दूसरी बात दिखाई देती है।

2014 में भाजपा के सामने विपक्ष एकजुट नहीं था।

JMM 19 सीटों पर था। कांग्रेस छह पर। JVM आठ पर।

यानी भाजपा के खिलाफ खड़ा वोट कई हिस्सों में बंटा हुआ था।

भाजपा और आजसू साथ थे, जबकि दूसरी तरफ विपक्ष अलग-अलग राजनीतिक लड़ाइयां लड़ रहा था।

इसका असर यह हुआ कि भाजपा का वोट कई सीटों पर जीत में बदल गया।

यही चुनाव हमें झारखंड की राजनीति का एक महत्वपूर्ण नियम समझाता है—

किसी पार्टी का वोट प्रतिशत जितना महत्वपूर्ण है, उससे कम महत्वपूर्ण यह नहीं है कि उसके खिलाफ वोट कितने हिस्सों में बंटा हुआ है।

2014 में भाजपा के पास अपना वोट था।

आजसू का साथ था।

और उसके खिलाफ वोट बंटा हुआ था।

इन तीनों चीजों ने मिलकर 37 सीटों का परिणाम पैदा किया।

फिर 2019 आया और कहानी उलट गई

2019 में भाजपा के वोट में कमी नहीं आई।

बल्कि वोट बढ़ा।

2014 के 31.26 प्रतिशत के मुकाबले भाजपा को 33.37 प्रतिशत वोट मिले।

लेकिन सीटें?

37 से सीधे 25।

यानी करीब दो प्रतिशत ज्यादा वोट और 12 सीटें कम।

ऐसा चुनावी राजनीति में तभी होता है जब वोट का भूगोल बदल जाए।

और झारखंड में यही हुआ।

JMM, कांग्रेस और RJD एक साथ आए।

इन तीनों का संयुक्त वोट शेयर करीब 35.35 प्रतिशत रहा और उन्होंने 47 सीटें जीत लीं।

अब जरा इस चुनाव को एक सामान्य मतदाता की नजर से समझिए।

अगर किसी सीट पर भाजपा को 35 प्रतिशत वोट मिलते हैं और उसके सामने तीन अलग-अलग विपक्षी उम्मीदवार हैं, तो भाजपा जीत सकती है।

लेकिन वही 35 प्रतिशत वोट अगर एक उम्मीदवार के खिलाफ 55 या 60 प्रतिशत में बदल जाए, तो भाजपा का वही वोट उसे जीत नहीं दिला पाएगा।

मतलब भाजपा का वोट कम होना जरूरी नहीं है।

उसे हराने के लिए उसके विरोधी वोट का एक जगह आ जाना भी काफी हो सकता है।

2019 में यही हुआ।

भाजपा का वोट बढ़ा।

लेकिन उसके खिलाफ वोट पहले से ज्यादा संगठित था।

और 37 सीटों वाली भाजपा 25 पर आ गई।

2024 ने इस कहानी को और साफ कर दिया

2024 में भाजपा का वोट शेयर 33.18 प्रतिशत रहा।

फिर वही लगभग 33 प्रतिशत।

लेकिन सीटें और कम होकर 21 हो गयीं।

दूसरी तरफ JMM, कांग्रेस, RJD और CPI(ML) के गठबंधन का वोट शेयर करीब 44.33 प्रतिशत रहा और गठबंधन 56 सीटें जीत गया।

यानी पांच साल में भाजपा का वोट शेयर लगभग स्थिर रहा, लेकिन उसके खिलाफ खड़ा गठबंधन लगभग नौ प्रतिशत और मजबूत हो गया।

अब 2019 और 2024 को एक साथ रखिए।

2019 में भाजपा – 33.37 प्रतिशत।

विपक्षी गठबंधन – 35.35 प्रतिशत।

2024 में भाजपा – 33.18 प्रतिशत।

विपक्षी गठबंधन – 44.33 प्रतिशत।

यहीं झारखंड की मौजूदा राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण संकेत छिपा हुआ है।

भाजपा का वोट बैंक अचानक गायब नहीं हुआ। उसके खिलाफ वोट का बड़ा हिस्सा एक जगह इकट्ठा हो गया।

और जब ऐसा होता है तो चुनाव का परिणाम केवल वोट प्रतिशत से नहीं, बल्कि सीट-दर-सीट मुकाबले से तय होता है।

फिर आदिवासी सीटों का क्या?

