Jan-Man Special : समय से बड़ा कोई खिलाड़ी नहीं होता और सत्ता का ताज कभी किसी के सिर पर स्थायी रूप से नहीं सजता। सियासत में जिसे हम सबसे बड़ा रणनीतिकार मान बैठते हैं, आखिरकार वह भी वक्त के बिछाए खेल का एक मोहरा मात्र ही साबित होता है।
बिहार की राजनीति आज ठीक ऐसे ही एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खुद ऐलान किया है कि वे राज्यसभा जा रहे हैं और इसे अपनी ‘स्वेच्छा’ बता रहे हैं। लेकिन, राजनीति के जानकारों को पता है कि सियासत के सिकंदरों की हर मर्जी, उनकी अपनी नहीं होती।
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मोदी-शाह की बिसात और नीतीश का ‘निर्वासन’
सच तो यह है कि नीतीश कुमार के इस ‘एग्जिट प्लान’ की पटकथा कहीं और नहीं, बल्कि दिल्ली में नरेंद्र मोदी और अमित शाह द्वारा लिखी गई है। यह वही नरेंद्र मोदी हैं, जिनके साथ कभी नीतीश कुमार ने मंच तक साझा करने से साफ इनकार कर दिया था। लेकिन आज के दौर में मोदी और शाह ही सियासत के असली सिकंदर हैं, जिनकी मर्जी के बिना सत्ता का एक पत्ता भी नहीं खड़कता।
यह कोई रहस्य नहीं है कि नीतीश कुमार कभी भी पाटलिपुत्र (बिहार की सत्ता) से बेदखल नहीं होना चाहते थे। लेकिन समय की निर्ममता देखिए कि आज उन्हें अपने इस ‘राजनीतिक निर्वासन’ को अपनी ही इच्छा बताना पड़ रहा है। नीतीश के इस कदम के साथ ही अब बिहार की सत्ता का असली स्टीयरिंग व्हील भारतीय जनता पार्टी (BJP) के हाथों में आ जाएगा। अब तक कम सीटें होने के बावजूद नीतीश सत्ता की ड्राइविंग सीट पर बैठे थे, लेकिन अब खेल बदल चुका है।
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सुशासन बाबू से लेकर ‘पलटू राम’ तक का सफर
नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा जितनी लंबी है, उतनी ही दिलचस्प भी। 1985 में एक निर्दलीय विधायक के रूप में विधानसभा की सीढ़ियां चढ़ने वाले नीतीश, धीरे-धीरे समाजवादी राजनीति के सबसे मजबूत स्तंभ बन गए। 1989 में वे लोकसभा पहुंचे और 1994 में जॉर्ज फर्नांडीस के साथ मिलकर ‘समता पार्टी’ की नींव रखी, जो उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री के तौर पर उनकी खूब सराहना हुई। लेकिन उनके राजनीतिक जीवन का स्वर्णिम अध्याय बिहार में ही लिखा गया। साल 2000 में सिर्फ 7 दिन के लिए मुख्यमंत्री बनने वाले नीतीश ने 2005 में जो सत्ता संभाली, तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। टूटी सड़कों और ध्वस्त कानून व्यवस्था वाले बिहार में उन्होंने ऐसा काम किया कि दुनिया उन्हें ‘सुशासन बाबू’ के नाम से पुकारने लगी।
हालांकि, सत्ता के शिखर पर बने रहने के लिए उन्होंने गठबंधनों को बदलने का जो सिलसिला शुरू किया, उसने उनकी छवि को भी बदला। 2013 में एनडीए छोड़ना, 2015 में धुर विरोधी राजद (RJD) के साथ जाना, 2017 में फिर भाजपा में वापसी और फिर महागठबंधन से होते हुए वापस एनडीए में आना—इन सियासी कलाबाजियों ने उन्हें ‘पलटू कुमार’ और ‘कुर्सी कुमार’ जैसे नाम भी दिए। लेकिन यह उनका ही तिलिस्म था कि 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने का रिकॉर्ड उनके नाम दर्ज है।
जेडीयू का भविष्य और बेटे निशांत की चुनौती
अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि नीतीश कुमार के बाद उनकी पार्टी (JDU) का क्या होगा? नीतीश की कार्यशैली ऐसी रही कि उन्होंने कभी अपने समानांतर किसी दूसरी कतार के नेता को पनपने ही नहीं दिया। अब अचानक उनके बेटे निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री की खबरें आ रही हैं।
आध्यात्मिक मिजाज और एकांत पसंद जीवन जीने वाले निशांत ने अपनी आधी उम्र बिना किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के गुजार दी है। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि वह बिहार के इस क्रूर सियासी कुरुक्षेत्र में कैसे टिक पाएंगे? क्या वे पिता की विरासत को संभाल पाएंगे या फिर नीतीश के जाते ही जेडीयू धीरे-धीरे भाजपा की एक ‘परछाईं’ मात्र बनकर रह जाएगी?
सियासत का एक कड़वा सच है कि हर दौर का अपना एक नायक होता है। कल लालू का दौर था, आज नीतीश का युग अपने ढलान पर है। पाटलिपुत्र की धरती पर अब एक नया अध्याय शुरू होने जा रहा है, जिसका अंजाम क्या होगा—यह सिर्फ आने वाला वक्त ही जानता है।