क्या झारखंड में दोहराया जायेगा राज्यसभा चुनाव का ‘काला इतिहास’!

Anand Kumar
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Anand Kumar

झारखंड की राजनीति और राज्यसभा चुनाव। ये दो ऐसे शब्द हैं जिनका साथ आना किसी सस्पेंस थ्रिलर फिल्म की पटकथा जैसा लगता है। जब भी राज्य में उच्च सदन के लिए मतदान की सुगराहट तेज होती है, तो जेहन में विकास की बातें कम और हॉर्स ट्रेडिंग, सूटकेस में बंद करोड़ों का कैश और बाहरी ‘थैलीशाहों’ के चेहरों की रील ज्यादा घूमने लगती है।

यह वही राज्य है जिसने भारतीय संसदीय इतिहास में वह काला दिन भी देखा, जब चुनाव आयोग को पहली बार भ्रष्टाचार के चलते पूरी चुनाव प्रक्रिया ही रद्द करनी पड़ी थी।

मई 2026 में झारखंड में फिर से राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनाव होने हैं। सत्ता के गलियारों में फिर वही पुराना सवाल गूंज रहा है- क्या इस बार पिछले तीन बार की तरह चुनाव की शुचिता बरकरार रहेगी? या फिर पुराना इतिहास दोहराया जायेगा और गठबंधन की दरारों के बीच से नोटों की गड्डियां अपना रास्ता तलाशेंगी?

समीकरणों का जाल: अंकगणित और राजनीतिक केमिस्ट्री

वर्तमान में 81 सदस्यीय विधानसभा के अंकगणित पर गौर करें, तो सत्ता पक्ष बेहद मजबूत स्थिति में दिखता है। 21 जून को भाजपा सांसद दीपक प्रकाश का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, जबकि गुरुजी (शिबू सोरेन) के निधन के बाद ही एक सीट रिक्त है। इन दो सीटों के लिए होने वाले चुनाव में जीत का जादुई आंकड़ा 2828 यानी 56 है।

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वर्तमान दलीय स्थिति:

  • सत्ता पक्ष (महाबंधन – 56): झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के पास 34, कांग्रेस के पास 16, राजद के पास 4 और माले के 2 विधायक हैं।
  • विपक्ष (NDA – 24): भाजपा के 21 विधायक हैं, जबकि आजसू, जदयू और लोजपा-आर के पास एक-एक विधायक है।
  • अन्य: जयराम महतो, जो वर्तमान में किसी भी खेमे में नहीं हैं।

गणित कहता है कि महागठबंधन के पास 56 का आंकड़ा है, यानी वे बिना किसी परेशानी के दोनों सीटें जीत सकते हैं। लेकिन राजनीति केवल जोड़-घटाव नहीं है। असली पेंच ‘केमिस्ट्री’ में फंसा है।

महागठबंधन में ‘गृहयुद्ध’: कांग्रेस बनाम झामुमो

भले ही सत्ता पक्ष के पास नंबर ज्यादा हों, लेकिन आपसी खींचतान ने विपक्ष को उम्मीद की किरण दिखा दी है। हाल के दिनों में झामुमो और कांग्रेस के बीच जो कड़वाहट दिखी है, वह चिंताजनक है। झामुमो के नेताओं द्वारा कांग्रेस को ‘जहरवाला सांप’ बताना और पलटवार में कांग्रेस का राज्य की कानून-व्यवस्था और माइनिंग माफिया पर सवाल उठाना, यह बताता है कि गठबंधन की गांठें ढीली पड़ चुकी हैं।

कांग्रेस का स्पष्ट कहना है कि “एक सीट पर हमारा हक है।” वहीं झामुमो दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की रणनीति बना रहा है। यदि झामुमो एक सीट जीतकर अपने बचे हुए वोटों को कांग्रेस को नहीं देता, या कांग्रेस अपनी उपेक्षा से नाराज होकर अपना अलग प्रत्याशी उतारती है, तो मामला ‘क्रॉस वोटिंग’ की ओर मुड़ जाएगा। यही वह स्थिति है जहां ‘तीसरे खिलाड़ी’ यानी किसी रसूखदार निर्दलीय की एंट्री होती है।

काला इतिहास: जब ‘खासतौर पर बदनाम’ हुआ झारखंड

झारखंड में राज्यसभा चुनाव के भ्रष्टाचार को समझने के लिए हमें इतिहास के उन पन्नों को पलटना होगा, जिनसे आज भी बदबू आती है।

राज्यसभा चुनाव
प्रतीकात्मक तसवीर

2010: कैमरे पर बिकते ‘माननीय’