इस पूरे विश्लेषण का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि आदिवासी वोट को महत्वहीन मान लिया जाए।

भाजपा के लिए ST सीटों पर गिरावट बेहद गंभीर है।

2000 – 14 सीटें।

2005 – आठ।

2009 – सात।

2014 – 11 (ग्यारह)।

2019 – दो ।

2024 – एक।

यह कोई मामूली उतार-चढ़ाव नहीं है।

2024 में 28 ST सीटों में JMM ने 20 और कांग्रेस ने सात सीटें जीत लीं। भाजपा सिर्फ एक सीट तक सीमित रह गई।

इसलिए यह कहना गलत होगा कि आदिवासी राजनीति भाजपा की समस्या नहीं है।

समस्या है।

बहुत बड़ी समस्या है।

लेकिन इसे सिर्फ इस एक वाक्य में समेट देना कि “आदिवासी भाजपा से नाराज हो गए” शायद सही तस्वीर नहीं देता।

क्योंकि ST आरक्षित सीट का मतलब यह नहीं है कि उस सीट पर केवल आदिवासी मतदाता ही चुनाव का फैसला करते हैं।

हर सीट का अपना सामाजिक समीकरण होता है। उम्मीदवार का प्रभाव होता है। स्थानीय मुद्दे होते हैं। गठबंधन होता है। और सबसे महत्वपूर्ण—विपक्षी वोट किस तरह बंटता या जुड़ता है, यह भी परिणाम को प्रभावित करता है।

इसलिए भाजपा की 14 ST सीटों से एक सीट तक पहुंचने की कहानी में आदिवासी असंतोष एक महत्वपूर्ण अध्याय जरूर है, लेकिन पूरी किताब नहीं।

रघुवर सरकार के दौर के मुद्दों का असर हुआ, लेकिन कहानी वहीं खत्म नहीं होती

रघुवर दास सरकार के दौरान CNT-SPT कानून में संशोधन की कोशिश, पत्थलगड़ी आंदोलन, धर्मांतरण कानून और आदिवासी पहचान से जुड़े कई मुद्दे राजनीतिक बहस के केंद्र में रहे।

इनका आदिवासी समाज के एक हिस्से पर असर पड़ा होगा।

भाजपा के कुछ पारंपरिक समर्थक उससे दूर हुए होंगे।

लेकिन अगर केवल यही कारण था, तो एक सवाल फिर खड़ा होता है।

2019 और 2024 में भाजपा का कुल वोट शेयर करीब 33 प्रतिशत पर कैसे बना रहा?

यानी कुछ सामाजिक समूह भाजपा से दूर गए, तो दूसरे समूहों ने उस कमी को काफी हद तक भर दिया।

यही कारण है कि भाजपा की चुनावी कमजोरी को “वोट बैंक खत्म हो गया” कहना भी ठीक नहीं है।

उसके पास आज भी एक बड़ा वोट आधार है।

उसके पास संगठन है।

उसके पास संसाधन हैं।

उसके पास मजबूत गैर-आदिवासी समर्थन आधार है।

और आदिवासी समाज में भी उसका वोट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

फिर भी वह सत्ता में नहीं पहुंच पा रही।

क्यों? क्योंकि अब सवाल वोट के अस्तित्व का कम और वोट के रूपांतरण का ज्यादा है।

आजसू को अलग करके भी यह कहानी पूरी नहीं होगी

झारखंड के इस चुनावी गणित में आजसू की भूमिका भी दिलचस्प है।

2014 में भाजपा और आजसू साथ थे और NDA 42 सीटों तक पहुंचा।

2019 में दोनों अलग हुए। भाजपा 25 सीटों पर रही और आजसू को दो सीटें मिलीं। आजसू का वोट शेयर करीब 8.10 प्रतिशत था।

2024 में दोनों फिर साथ आए। NDA को 24 सीटें मिलीं—भाजपा 21, आजसू एक, JDU एक और LJP एक।

इससे एक सवाल निकलता है।

आजसू भाजपा का वोट बढ़ाती है या विपक्ष का वोट काटती है?

शायद दोनों।

लेकिन हर चुनाव में इसका अनुपात अलग हो सकता है।

2019 में आजसू अलग थी तो उसके वोट का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ नहीं गया। 2024 में गठबंधन होने के बावजूद भाजपा की सीटें नहीं बढ़ीं।

इसलिए केवल गठबंधन कर लेना पर्याप्त नहीं है।

सवाल यह है कि गठबंधन जमीन पर किस तरह का वोट ट्रांसफर पैदा करता है।

यही चुनावी राजनीति की असली परीक्षा है।

2029 में असली लड़ाई किससे होगी?

