Ranchi: रांची के मोरहाबादी मैदान में आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान में कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के संदेश पर भाजपा के नवनियुक्त राष्ट्रीय मंत्री और झारखंड से राज्यसभा सांसद डॉ. प्रदीप कुमार वर्मा ने तीखा हमला बोला है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब झारखंड में परिसीमन का कोई नया ड्राफ्ट या अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों को घटाने का कोई प्रस्ताव सामने नहीं आया है, तो आदिवासी सीटें कम होने का भय क्यों दिखाया जा रहा है।
राहुल गांधी ने अपने संदेश में कहा था कि कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो पाने के बावजूद वह आदिवासी समाज के अधिकार, पहचान और सम्मान की लड़ाई में मजबूती से साथ खड़े हैं। उन्होंने आदिवासी अधिकारों को कांग्रेस के लिए सर्वोपरि बताते हुए संविधान की पांचवीं अनुसूची, पेसा कानून और वन अधिकार कानून का उल्लेख किया था।
राहुल गांधी ने कहा था कि इन संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों का उद्देश्य जल-जंगल-जमीन की रक्षा करने वाले समुदायों की अपने संसाधनों पर मजबूत आवाज सुनिश्चित करना है। उन्होंने विकास को विस्थापन से अलग रखने की जरूरत बताते हुए कहा कि विकास लोगों की भागीदारी, सहमति और सम्मान के साथ होना चाहिए।
उन्होंने परिसीमन को केवल लोकसभा और विधानसभा की सीटों के पुनर्गठन का विषय नहीं, बल्कि आदिवासियों के हक और अधिकार की लड़ाई से भी जोड़कर देखा।
प्रदीप वर्मा बोले- किस आधार पर फैलाया जा रहा भ्रम?
राहुल गांधी के इसी संदेश पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रदीप वर्मा ने संविधान के अनुच्छेद 332(3) का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इस प्रावधान के तहत राज्य विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या राज्य की ST आबादी के अनुपात से संबंधित संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार तय होती है।
प्रदीप वर्मा ने सवाल किया कि जब झारखंड के लिए अभी तक परिसीमन का कोई नया ड्राफ्ट सामने नहीं आया है और निर्वाचन आयोग की ओर से 28 ST सीटों को घटाने का कोई प्रस्ताव जारी नहीं किया गया है, तो भाजपा पर आदिवासी सीटें घटाने की योजना का आरोप किस आधार पर लगाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया संवैधानिक प्रावधानों के तहत होगी और इसे लेकर अभी से किसी निश्चित संख्या का दावा करना उचित नहीं है।
‘सिर्फ सीटों की राजनीति मत कीजिए, घटती आबादी का जवाब भी खोजिए’
भाजपा नेता ने राहुल गांधी पर पलटवार करते हुए कहा कि अगर कांग्रेस को वास्तव में आदिवासी समाज के अस्तित्व और अधिकारों की चिंता है तो उसे केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात नहीं करनी चाहिए, बल्कि आदिवासी आबादी में कमी को लेकर भी सवाल उठाने चाहिए।
प्रदीप वर्मा ने झारखंड के संथाल परगना में आदिवासी आबादी के अनुपात में कथित गिरावट का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से झारखंड हाईकोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में Registrar General of India से सत्यापित आंकड़ों का हवाला देते हुए संथाल परगना में ST आबादी की हिस्सेदारी 1951 के 44.67 प्रतिशत से घटकर 2011 में 28.11 प्रतिशत होने की बात कही गई है।
उन्होंने कहा कि उसी हलफनामे में साहिबगंज और पाकुड़ के रास्ते कथित घुसपैठ, पलायन, जन्मदर में कमी और ईसाई धर्मांतरण सहित विभिन्न कारणों की जांच की आवश्यकता का उल्लेख किया गया है।
हालांकि इन कारणों को लेकर भाजपा नेता के दावों को संबंधित सरकारी दस्तावेज और स्वतंत्र आंकड़ों के संदर्भ में देखना जरूरी होगा।
‘आदिवासी की सीट या आदिवासी का अस्तित्व?’
प्रदीप वर्मा ने राहुल गांधी से सवाल किया कि कांग्रेस की चिंता केवल आदिवासी आरक्षित सीटों तक सीमित है या वह आदिवासी समाज की घटती आबादी, जमीन और अस्तित्व से जुड़े सवालों को भी उतनी ही गंभीरता से देखती है।
उन्होंने कहा कि पांचवीं अनुसूची, पेसा और वन अधिकार कानून किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हैं, बल्कि संविधान और कानून के माध्यम से आदिवासी समाज को मिले अधिकार हैं।
भाजपा नेता ने कहा कि इन अधिकारों की रक्षा करना सभी की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
‘काल्पनिक भय दिखाकर राजनीतिक रोटी सेंकने से बचें’
प्रदीप वर्मा ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि आदिवासी समाज को कथित भय दिखाकर राजनीति करने के बजाय कांग्रेस को संथाल परगना की बदलती जनसांख्यिकी, आदिवासी जमीन की सुरक्षा, पलायन और कथित अवैध घुसपैठ जैसे सवालों पर अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को डर नहीं, बल्कि अपनी जमीन, पहचान और संवैधानिक अधिकारों की वास्तविक सुरक्षा चाहिए।
परिसीमन पर भाजपा का सवाल- पहले प्रक्रिया सामने आए
भाजपा नेता ने कहा कि परिसीमन संविधान और निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार होगा। किसी राजनीतिक दल के आरोप या आशंकाओं के आधार पर सीटों की संख्या तय नहीं होगी।
उनका कहना है कि जब तक परिसीमन की औपचारिक प्रक्रिया और संबंधित प्रस्ताव सामने नहीं आते, तब तक यह दावा करना कि झारखंड में ST आरक्षित सीटें निश्चित रूप से घट जाएंगी, राजनीतिक आशंका से ज्यादा कुछ नहीं है।
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