रांची: झारखंड में प्रस्तावित परिसीमन को लेकर आदिवासी संगठनों की चिंता अब राजभवन तक पहुंच गई है। पूर्व मंत्री बंधु तिर्की के नेतृत्व में विभिन्न आदिवासी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा। प्रतिनिधिमंडल ने मांग की कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में परिसीमन करते समय केवल जनसंख्या को आधार नहीं बनाया जाए, बल्कि संविधान की पांचवीं अनुसूची की भावना और आदिवासी क्षेत्रों की जमीनी परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाए।
हालांकि परिसीमन को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं हुई है, लेकिन संभावित बदलावों को लेकर आदिवासी संगठनों में चिंता बढ़ रही है। प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल को जनसांख्यिकीय बदलाव, आदिवासी आबादी में कमी, पलायन और विस्थापन समेत कई मुद्दों से अवगत कराया।
सिर्फ जनसंख्या के आधार पर परिसीमन का विरोध
राज्यपाल को सौंपे गए ज्ञापन में आदिवासी संगठनों ने कहा कि झारखंड के पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों की संवेदनशीलता को देखते हुए परिसीमन की प्रक्रिया में सिर्फ जनसंख्या के आंकड़ों को आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।
प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि आदिवासी बहुल क्षेत्रों में लंबे समय से पलायन, विस्थापन और जनसांख्यिकीय बदलाव जैसी परिस्थितियां रही हैं। ऐसे में केवल वर्तमान जनसंख्या के आधार पर परिसीमन करने से आदिवासी हितों और संवैधानिक संरक्षण पर असर पड़ सकता है।
बंधु तिर्की बोले- आदिवासियों के लिए बड़ा खतरा पैदा हो सकता है
राज्यपाल से मुलाकात के बाद पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने कहा कि प्रतिनिधिमंडल ने प्रस्तावित परिसीमन को लेकर आदिवासी संगठनों की आशंकाओं से राज्यपाल को अवगत कराया है। उन्होंने कहा कि बैठक में आदिवासी समुदाय से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी विस्तार से चर्चा हुई।
बंधु तिर्की के मुताबिक, डेमोग्राफी में बदलाव, ट्राइबल सब-प्लान, CNT एक्ट और PESA कानून जैसे विषयों को भी राज्यपाल के सामने रखा गया।
उन्होंने कहा कि प्रतिनिधिमंडल ने परिसीमन के दो पहलुओं पर अपनी बात रखी। पहला संवैधानिक पहलू और दूसरा झारखंड की जमीनी स्थिति। उन्होंने कहा कि आदिवासी आबादी में कमी, पलायन और विस्थापन जैसी परिस्थितियों का भी परिसीमन पर विचार करते समय ध्यान रखा जाना चाहिए।
बंधु तिर्की ने आशंका जताई कि अगर परिसीमन में केवल जनसंख्या को आधार बनाया गया और इन सभी पहलुओं को नजरअंदाज किया गया, तो आने वाले समय में आदिवासी समुदाय के सामने बड़ा खतरा पैदा हो सकता है।
सरकार और राजनीतिक दलों से भी मिलेगा प्रतिनिधिमंडल
बंधु तिर्की ने कहा कि इस मुद्दे पर प्रतिनिधिमंडल आगे राज्य सरकार, झारखंड के सांसदों और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात करेगा। उनका कहना है कि परिसीमन से जुड़े संवैधानिक और कानूनी पहलुओं पर व्यापक चर्चा जरूरी है।
वासवी किड़ो ने कहा- समय रहते कदम उठाना जरूरी
सामाजिक कार्यकर्ता वासवी किड़ो ने कहा कि आदिवासी समुदाय प्रस्तावित परिसीमन को लेकर बेहद चिंतित है। उन्होंने कहा कि प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल के समक्ष अपनी चिंताएं रखी हैं और राज्यपाल ने भी मामले की गंभीरता को महसूस किया है।
वासवी किड़ो के मुताबिक, अगर समय रहते राजनीतिक दलों और संबंधित पक्षों ने इस मुद्दे पर कदम नहीं उठाया, तो आने वाले दिनों में गंभीर संकट पैदा हो सकता है।
उन्होंने कहा कि मुलाकात के दौरान पांचवीं अनुसूची, जनसांख्यिकीय बदलाव और परिसीमन से जुड़े संवैधानिक एवं कानूनी पहलुओं पर विस्तार से अपनी बात रखी गई।
क्या है आदिवासी संगठनों की मुख्य चिंता?
आदिवासी संगठनों की चिंता मुख्य रूप से इन मुद्दों को लेकर है:
- पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में परिसीमन
- केवल जनसंख्या को आधार बनाने का विरोध
- आदिवासी आबादी में कमी
- पलायन और विस्थापन
- जनसांख्यिकीय बदलाव
- CNT एक्ट और PESA कानून
- ट्राइबल सब-प्लान
- आदिवासी क्षेत्रों के संवैधानिक संरक्षण का सवाल
अब इस मुद्दे पर प्रतिनिधिमंडल की सरकार और राजनीतिक दलों के साथ होने वाली प्रस्तावित बैठकों पर नजर रहेगी।
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