Anand Kumar
झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के समापन के साथ ही राजनीतिक गलियारों में राज्यसभा की दो रिक्त सीटों पर होने वाले चुनाव की सरगर्मियां तेज हो गई हैं। सत्र की शुरुआत 18 फरवरी 2026 से हुई थी, जो 19 मार्च तक चलेगी। इस बीच चुनाव आयोग ने 16 मार्च 2026 को 37 राज्यसभा सीटों पर मतदान की तारीख घोषित कर दी है। इनमें झारखंड की दो सीटें शामिल नहीं हैं। जहां दो सीटों के लिए चुनाव होना है।
इनमें एक सीट अगस्त 2025 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के दिग्गज नेता शिबू सोरेन के निधन के बाद से रिक्त है, जबकि दूसरी भाजपा के निवर्तमान सांसद दीपक प्रकाश के कार्यकाल समाप्त होने के कारण खाली हो रही है। झारखंड विधानसभा का बजट सत्र समाप्त होने के बाद इन दोनों सीटों पर चुनाव की अधिसूचना जारी हो जाएगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव महज औपचारिकता नहीं, बल्कि इंडिया गठबंधन के आंतरिक सामंजस्य, एनडीए की रणनीतिक चालों और राज्य की राजनीतिक स्थिरता की बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है, खासकर तब जब झारखंड में राज्यसभा चुनावों का इतिहास विवादों से भरा रहा है। हालिया नगर निकाय चुनावों में पाला बदल, बगावत और वोट खरीदने के आरोपों ने भी राजनीतिक नैतिकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
झारखंड के मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को समझने के लिए सबसे पहले संख्या बल की पड़ताल जरूरी है। झारखंड विधानसभा में कुल 81 सदस्य हैं, जिसमें विधानसभा अध्यक्ष का वोट भी शामिल होता है। राज्यसभा चुनाव में सिंगल ट्रांसफरेबल वोट (एसटीवी) प्रणाली अपनाई जाती है, जहां एक उम्मीदवार को निर्वाचित होने के लिए न्यूनतम कोटा (क्वोटा) की आवश्यकता होती है। यदि सभी 81 विधायक मतदान करते हैं, तो कोटा (81 / 3 + 1) के हिसाब से 28 प्रथम वरीयता मतों की जरूरत पड़ेगी। वर्तमान में इंडिया गठबंधन (झामुमो, कांग्रेस, राजद और अन्य) के पास 56 विधायक हैं, जो सैद्धांतिक रूप से प्रत्येक सीट के लिए 28-28 वोट देकर दोनों सीटों पर आसान जीत सुनिश्चित कर सकता है।
वहीं, एनडीए के पास भाजपा के 21 विधायकों सहित लगभग 25 सीटें हैं, जिसमें जदयू, एलजेपी और आजसू का समर्थन शामिल है। निर्दलीय विधायक जयराम महतो का रुख अनिश्चित है। लेकिन क्या यह गणित व्यावहारिक रूप से इतना सरल रहेगा? इतिहास बताता है कि राज्यसभा चुनावों में क्रॉस-वोटिंग और सेकेंड प्रेफरेंस वोट अक्सर निर्णायक साबित होते हैं। गठबंधन की आंतरिक डायनामिक्स इस चुनाव को और जटिल बनाती है।
कांग्रेस का ‘बैकलॉग दावा’ यहां प्रमुख है। 2024 के राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपनी पारंपरिक दावेदारी छोड़कर झामुमो के सरफराज अहमद को समर्थन दिया था, जो राजनीतिक मजबूरियों का नतीजा था। अब दो सीटों के अवसर पर कांग्रेस एक सीट की मांग कर रही है, जो गठबंधन धर्म के तहत जायज लगती है। यदि झामुमो दोनों सीटें अपने पास रखने का प्रयास करता है, तो यह कांग्रेस में असंतोष पैदा कर सकता है, जो राज्य सरकार की स्थिरता को प्रभावित करेगा।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, जो एक क्षेत्रीय नेता से राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य चेहरे के रूप में उभर रहे हैं, दीर्घकालिक रणनीति को ध्यान में रखकर ही फैसला लेंगे। उनके नेतृत्व में झामुमो ने आदिवासी मुद्दों पर मजबूत पकड़ बनाई है, लेकिन कांग्रेस के बिना गठबंधन की एकता पर सवाल उठ सकते हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि कांग्रेस को सीट नहीं मिली, तो समर्थन वापसी का विकल्प सीमित होगा, क्योंकि लोकसभा चुनावों के करीब आते हुए गठबंधन टूटना किसी के हित में नहीं होगा। एनडीए की ओर से रणनीतिक हस्तक्षेप की संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
संख्या बल में कमजोर होने के बावजूद, भाजपा तीसरे उम्मीदवार को मैदान में उतारकर सेकेंड प्रेफरेंस वोटों का खेल खेल सकती है। यदि कोई निर्दलीय या गठबंधन से असंतुष्ट विधायक का समर्थन मिला, तो एक सीट पर उलटफेर संभव है। हालांकि, 2014 के विवादित चुनाव का सबक याद रखें, जहां नकदी बरामदगी और परिणाम स्थगन ने ‘सूटकेस राजनीति’ को उजागर किया था, जिसके बाद सख्ती बढ़ी है। भाजपा के लिए यह चुनाव राज्य स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका है, खासकर तब जब केंद्र सरकार के साथ झारखंड के संबंधों में तनाव रहा है।
विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण में केंद्र को ‘बड़ा भाई’ कहना संघीय संरचना की भाषा लगता है, लेकिन क्या यह किसी नए समीकरण का संकेत है? आर्थिक निर्भरता वाले राज्यों के लिए केंद्र से सामंजस्य अनिवार्य है, लेकिन इसे सीधा गठजोड़ मानना जल्दबाजी होगी।
अंत में, वर्तमान समीकरण इंडिया गठबंधन के पक्ष में हैं, जो दोनों सीटें जीत सकता है। लेकिन सीट बंटवारे का मुद्दा निर्णायक है। यदि कांग्रेस को एक सीट मिली, तो चुनाव निर्विवाद रह सकता है; अन्यथा, आंतरिक कलह या क्रॉस-वोटिंग से परिस्थितियां बदल सकती हैं।
राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता, और अंतिम क्षण तक चालें बाकी हैं। यह चुनाव न केवल राज्यसभा की सीटों के बारे में है, बल्कि झारखंड की राजनीतिक दिशा तय करने वाला भी साबित हो सकता है, जहां आदिवासी पहचान, विकास और गठबंधन की विश्वसनीयता दांव पर लगी है।
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