गुरुजी को पद्मभूषण का स्वागत, भारत रत्न की मांग बरकरार : हेमंत सोरेन के ‘सॉफ्ट टोन’ के क्या हैं मायने

Anand Kumar
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Analysis : बंगाल चुनाव के पहले झारखंड की राजनीति में बदलाव के मिलने लगे संकेत!

ANAND KUMAR
दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्मभूषण सम्मान दिए जाने पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा की प्रतिक्रिया ने झारखंड की राजनीति में एक नए संकेत को जन्म दे दिया है।

हेमंत सोरेन ने एक ओर जहां केंद्र सरकार के फैसले के लिए आभार जताया, वहीं यह भी स्पष्ट कहा कि गुरुजी भारत रत्न थे, हैं और सदैव रहेंगे। झामुमो ने भी पद्मभूषण का स्वागत करते हुए भारत रत्न की मांग को बरकरार रखने की बात कही। यह प्रतिक्रिया न तो विरोध की भाषा में है, न ही पूरी संतुष्टि की, बल्कि एक सधी हुई, संतुलित और राजनीतिक रूप से परिपक्व टोन में है।


शिबू सोरेन को पद्मभूषण : हेमंत सोरेन बोले – गुरुजी भारत रत्न थे, हैं और रहेंगे

बदली हुई प्रतिक्रिया, बदला हुआ संदर्भ

राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि यदि यही फैसला कुछ महीने पहले आया होता, तो प्रतिक्रिया का स्वर शायद अलग होता। तब विरोध अधिक तीखा हो सकता था, केंद्र सरकार पर सीधे सवाल उठते और सम्मान को अपर्याप्त बताया जाता। लेकिन आज का टोन अलग है> मांग कायम है, लेकिन जो मिला है, उसे स्वीकार भी किया गया है।

राजनीति में यह ‘सॉफ्ट टोन’ अक्सर आने वाले बदलावों का संकेत माना जाता है। विशेषकर तब, जब राष्ट्रीय राजनीति में बड़े घटनाक्रम, गठबंधन समीकरण और आगामी चुनाव सामने हों। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले झारखंड में राजनीतिक हलचल तेज होना इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।


पद्मभूषण की श्रेणी और तुलना का सवाल

मांग भारत रत्न की थी, लेकिन गुरुजी को पद्मभूषण दिया गया। यही सम्मान वर्ष 2019 में झारखंड के खूंटी से आठ बार भीजेपी के सांसद और लोकसभा के उपाध्यक्ष रहे कड़िया मुंडा को भी मिल चुका है। यहीं से असंतोष और तुलना की बहस शुरू होती है।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो कड़िया मुंडा और शिबू सोरेन को एक ही श्रेणी में रखना कई सवाल खड़े करता है। कड़िया मुंडा स्वयं संसद तक सीमित रहे, जबकि शिबू सोरेन ने न केवल खुद आठ बार सांसद के रूप में चुनाव जीते, बल्कि विधायक भी रहे और दर्जनों नेताओं को सांसद , विधायक और मंत्री बनाया। वे तीन बार मुख्यमंत्री रहे, केंद्र में मंत्री रहे और सबसे अहम – झारखंड राज्य निर्माण के केंद्रीय नायक रहे।


पद्मविभूषण बनाम पद्मभूषण: राष्ट्रीय नेताओं की तुलना

विडंबना यह है कि शरद पवार को 2017 में और मुलायम सिंह यादव को 2023 में मरणोपरांत पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया, जबकि गुरुजी को पद्मभूषण तक सीमित रखा गया। यह फर्क इस सवाल को जन्म देता है कि क्या झारखंड निर्माण और आदिवासी राजनीति के संघर्ष को राष्ट्रीय सम्मान प्रणाली में अपेक्षित महत्व नहीं मिला।

इसी तरह कर्पूरी ठाकुर और चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न से सम्मानित किया गया। इन सम्मानों पर कोई विवाद नहीं, लेकिन यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उनका योगदान झारखंड निर्माण और आदिवासी अस्मिता के संघर्ष से बड़ा या अधिक व्यापक था।


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गुरुजी का योगदान: जो संघ और भाजपा भी नहीं कर पाए

शिबू सोरेन का योगदान केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहा। आदिवासी समाज को संगठित करना, उन्हें अधिकार और पहचान दिलाना, और झारखंड के जंगल-पहाड़ में सामाजिक चेतना जगाना- यह वह काम था, जो दशकों तक किसी संगठन या सरकार के बूते नहीं हो पाया।

धर्मांतरण के विस्तार को रोकने और आदिवासी समाज को उसकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में गुरुजी की भूमिका ऐसी रही, जिसे न संघ की शाखाएं और न ही भाजपा की राजनीतिक मशीनरी दोहरा पाई। यही कारण है कि झारखंड के जनमानस में गुरुजी की छवि एक नेता से अधिक एक संरक्षक की रही।


सधा हुआ बयान, बड़ा संकेत

इन तमाम असंतुलनों के बावजूद यदि हेमंत सोरेन की प्रतिक्रिया संतुलित है, विरोध की जगह संयम है और टकराव की जगह संवाद है, तो यह महज़ संयोग नहीं माना जा सकता। राजनीति में अक्सर ऐसा देखा गया है कि सम्मान आज और उससे बड़ा सम्मान कल, यह रास्ता सहयोग और समीकरणों से होकर गुजरता है।

इसका कारण यह है कि  केरल में, जहां भाजपा अपनी जड़ें मजबूत करने की कोशिश में है, वहां के सबसे सम्मानित वामपंथी नेता को पद्मविभूषण दिया गया है, जो वहां की जनता की भावनाओं से जुड़ने का एक तरीका हो सकता है, क्योंकि वहां चुनाव नजदीक है। दूसरी तरफ, दिशोम गुरु शिबू सोरेन को पद्मभूषण देकर वहां भाजपा विरोध की राजनीति को टोन डाउन करने की कोशिश लगती है और ये संकेत भी कि अगर जेएमएम और हेमंत सोरेन भाजपा के नजदीक आते हैं, तो भविष्य में और बड़ा सम्मान मिल सकता है।

यानी हेमंत सोरेन अगर राष्ट्रीय स्तर पर साइड बदलते हैं या रणनीतिक समर्थन की भूमिका में आते हैं, तो भारत रत्न सहित आगे और बड़े सम्मान की राह खुल सकती है। यही कारण है कि हेमंत सोरेन और जेएमएम की मौजूदा प्रतिक्रिया को आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है।


झारखंड की राजनीति फिर करवट बदलेगी!

गुरुजी को पद्मभूषण मिलना सम्मान है, लेकिन झारखंड के संदर्भ में यह अधूरा सम्मान माना जा रहा है। इसके बावजूद हेमंत सोरेन और झामुमो का संतुलित रुख यह बताता है कि राज्य की राजनीति एक बार फिर करवट लेने को तैयार है।

बंगाल चुनाव से पहले झारखंड में जो राजनीतिक हलचल दिख रही है, वह आने वाले महीनों में राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डाल सकती है। गुरुजी के सम्मान का यह अध्याय शायद अभी समाप्त नहीं हुआ है।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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