नक्सल आंदोलन का बड़ा चेहरा खत्म: ‘किशन दा’ उर्फ प्रशांत बोस का निधन, जेल में ली अंतिम सांस

Anand Kumar
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Ranchi : झारखंड की राजधानी रांची स्थित बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा (होटवार) में प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य और पूर्वी क्षेत्रीय ब्यूरो के सचिव प्रशांत बोस उर्फ ‘किशन दा’ का शुक्रवार सुबह निधन हो गया। जेल प्रशासन के अनुसार, तीन अप्रैल की सुबह करीब चार बजे उनकी तबीयत अचानक बिगड़ी, जिसके बाद उन्हें रिम्स ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। उनकी उम्र 75 वर्ष से अधिक थी।

शव को पोस्टमॉर्टम के लिए रिम्स भेज दिया गया है और प्रशासन ने परिजनों को सूचना दे दी है। सुरक्षा एजेंसियां इस घटनाक्रम के बाद सतर्क हो गई हैं।

संगठन में नंबर-2 की हैसियत, लंबे समय तक रहे रणनीतिक चेहरा

प्रशांत बोस भाकपा (माओवादी) के शीर्ष नेतृत्व में शामिल थे और संगठन में उन्हें महासचिव नंबला केशव राव उर्फ बसवराज के बाद दूसरा सबसे वरिष्ठ नेता माना जाता था। वे पश्चिम बंगाल के कोलकाता के जादवपुर इलाके के रहने वाले थे और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (एमसीसीआई) के प्रमुख चेहरों में रहे।

वर्ष 2004 में एमसीसीआई और पीपुल्स वार ग्रुप के विलय के बाद बनी भाकपा (माओवादी) में वे पोलित ब्यूरो और केंद्रीय समिति के सदस्य बने। संगठन में उन्हें ‘किशन दा’, ‘मनीष’, ‘निर्भय’ और ‘काजल’ जैसे नामों से जाना जाता था।

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गिरफ्तारी: 1 करोड़ के इनामी नेता को 2021 में पकड़ा गया

12 नवंबर 2021 को झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले में प्रशांत बोस को उनकी पत्नी शीला मरांडी के साथ गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के समय उन पर एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित था।

सूत्रों के अनुसार, दोनों सरंडा जंगल में होने वाली एक गुप्त बैठक में शामिल होने जा रहे थे, तभी टोल प्लाजा के पास सुरक्षा बलों ने उन्हें हिरासत में ले लिया। इसके बाद से वे बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा में बंद थे।

जेल में बदली जिंदगी: गीता पढ़ने में बिताते थे समय

जेल सूत्रों के मुताबिक, प्रशांत बोस लंबे समय से कई बीमारियों से जूझ रहे थे और चलने-फिरने में भी असमर्थ हो गए थे।

बताया जाता है कि उन्होंने अपने अंतिम वर्षों में ज्यादातर समय पढ़ने में बिताया। वे बार-बार श्रीमद्भगवद्गीता का अंग्रेजी अनुवाद मंगवाते थे। एक समय के सशस्त्र आंदोलन के रणनीतिकार अब जीवन के अंतिम चरण में आध्यात्मिक ग्रंथों में अर्थ तलाशते नजर आए।

बड़े हमलों के मास्टरमाइंड, लंबा रहा नक्सली इतिहास

किशन दा नक्सली आंदोलन के पुराने और प्रभावशाली कमांडरों में गिने जाते थे। बिहार, झारखंड और ओडिशा के कई इलाकों में उन्होंने माओवादी गतिविधियों को संगठित किया।

  • 2001 में धनबाद के तोपचांची जैप कैंप पर हमले में 16 जवानों की मौत
  • 1992 के बारा नरसंहार से जुड़ा नाम
  • कई अन्य बड़ी वारदातों में भूमिका

वे ईस्टर्न रीजनल ब्यूरो के सचिव के तौर पर झारखंड-बिहार क्षेत्र की जिम्मेदारी संभालते रहे।

विश्लेषण: माओवादी आंदोलन के एक दौर का अंत

प्रशांत बोस की गिरफ्तारी को पहले ही माओवादी आंदोलन के लिए बड़ा झटका माना गया था। बीते कुछ वर्षों में संगठन लगातार कमजोर हुआ है—कई शीर्ष नेता मारे गए या गिरफ्तार हुए।

अब उनकी मौत के साथ माओवादी आंदोलन के पुराने दौर का एक और अध्याय समाप्त होता दिख रहा है। हालांकि सुरक्षा एजेंसियां इस बात पर नजर बनाए हुए हैं कि संगठन में इसके बाद नेतृत्व और रणनीति में क्या बदलाव आता है।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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