अब सबसे दिलचस्प सवाल 2029 का है।

अगर भाजपा और आजसू साथ रहते हैं और दूसरी तरफ JMM, कांग्रेस, RJD और वाम दल एकजुट रहते हैं, तो भाजपा के सामने चुनौती बहुत बड़ी होगी।

अगर इसके साथ जयराम महतो की JLKM भी अपनी जमीन मजबूत करती है, तो गणित और जटिल हो जाएगा।

क्योंकि तब सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि कौन कितने वोट लाता है।

सवाल यह होगा कि कौन किसका वोट काटता है।

किस सीट पर कौन मजबूत है।

कहां विपक्षी वोट एकजुट है।

और कहां उसमें दरार है।

यही वजह है कि 2029 की लड़ाई को आज से सिर्फ “भाजपा बनाम हेमंत सोरेन” कहना शायद सही तस्वीर नहीं होगी।

असल मुकाबला एक बड़े चुनावी गणित का होगा।

एक तरफ भाजपा का अपना स्थिर वोट आधार।

दूसरी तरफ उसके खिलाफ खड़ा सामाजिक गठजोड़।

और इनके बीच उन दलों की भूमिका, जो कुछ सीटों पर चुनाव का पूरा समीकरण बदल सकते हैं।

भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

भाजपा अगर 2029 में झारखंड में वापस आना चाहती है तो उसके सामने दो रास्ते हैं।

पहला—वह अपना वोट आधार इतना बढ़ाए कि विपक्षी एकता का गणित भी उसे रोक न सके।

दूसरा—वह विपक्ष के संभावित गठबंधन को कमजोर करे और अपने खिलाफ वोट के एकजुट होने की संभावना को तोड़े।

लेकिन दोनों रास्तों के लिए केवल चुनाव के समय की रणनीति पर्याप्त नहीं होगी।

भाजपा को संगठन में फिर से लय लानी होगी।

कार्यकर्ताओं में जो निराशा है, उसे समझना होगा।

स्थानीय नेताओं को अधिक महत्व देना होगा।

बड़े नेताओं के बीच खींचतान को कम करना होगा।

और सबसे महत्वपूर्ण—झारखंड के लिए अपनी एक ऐसी राजनीतिक कहानी बनानी होगी, जो केवल राष्ट्रीय मुद्दों की प्रतिध्वनि न हो।

क्योंकि चुनाव केवल नारों से नहीं जीते जाते।

चुनाव संगठन से जीते जाते हैं।

संगठन कार्यकर्ता से चलता है।

और कार्यकर्ता तभी मैदान में उतरता है जब उसे लगता है कि पार्टी की लड़ाई उसकी अपनी लड़ाई है।

33 प्रतिशत वोट की सीमा

झारखंड की पिछली एक दशक की राजनीति को अगर एक आंकड़े में समझना हो तो वह लगभग 33 प्रतिशत है।

2014 में भाजपा—31.26 प्रतिशत।

2019 में—33.37 प्रतिशत।

2024 में—33.18 प्रतिशत।

लेकिन सीटें?

37।

फिर 25।

फिर 21।

यह अंतर बहुत कुछ कहता है।

यह बताता है कि भाजपा का वोट शेयर और उसकी चुनावी सफलता एक-दूसरे के साथ उसी अनुपात में नहीं चल रहे।

2014 में वही भाजपा, लगभग 31 प्रतिशत वोट के साथ, सत्ता तक पहुंच गई।

2019 और 2024 में करीब 33 प्रतिशत वोट के बावजूद सत्ता से दूर रही।

यानी भाजपा की समस्या यह नहीं है कि उसके पास वोट नहीं है।

समस्या यह है कि उसके वोट के सामने खड़ा वोट उससे ज्यादा संगठित हो गया है।

और यही वह बिंदु है जहां झारखंड की राजनीति को सिर्फ “आदिवासी बनाम भाजपा” के चश्मे से देखना अधूरा पड़ जाता है।

आदिवासी वोट महत्वपूर्ण है।

बहुत महत्वपूर्ण।

लेकिन चुनाव का अंतिम परिणाम केवल यह तय नहीं करता कि भाजपा के साथ कौन है।

वह यह भी तय करता है कि भाजपा के खिलाफ कौन-कौन है—और वे कितने एक साथ हैं।

यही 2019 ने दिखाया।

यही 2024 ने और स्पष्ट कर दिया।

और अगर 2029 में भी यही गणित दोहराया गया, तो भाजपा के लिए 33-34 प्रतिशत वोट लेकर झारखंड की सत्ता में लौटना आसान नहीं होगा।

इसलिए भाजपा के सामने 2029 का सबसे बड़ा सवाल शायद यह नहीं है कि उसे कितने नए वोट चाहिए।

सवाल इससे थोड़ा अलग है—

क्या भाजपा अपने खिलाफ खड़े वोट को एक जगह आने से रोक सकती है?

अगर जवाब हां है, तो 2014 जैसी कहानी फिर लिखी जा सकती है।

अगर जवाब नहीं है, तो 2019 और 2024 का पैटर्न आगे भी दोहराया जा सकता है।

और शायद झारखंड की अगली चुनावी कहानी का सबसे बड़ा रहस्य इसी एक सवाल में छिपा है।

यह भी पढ़ें – झारखंड भाजपा : 14 आदिवासी सीटों से 1 तक का सफर, 2029 में क्या भरोसा लौट पाएगा?

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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