Anand Kumar
Ranchi : झारखंड के 48 शहरी निकायों के चुनाव परिणाम ने राज्य की सियासत को नया संकेत दिया है। शहरी क्षेत्रों को परंपरागत रूप से अपना मजबूत आधार मानने वाली भाजपा को इस बार अपेक्षित सफलता नहीं मिली। महापौर और अध्यक्ष के पदों पर पार्टी समर्थित करीब 16 उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की, लेकिन कई अहम नगर निगमों में परिणाम चौंकाने वाले रहे।
नगर निगम: रांची बची, गिरिडीह-देवघर फिसले
नौ नगर निगमों में भाजपा समर्थित प्रत्याशी रांची, आदित्यपुर और मेदिनीनगर में जीत दर्ज करने में सफल रहे। राजधानी में रांची नगर निगम की महापौर सीट पर पार्टी समर्थित रोशनी खलखो ने जीत हासिल की।
लेकिन गिरिडीह और देवघर जैसे अहम नगर निगमों में पहली बार झामुमो समर्थित उम्मीदवारों ने कब्जा जमाया। झारखंड मुक्ति मोर्चा के बढ़ते शहरी प्रभाव का यह संकेत माना जा रहा है। पिछले चुनाव में देवघर में निर्दलीय रीता राज मेयर बनी थीं, जबकि इस बार परिणाम अलग रहे।
धनबाद में भी भाजपा समर्थित प्रत्याशी पिछड़ गये। वहां भाजपा के बागी पूर्व विधायक संजीव सिंह ने बड़ी जीत दर्ज की। बोकारो के चास में पूर्व मेयर भोलू पासवान ने अपनी सीट बचा ली, लेकिन मानगो में कांग्रेस समर्थित सुधा गुप्ता की जीत ने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान खींचा।
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नगर परिषद और नगर पंचायत: स्वतंत्रों का उभार
नगर परिषद की 20 सीटों में भाजपा समर्थित तीन, कांग्रेस समर्थित दो, झामुमो समर्थित चार और 11 सीटों पर स्वतंत्र उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की।
नगर पंचायतों में भाजपा समर्थित छह, जेएमएम समर्थित चार और आठ स्वतंत्र उम्मीदवार विजयी रहे। धनवार में भाकपा माले समर्थित प्रत्याशी ने अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की।
इन परिणामों से स्पष्ट है कि शहरी निकायों में स्वतंत्र उम्मीदवारों की भूमिका निर्णायक होती जा रही है।
मानगो का गणित : वोट शिफ्ट का बड़ा संकेत
मानगो नगर निगम का परिणाम सबसे अधिक चर्चा में है। कांग्रेस समर्थित सुधा गुप्ता ने 18 हजार से अधिक मतों के अंतर से जीत दर्ज की। यह तब, जब जेबा खान और जेबा कादरी को मिलाकर 14 हजार से अधिक वोट मिले।
विश्लेषण यह संकेत देता है कि विधानसभा चुनाव में एनडीए को मिले वोटों का एक बड़ा हिस्सा इस बार निकाय चुनाव में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार की ओर शिफ्ट हुआ। ओबीसी और सवर्ण वोटों का आंशिक झुकाव भी परिणामों को प्रभावित करता दिखा।
राजनीतिक हलकों में यूजीसी से जुड़े मुद्दे और उससे उपजी नाराजगी को भी संभावित कारक माना जा रहा है। हालांकि आधिकारिक तौर पर किसी दल ने इसे स्वीकार नहीं किया है।
भाजपा की आंतरिक चुनौती और संगठनात्मक सवाल
परिणामों के बाद भाजपा ने समीक्षा का निर्णय लिया है। पार्टी का कहना है कि परिणाम उम्मीद के अनुरूप नहीं रहे और इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। देवघर समेत कुछ सीटों को लेकर राज्य निर्वाचन आयोग में शिकायत भी दर्ज कराई गई है।
संगठन स्तर पर भी प्रभारी नियुक्ति और रणनीतिक समन्वय को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कई स्थानों पर उम्मीदवार चयन और भीतरघात की चर्चा भी सामने आई है।
आदित्यपुर में उम्मीदवार चयन को लेकर आखिरी समय में बदलाव ने भी भ्रम की स्थिति पैदा की। पहले एक अन्य उम्मीदवार को समर्थन देने के बाद पार्टी ने संजय सरदार के पक्ष में फैसला किया। यदि बगावत की स्थिति बनती, तो परिणाम अलग हो सकते थे।
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जेएमएम की शहरी पैठ और आगे की सियासत
हेंंमंत सोरेन और कल्पना सोरेन की सक्रियता के बाद शहरी क्षेत्रों में झामुमो की पैठ बढ़ने का दावा किया जा रहा है। स्वतंत्र विजेताओं का रुख भी भविष्य की सत्ता-समीकरणों में महत्वपूर्ण होगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा ने शहरी नाराजगी और सामाजिक समीकरणों पर शीघ्र डैमेज कंट्रोल नहीं किया, तो आगामी चुनावों में असर दिख सकता है।
नगर निकाय चुनाव के नतीजों ने साफ संकेत दिया है कि झारखंड की शहरी राजनीति में बदलाव की बयार चल रही है। भाजपा के लिए यह चेतावनी है, जबकि झामुमो और कांग्रेस के लिए अवसर।