Ranchi : झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के समापन के साथ ही राज्य की राजनीति में दो समानांतर तस्वीरें उभरकर सामने आई हैं – एक तरफ मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने विकास का व्यापक रोडमैप पेश किया, तो दूसरी ओर उनके बयान को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। सत्र के अंतिम दिन दिया गया भाषण अब विकास बनाम विवाद की बहस में बदलता नजर आ रहा है।
विकास एजेंडा : 2050 रोडमैप, इंजीनियरिंग कॉलेज और पर्यटन पर फोकस
मुख्यमंत्री ने सदन में “विकसित झारखंड” का विजन रखते हुए 2050 तक का रोडमैप तैयार करने की बात कही। उन्होंने राज्य के 23 जिलों में इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने की योजना का ऐलान किया, जिसे शिक्षा क्षेत्र में बड़ा विस्तार माना जा रहा है।
इसके अलावा, अपने दिवंगत पिता शिबू सोरेन की स्मृति में “दिशोम गुरु गुरुजी मेमोरियल” बनाने की घोषणा भी की गई।
पर्यटन क्षेत्र में सरकार ने पांच इको-टूरिज्म साइट विकसित करने और साहिबगंज के फॉसिल पार्क को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज के लिए तैयार करने की योजना सामने रखी।
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मनरेगा, प्रवासी मजदूर और केंद्र पर निशाना
मुख्यमंत्री ने मनरेगा में किए गए बदलावों पर केंद्र सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि यह योजना झारखंड के श्रमिकों की “जीवन रेखा” है और इसमें बदलाव से पलायन बढ़ सकता है।
साथ ही, प्रवासी श्रमिकों के लिए “झारखंड राज्य सुलभ सहायता योजना” लाने और सहायता केंद्र खोलने की घोषणा की गई।
भाषण में धार्मिक संदर्भ, यहीं से शुरू हुआ विवाद
सदन में अपने संबोधन के दौरान मुख्यमंत्री ने सरस्वती पूजा, लक्ष्मी पूजा और विश्वकर्मा पूजा जैसे आयोजनों का उदाहरण देते हुए देश की वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पूजा-पाठ के बावजूद भारत को शिक्षा, संपन्नता और तकनीकी क्षेत्र में आगे बढ़ने की जरूरत है।
यहीं से राजनीतिक विवाद की शुरुआत हुई और विपक्ष ने इसे आस्था से जोड़कर कड़ी प्रतिक्रिया दी।
भाजपा का पलटवार: “आस्था का अपमान”
भाजपा नेता अमर बाउरी ने मुख्यमंत्री के बयान को “शर्मनाक” बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह टिप्पणी हिंदू पर्व-त्योहारों और आस्था का अपमान है और समाज में गलत संदेश देती है।
बाउरी ने यह भी कहा कि सरकार दोहरे मापदंड अपना रही है—एक ओर इफ्तार के नाम पर सरकारी आयोजन होते हैं, वहीं दूसरी ओर हिंदू त्योहारों पर सवाल उठाए जाते हैं।
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“दूसरे धर्म पर टिप्पणी क्यों नहीं?”—राजनीतिक सवाल
भाजपा की ओर से यह भी सवाल उठाया गया कि क्या मुख्यमंत्री अन्य धर्मों के बारे में भी इसी तरह की टिप्पणी कर सकते हैं। विपक्ष का आरोप है कि हिंदू समाज की सहनशीलता को ध्यान में रखकर इस तरह के बयान दिए जाते हैं।
हालांकि, इस पूरे विवाद पर सरकार या मुख्यमंत्री की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।
सदन से सड़क तक बढ़ता असर
बजट सत्र के समापन के बाद जहां मुख्यमंत्री ने सत्र को “सकारात्मक” बताया और ईद, सरहुल व रामनवमी की शुभकामनाएं दीं, वहीं उनके बयान ने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह मामला आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है, खासकर तब जब विकास के एजेंडे के साथ धार्मिक और सामाजिक विमर्श भी जुड़ गया है।