साल 2010 का वह स्टिंग ऑपरेशन कोई नहीं भूल सकता, जिसमें राज्य के कई दिग्गज विधायक कैमरे के सामने अपनी आत्मा का सौदा करते पकड़े गए थे। झामुमो, कांग्रेस और भाजपा तक के विधायकों ने एक वोट की कीमत 50 लाख से 1 करोड़ रुपये तक लगाई थी। सीबीआई ने इस मामले में उमा शंकर अकेला, योगेंद्र साव, राजेश रंजन और साइमन मरांडी जैसे नामों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। यह पहली बार था जब जनता ने देखा कि कैसे उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधि लोकतंत्र की नीलामी कर रहे हैं।

राज्यसभा चुनाव

2012: 2.15 करोड़ का वो सूटकेस

30 मार्च 2012 को झारखंड ने वह कलंक झेला जो देश के किसी और राज्य ने नहीं देखा था। वोटिंग वाले दिन सुबह-सुबह रांची के नामकुम इलाके में एक इनोवा कार पकड़ी गई, जिसकी डिक्की से 2 करोड़ 15 लाख रुपये बरामद हुए। यह पैसा एक निर्दलीय उम्मीदवार आर.के. अग्रवाल का था। उस दिन चुनाव आयोग ने जो फैसला लिया, वह ऐतिहासिक था। भारत के इतिहास में पहली बार राज्यसभा चुनाव को ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ के चलते रद्द कर दिया गया। तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि “झारखंड राज्यसभा चुनाव के मामले में खासतौर पर बदनाम हो चुका है।”

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थैलीशाहों का ‘सॉफ्ट टारगेट’

झारखंड बाहरी उद्योगपतियों के लिए हमेशा से एक ‘शॉर्टकट’ रहा है। यहां की गरीबी और राजनीतिक अस्थिरता का फायदा उठाकर कई ऐसे लोग दिल्ली के गलियारों तक पहुंचे, जिनका झारखंड की मिट्टी से कोई लेना-देना नहीं था।

  • के.डी. सिंह: ‘एल्केमिस्ट ग्रुप’ के मालिक, जो झामुमो के टिकट पर राज्यसभा गए और बाद में टीएमसी में शामिल हो गए। उन पर हमेशा विधायकों को ‘मैनेज’ करने के आरोप लगे।
  • परिमल नथवानी: रिलायंस ग्रुप के शीर्ष अधिकारी, जिन्होंने 2008 और 2014 में दो बार निर्दलीय के रूप में जीत हासिल की। बिना किसी कैडर और बिना किसी पार्टी के समर्थन के उनकी जीत यह बताने के लिए काफी थी कि ‘मैनेजमेंट’ कैसे काम करता है।
  • अंशुमन मिश्रा: 2012 में लंदन के इस एनआरआई बिजनेसमैन ने भी हाथ आजमाया था, लेकिन चौतरफा विरोध के बाद उन्हें पैर पीछे खींचने पड़े।
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2016 : नया दौर, वही खेल

तरीके बदलते रहे, लेकिन मंशा वही रही। 2016 में बाबूलाल मरांडी ने एक ऑडियो टेप जारी कर सनसनी फैला दी थी। आरोप था कि सत्ता पक्ष ने कांग्रेस विधायक निर्मला देवी को वोट डालने से रोकने के लिए उनके पति योगेंद्र साव को करोड़ों के प्रलोभन और अन्य वादे किए थे। यह ऑडियो क्लिप राजनीतिक शुचिता पर एक बड़ा तमाचा थी।

भविष्य की आशंकाएं और चुनौतियां

अब सवाल यह है कि क्या 2026 में इतिहास खुद को दोहराएगा? गनीमत यह रही है कि 2019 के बाद से हुए चुनाव काफी हद तक साफ-सुथरे रहे हैं। लेकिन इस बार का परिदृश्य अलग है:

राज्यसभा चुनाव
  1. सत्ता पक्ष की फूट: यदि झामुमो और कांग्रेस के बीच सहमति नहीं बनी, तो विधायकों की नाराजगी का फायदा कोई तीसरा पक्ष उठा सकता है।
  2. विपक्ष की रणनीति: भाजपा के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, लेकिन पाने के लिए एक सीट है। यदि वे किसी ऐसे चेहरे का समर्थन करते हैं जो ‘अदृश्य’ रूप से संसाधन संपन्न है, तो खेल पलट सकता है।
  3. जागरूकता: जयराम महतो जैसे नए राजनीतिक चेहरे ‘शुद्ध राजनीति’ की बात कर रहे हैं। क्या उनका प्रभाव विधायकों को अनैतिक होने से रोकेगा?

उम्मीद बाकी है

राज्यसभा को ‘बुद्धिजीवियों का सदन’ कहा जाता है, लेकिन इतिहास गवाह है कि झारखंड में इसे ‘थैलीशाहों का सदन’ बनाने की कोशिशें होती रही हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि 2019 के बाद से पिछले तीन राज्यसभा चुनावों की तरह इस बार भी लोकतांत्रिक मूल्यों की जीत होगी। लेकिन झारखंड की राजनीति का इतिहास हमें सतर्क रहने की सलाह देता है।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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