Jan-Man Desk : पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय उस मोड़ पर खड़ी है जहा ‘खेला’ होने के बजाय ‘झमेला’ शुरू हो चुका है। लंबे समय से ममता बनर्जी केंद्र सरकार को उकसा रही थीं, मानो वह खुद चाहती थीं कि राज्य में राष्ट्रपति शासन (धारा 356) लग जाए। रणनीति साफ थी। वह नाखून कटवाकर ‘शहीद’ बन जाना। वह चाहती थीं कि चुनाव से पहले केंद्र उन्हें हटाए और वह जनता के बीच जाकर रोते हुए कहें, “तानाशाह मोदी ने बंगाल की अस्मिता और संविधान को कुचल दिया।” लेकिन दिल्ली ने इस बार दीदी की इस चाल को भांप लिया और पासा ही पलट दिया।
356 नहीं, 355 का ‘सर्जिकल स्ट्राइक’
केंद्र ने राष्ट्रपति शासन लगाकर ममता को सहानुभूति बटोरने का मौका नहीं दिया, बल्कि चुनाव आयोग के जरिए अनुच्छेद 355 लागू कर प्रशासनिक ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कर दी। चुनाव की तारीखों के एलान के साथ ही मुख्य सचिव, होम सेक्रेटरी और पुलिस महानिदेशक जैसे रसूखदार ओहदेदार बदल दिए गए। नए गवर्नर साहब, जो NSA अजीत डोभाल के साथ काम कर चुके हैं, और नई होम सेक्रेटरी मैडम की जोड़ी ने उन पुलिसिया अफसरों की ‘चुटिया टाइट’ कर दी है जो अब तक तृणमूल कांग्रेस के कैडर की तरह काम कर रहे थे।
वोट बैंक की ‘हथकड़ी’ और घुसपैठियों पर वार
ममता बनर्जी की असली घबराहट उनके हालिया भाषणों में साफ दिखी, जहाँ वह मुसलमानों को बीजेपी का डर दिखाकर अपनी ओर खींचने की आखिरी कोशिश कर रही हैं। चेहरे पर आया यह डर स्वाभाविक है क्योंकि चुनाव आयोग ने करीब एक करोड़ संदिग्ध घुसपैठियों को वोटर लिस्ट से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। यह दीदी के ठोस वोट बैंक पर सबसे बड़ी चोट है। ऊपर से ओवैसी की एआईएमआईएम ( AIMIM) और टीएमसी से अलग हुए हुमायूं कबीर का मुर्शिदाबाद बेल्ट में बढ़ता हुआ प्रभाव भी तृणमूल के बचे-खुचे अल्पसंख्यक वोटों में भी सेंध लगा रहा है।
बूटों की धमक और बूथ की सुरक्षा
इस बार का चुनाव 8 चरणों के बजाय महज 2 दिनों में सिमट रहा है, जिसने हिंसा की साजिश रचने वालों के हाथ-पांव बांध दिए हैं। सुरक्षा का जिम्मा पूरी तरह केंद्रीय बलों के पास है और राज्य पुलिस के अधिकार सीमित कर दिए गए हैं। अब संदेश साफ है, अगर टीएमसी के गुंडे हिंदू वोटर्स को रोकने की कोशिश करेंगे, तो उनका सामना राज्य पुलिस की ढाल से नहीं, बल्कि केंद्रीय सुरक्षाबलों की सीधी कार्रवाई से होगा। 250 कंपनियों की तैनाती ने चुनाव से पहले ही उपद्रवियों के हौसले पस्त कर दिए हैं।
बीजेपी के लिए ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ का क्षण
मैदान सज चुका है, प्रशासनिक बेड़ियां लग चुकी हैं और सुरक्षा अभेद्य है। लेकिन असली चुनौती अब भी भाजपा और आरएसएस के कार्यकर्ताओं के सामने है। उन्हें बूथ स्तर तक पसीना बहाना होगा। जनता के दिल में विश्वास जगाना होगा कि इस बार उन्हें चुनाव के बाद होने वाली हिंसा में अकेला नहीं छोड़ा जाएगा।
पिछले चुनाव का अनुभव कड़वा रहा था। चुनाव बाद हिंसा में कार्यकर्ता अकेले पड़ गए थे। इसको देखते हुए इस बार की रणनीति “आर-पार” की होनी चाहिए। साथ ही, यूजीसी की नई नीतियों को लेकर सवर्णों के बीच पनपे असंतोष को शांत करना भी बीजेपी के लिए अनिवार्य है। यदि इस अनुकूल माहौल और प्रशासनिक कवच के बावजूद बीजेपी इस बार चूकी, तो फिर बंगाल में वापसी की राह शायद कभी इतनी आसान नहीं होगी।
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