कोविड वैक्सीन के दुष्प्रभाव पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र को मुआवजा नीति बनाने का निर्देश

Anand Kumar
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New Delhi : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार को कोविड-19 वैक्सीन के गंभीर दुष्प्रभावों से प्रभावित व्यक्तियों के लिए ‘नो-फॉल्ट’ मुआवजा नीति तैयार करने का निर्देश दिया है। यह फैसला उन याचिकाओं पर आया है, जिनमें वैक्सीन के बाद हुई मौतों और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के लिए मुआवजे की मांग की गई थी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह नीति वैक्सीन के बाद होने वाली गंभीर प्रतिकूल घटनाओं (Adverse Events Following Immunization – AEFI) के लिए होगी, और इसमें पीड़ितों को दोष साबित करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इस आदेश से लाखों वैक्सीन प्राप्तकर्ताओं को राहत मिल सकती है, जो महामारी के दौरान वैक्सीनेशन के बाद स्वास्थ्य जटिलताओं से जूझ रहे हैं।

फैसले की पृष्ठभूमि: वैक्सीनेशन और दुष्प्रभावों की बहस

कोविड-19 महामारी के दौरान भारत में करोड़ों लोगों को वैक्सीन दी गई, जिसमें कोविशील्ड, कोवैक्सिन और अन्य वैक्सीन्स शामिल थीं। हालांकि, वैक्सीनेशन अभियान की सफलता के बावजूद, कुछ मामलों में गंभीर दुष्प्रभाव जैसे रक्त के थक्के बनना, हृदय संबंधी समस्याएं और न्यूरोलॉजिकल विकार रिपोर्ट हुए।

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इन दुष्प्रभावों ने वैक्सीन की सुरक्षा पर बहस छेड़ दी, और कई परिवारों ने अदालत का रुख किया। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि वैक्सीन के कारण मौतें हुईं, और सरकार की मौजूदा AEFI निगरानी प्रणाली अपर्याप्त है। सुप्रीम कोर्ट में यह मामला जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच के समक्ष सुनवाई के दौरान आया। याचिकाओं में मांग की गई थी कि वैक्सीन से प्रभावितों के लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित की जाए और मुआवजा प्रदान किया जाए।

अदालत ने माना कि मौजूदा AEFI तंत्र वैज्ञानिक मूल्यांकन के लिए पर्याप्त है, लेकिन गंभीर मामलों में मुआवजे के लिए एक अलग ‘नो-फॉल्ट’ नीति की जरूरत है। ‘नो-फॉल्ट’ का मतलब है कि पीड़ित को वैक्सीन निर्माता या सरकार पर दोष साबित करने की आवश्यकता नहीं होगी; बस दुष्प्रभाव साबित होने पर मुआवजा मिलेगा।

कोर्ट के मुख्य निर्देश और स्पष्टीकरण

बेंच ने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह इस नीति को तैयार करे। अदालत ने कहा, “केंद्र सरकार कोविड-19 वैक्सीनेशन के बाद गंभीर प्रतिकूल घटनाओं के लिए नो-फॉल्ट मुआवजा नीति तैयार करे। मौजूदा AEFI निगरानी तंत्र जारी रहेगा।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस नीति का निर्माण केंद्र सरकार या किसी अन्य प्राधिकरण द्वारा दायित्व या दोष की स्वीकृति के रूप में नहीं माना जाएगा। इसके अलावा, यह फैसला पीड़ितों को अन्य कानूनी उपायों (जैसे दीवानी मुकदमे) से नहीं रोकेगा।

कोर्ट ने एक स्वतंत्र अदालत-नियुक्त विशेषज्ञ समिति की मांग को अस्वीकार कर दिया, क्योंकि मौजूदा AEFI तंत्र को पर्याप्त माना गया। हालांकि, यह फैसला वैक्सीन सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में विश्वास बहाल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

दुष्प्रभावों के मामले और वैश्विक संदर्भ

भारत में कोविड वैक्सीनेशन के दौरान रिपोर्ट हुए दुष्प्रभावों में एस्ट्राजेनेका की कोविशील्ड वैक्सीन से जुड़े थ्रोम्बोसिस विद थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम (TTS) जैसे दुर्लभ मामले शामिल हैं।

विश्व स्तर पर, कई देशों ने वैक्सीन दुष्प्रभावों के लिए मुआवजा योजनाएं लागू की हैं, जैसे अमेरिका का नेशनल वैक्सीन इंजरी कंपेंसेशन प्रोग्राम। भारत का यह कदम वैश्विक मानकों के अनुरूप है, जहां ‘नो-फॉल्ट’ सिस्टम वैक्सीनेशन को प्रोत्साहित करता है बिना कानूनी जटिलताओं के।

याचिकाकर्ताओं में वे परिवार शामिल थे जिन्होंने वैक्सीन के बाद मौतों का दावा किया। कोर्ट ने इन मामलों की गंभीरता को स्वीकारते हुए कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों में ऐसे प्रावधान जरूरी हैं।

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प्रतिक्रियाएं: सरकार, विशेषज्ञ और जनता

केंद्र सरकार ने अभी तक आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, नीति तैयार करने की प्रक्रिया जल्द शुरू होगी।स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस फैसले का स्वागत किया है, कहते हुए कि यह वैक्सीन हिचकिचाहट को कम करेगा और पीड़ितों को न्याय दिलाएगा। डॉक्टरों के संगठनों ने कहा कि वैक्सीन सुरक्षित हैं, लेकिन दुर्लभ मामलों के लिए मुआवजा आवश्यक है।

जनता में यह समाचार सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जहां लोग वैक्सीन सुरक्षा पर चर्चा कर रहे हैं। विपक्षी दलों ने सरकार पर वैक्सीनेशन अभियान में पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाया है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य में एक नया अध्याय

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश भारत की स्वास्थ्य प्रणाली में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। यह न केवल कोविड वैक्सीन से प्रभावितों को राहत देगा, बल्कि भविष्य की महामारियों में वैक्सीनेशन को मजबूत बनाएगा। केंद्र को जल्द ही नीति का मसौदा तैयार करना होगा, जो मुआवजे की राशि, पात्रता और प्रक्रिया तय करेगी।

यह फैसला दर्शाता है कि न्यायपालिका सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दों पर कितनी सतर्क है, और यह लाखों भारतीयों के लिए न्याय की उम्मीद जगाता है।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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