Jan-Man Special : झारखंड में सत्ताधारी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) अब अपनी राजनीतिक सीमाओं को विस्तार देने के लिए बेताब है। पार्टी ने पड़ोसी राज्य असम के आगामी विधानसभा चुनाव 2026 में पूरी ताकत झोंकने का मन बना लिया है। यह मजह एक चुनाव लड़ने की घोषणा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीतिक चाल है, जिसके केंद्र में असम की सियासत में ‘तीर-धनुष’ चिह्न पर एकाधिकार और ‘इंडिया ब्लॉक’ के भीतर अपनी सौदेबाजी की शक्ति (Bargaining Power) बढ़ाना है।
इस लेख में हम झामुमो के इस कदम के तीन मुख्य पहलुओं : चुनाव चिह्न की राजनीति, गठबंधन का पेंच और असम के जमीनी समीकरणों पर चर्चा करेंगे।
चुनाव चिह्न की ‘सांकेतिक’ राजनीति: शिवसेना बनाम झामुमो
झामुमो ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को एक पत्र लिखा है। पार्टी के केंद्रीय महासचिव और कद्दावर प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने शुक्रवार को पुष्टि की कि उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से असम चुनाव के लिए ‘तीर-धनुष’ चिह्न को झामुमो के लिए आरक्षित करने की मांग की है।
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यह मांग महज तकनीकी नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक अर्थ रखती है।
- दलील: सुप्रियो भट्टाचार्य का तर्क है कि देश में केवल दो ही ‘स्टेट रिकॉग्नाइज्ड’ पार्टियां हैं जिनके पास यह चिह्न है- झामुमो और शिवसेना।
- रणनीति : चूंकि असम में शिवसेना (शिंदे या उद्धव गुट) चुनाव नहीं लड़ रही है, इसलिए झामुमो का दावा स्वाभाविक बनता है।
- दबाव की राजनीति : सुप्रियो भट्टाचार्य ने आयोग पर दबाव बनाते हुए कहा कि यदि उनकी मांग नहीं मानी जाती, तो यह समझा जाएगा कि चुनाव आयोग ‘भाजपा के निर्देशों’ पर काम कर रहा है। यह बयान दिखाता है कि झामुमो इस मुद्दे को एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की तैयारी में है, ताकि असम के आदिवासियों के बीच अपनी पहचान स्थापित कर सके।
असम में 25-30 सीटें: सौदेबाजी या ‘प्लान-बी’?
झामुमो के केंद्रीय महासचिव मनोज पांडेय के बयानों से पार्टी की आक्रामकता साफ झलकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के हालिया असम दौरों में उमड़े ‘जनसैलाब’ ने साबित कर दिया है कि वहां झामुमो का मजबूत जनाधार है।
यानी झामुमो की मंशा असम में ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाने की है।
- सीटों का गणित: पार्टी 25 से 30 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। मनोज पांडेय का कहना है कि कांग्रेस से सीट शेयरिंग पर बात अंतिम दौर में है।
- प्लान-बी (गठबंधन टूटने पर): झामुमो ने साफ कर दिया है कि यदि कांग्रेस से बात नहीं बनी, तो वह ‘समान विचारधारा वाली पार्टियों’ (जैसे जय भारत पार्टी) के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा बनाने से भी पीछे नहीं हटेगा। उनका मुख्य लक्ष्य ‘भाजपा को सत्ता से बाहर करना’ है, लेकिन इसके लिए वे कांग्रेस के आगे पूरी तरह झुकने को तैयार नहीं हैं।
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कांग्रेस की दुविधा: ‘हाथ’ मजबूत करें या ‘तीर-धनुष’ को जगह दें?
इधर, असम कांग्रेस की ओर से प्रदेश प्रवक्ता जगदीश साहू का बयान कांग्रेस की चिंता और दुविधा दोनों को दर्शाता है। उन्होंने झामुमो को ‘जमीनी हकीकत परखकर’ सीटों की मांग करने की सलाह दी है।
कांग्रेस के लिए झामुमो का यह कदम दोधारी तलवार जैसा है।
- कांग्रेस का दावा: जगदीश साहू का मानना है कि अलोकप्रिय हिमंता बिस्वा सरमा सरकार को हराने में कांग्रेस अकेले सक्षम है।
- हकीकत का डर: लेकिन, सच यह भी है कि यदि झामुमो अलग होकर मजबूती से लड़ता है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान कांग्रेस को ही होगा। झामुमो का सीधा फोकस राज्य के ‘ट्राइबल’ और ‘टी-ट्राइब’ (चाय बागान श्रमिकों) वोटों पर है, जो पारंपरिक रूप से कांग्रेस के वोटर रहे हैं।
- महाजोट पर खतरा: कांग्रेस पहले ही 65 उम्मीदवारों की घोषणा कर चुकी है, जिससे यह साफ है कि वह झामुमो को ज्यादा सीटें देने के मूड में नहीं है। ऐसे में, यदि झामुमो ‘प्लान-बी’ पर आगे बढ़ता है, तो असम में विपक्षी एकता (महाजोट) बिखर सकती है, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिलेगा।
हेमंत सोरेन का बड़ा दांव
असम के चाय बागानों में काम करने वाले लाखों श्रमिक मूल रूप से झारखंडी (संताल, मुंडा, उरांव आदि) हैं। झामुमो इसी भावनात्मक कड़ी और जनजातीय अस्मिता के सहारे असम की सत्ता में अपनी पैठ जमाना चाहता है।
हेमंत सोरेन जानते हैं कि असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा को सीधी चुनौती देने के लिए एक ‘मजबूत आदिवासी चेहरा’ चाहिए, जो वे खुद हैं। लेकिन, उनकी यह महत्वाकांक्षा झारखंड में उनके अपने सहयोगी दल कांग्रेस के साथ रिश्तों को दांव पर लगा सकती है। असम का यह रण, ‘इंडिया ब्लॉक’ की एकजुटता और हेमंत सोरेन के राष्ट्रीय कद, दोनों के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है।