असम चुनाव से पहले बदला सियासी मिजाज : हेमंत सोरेन की सक्रियता से कांग्रेस में बेचैनी, भाजपा हमलावर

Anand Kumar
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Ranchi/Guwahati : असम विधानसभा चुनाव 2026 की तारीख भले ही 9 अप्रैल तय हो चुकी हो, लेकिन चुनावी सरगर्मी झारखंड तक महसूस की जा रही है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) की बढ़ती सक्रियता और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लगातार असम दौरों ने राजनीतिक समीकरणों को नया मोड़ दे दिया है।

इस बीच जेएमएम द्वारा चुनाव आयोग को 20 स्टार प्रचारकों की सूची सौंपे जाने से कांग्रेस खेमे में बेचैनी बढ़ गई है, जबकि भाजपा इसे गंभीरता से लेने के बजाय राजनीतिक नौटंकी करार दे रही है।


दो असम दौरों से दिया स्पष्ट संकेत

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन हाल के महीनों में दो बार असम का दौरा कर चुके हैं। दोनों दौरों में उनका फोकस असम के चाय बागान क्षेत्रों में रहने वाले टी ट्राइब समुदाय पर रहा।

हेमंत सोरेन

उन्होंने अपने संबोधनों में कहा कि झारखंड की तरह असम में बसे आदिवासी समुदायों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी जाएगी। खास तौर पर उन्होंने यह वादा दोहराया कि टी ट्राइब समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिलाने के लिए वे हर स्तर पर समर्थन देंगे।

राजनीतिक तौर पर इसे बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि टी ट्राइब समुदाय असम के कई विधानसभा क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाता है।


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जमीनी स्तर पर भी सक्रिय जेएमएम

हेमंत सोरेन के दौरों के साथ-साथ जेएमएम ने जमीनी स्तर पर भी अपनी तैयारी तेज कर दी है। झारखंड सरकार के मंत्री चमरा लिंडा के नेतृत्व में पार्टी की एक टीम पिछले कई महीनों से असम के चाय बागान क्षेत्रों में सक्रिय है।

सूत्रों के अनुसार यह टीम स्थानीय आदिवासी समुदाय के बीच संगठन विस्तार, जनसंपर्क और मुद्दों की पहचान पर काम कर रही है।

इसके साथ ही जेएमएम ने 20 स्टार प्रचारकों की सूची चुनाव आयोग को भेजकर यह संकेत दे दिया है कि पार्टी चुनाव को लेकर गंभीर है, भले ही उसने अब तक सीटों और गठबंधन को लेकर अपने पत्ते नहीं खोले हों।


कांग्रेस की बेचैनी क्यों?

असम में कांग्रेस पिछले एक दशक से सत्ता से बाहर है और फिलहाल मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में है। 2021 के चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले महागठबंधन को 50 सीटें मिली थीं, जिनमें कांग्रेस को 29 सीटें हासिल हुई थीं।

ऐसे में जेएमएम की एंट्री कांग्रेस के लिए नई चुनौती बनती दिख रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस की चिंता का मुख्य कारण आदिवासी वोट बैंक है। असम में कांग्रेस का एक बड़ा आधार आदिवासी और चाय बागान मजदूर समुदाय रहा है।

यदि जेएमएम अलग चुनाव लड़ती है, तो यही वोट बैंक विभाजित हो सकता है, जिसका सीधा नुकसान कांग्रेस को होगा।


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गठबंधन पर सस्पेंस बरकरार

झारखंड सरकार के मंत्री सुदिव्य कुमार ने गठबंधन के सवाल पर स्पष्ट जवाब देने से बचते हुए कहा है कि परिस्थितियों के अनुसार फैसला लिया जाएगा।

वहीं कांग्रेस नेता और झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने भी कहा कि हर पार्टी अपना वोट प्रतिशत बढ़ाने की कोशिश करती है और गठबंधन का निर्णय शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर लिया जाएगा।

इससे साफ है कि दोनों दलों के बीच अभी तक कोई ठोस समझौता नहीं हुआ है और सस्पेंस बरकरार है।


अगर जेएमएम अलग लड़ी तो किसे फायदा?

राजनीतिक जानकारों के अनुसार यदि जेएमएम कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ती है, तो इसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है।

कारण स्पष्ट है—

  • विपक्षी वोटों का बंटवारा
  • भाजपा के कोर वोट बैंक में स्थिरता

ऐसे में कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है, जिससे भाजपा को बढ़त मिल सकती है।


जय भारत पार्टी की एंट्री से समीकरण और जटिल

इसी बीच जय भारत पार्टी ने भी 40 सीटों पर गठबंधन कर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। इससे विपक्षी खेमे में सीटों का समीकरण और उलझता नजर आ रहा है।

अगर जेएमएम भी अलग राह चुनती है, तो असम में विपक्ष पूरी तरह बिखरा हुआ नजर आ सकता है।


भाजपा का हमला

नेता प्रतिपक्ष Babulal Marandi ने जेएमएम पर तंज कसते हुए कहा कि पार्टी बिहार में चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाई, अब असम में क्या कर लेगी।

उन्होंने दावा किया कि असम में भाजपा की स्थिति मजबूत है और विपक्ष की बिखरी रणनीति का फायदा पार्टी को मिलेगा।


बड़ा संकेत: आदिवासी राजनीति का विस्तार

हेमंत सोरेन की सक्रियता को सिर्फ एक चुनावी रणनीति के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे पूर्वी भारत में आदिवासी राजनीति के विस्तार की कोशिश के रूप में भी समझा जा रहा है।

झारखंड के बाहर असम जैसे राज्य में जेएमएम की सक्रियता इस बात का संकेत है कि पार्टी अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाने की दिशा में कदम उठा रही है।


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जेएमएम के अगले रुख का इंतजार

असम विधानसभा चुनाव 2026 अब केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई नहीं रह गया है। जेएमएम और अन्य क्षेत्रीय दलों की सक्रियता ने मुकाबले को और जटिल बना दिया है।

गठबंधन हुआ तो कांग्रेस को राहत मिल सकती है, लेकिन यदि विपक्ष बिखरा रहा तो भाजपा को सीधा फायदा होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

फिलहाल सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि चुनाव से पहले जेएमएम अपने पत्ते कब और कैसे खोलती है।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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