गुजरे हुए दिसंबर का सुख-दुख

Anand Kumar
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-श्याम किशोर चौबे
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु तीन दिवसीय झारखंड प्रवास पर गुजरे 28 दिसंबर को रांची पधारीं। अगले दो दिनों तक उन्होंने जमशेदपुर, आदित्यपुर और गुमला के रायडीह में कई कार्यक्रमों में शिरकत की। झारखंड के लिए यह हर्ष की बात थी कि राष्ट्रपति ने यहां तीन दिन बिताये। हालांकि उनके इस प्रवास और विभिन्न कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी को चंद लोगों ने राजनीतिक नजरिये से भी देखा लेकिन सरासर ऐसा ही नहीं माना जा सकता। वे छह साल से अधिक समय 18 मई 2015 से 12 जुलाई 2021 तक झारखंड की राज्यपाल रही थीं। उसी दौरान 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा दो आदिवासी सीटें और विधानसभा चुनाव में 26 आदिवासी सीटें हार गई थी। उनके राष्ट्रपति रहते 2024 में भाजपा राज्य की सभी पांच आदिवासी लोकसभा सीटें और विधानसभा चुनाव में 28 में से 27 आदिवासी सीटें हार गई थी। जब वे राज्यपाल थीं, तब भी, और अब राष्ट्रपति हैं, तब भी उनको भाजपा से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। यह अलग बात है कि उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी भाजपा से प्रारंभ की थी और इसी दल में रहीं।

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इस बार वे जब रांची पधारीं तो बिरसा मुंडा एयरपोर्ट से राजभवन, हाल ही जिसका नाम बदलकर केंद्र की भाजपानीत सरकार ने लोकभवन कर दिया है, तक जाने के रास्ते में झुग्गी-झोपड़ियों को राष्ट्रपति के स्वागत होर्डिंग लगाकर ढंक दिया गया था। इस घटना से बरबस 24-25 फरवरी 2020 दिमाग में घूमने लगी, जब अमेरिका का पहली मर्तबा राष्ट्रपति बने डोनाल्ड ट्रंप अहमदाबाद आए थे। तब उनके और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोड शो के दौरान सरदार वल्लभभाई पटेल एयरपोर्ट से मोतेरा स्टेडियम तक के रास्ते में पड़नेवाली मलिन बस्तियों को इसी प्रकार ढंक दिया गया था। नमस्ते ट्रंप नाम से वह कार्यक्रम जाना गया था। ट्रंप अहमदाबाद आए, चले गये, फिर नहीं आए, लेकिन अपनी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु तो छह साल से अधिक समय तक इसी रांची शहर में राज्यपाल रही हुई हैं। इस दौरान वे राजभवन से एयरपोर्ट तक या विधानसभा तक या विभिन्न कार्यक्रमों में अनेकानेक बार गुजरती रही थीं। उन दिनों देखी गई मलिन बस्तियों को इस बार न पाकर उन्होंने न जाने क्या सोचा होगा!

राष्ट्रपति आएं, प्रधानमंत्री आएं, अच्छा ही लगता है। लेकिन सवाल यह है कि जब भी वे पधारते हैं, तो उनके गुजरनेवाले रास्ते से आने-जानेवाले शहरियों को बला की परेशानी होती है। घंटों रोड ब्लॉक कर दिया जाता है। जिन्हें हम चुनकर अपना मार्गदर्शक बना लेते हैं, उनके आने पर हमारे रास्ते क्यां बंद कर दिये जाते हैं, हम नहीं सोच पाते। हमारे रास्ते बंद किये जाते हैं, तो दुख-तकलीफ होती है न! सुनते हैं, दुनिया के अच्छे देशों में ऐसा नहीं होता। हमारी वैसी ही व्यवस्था कब होगी!

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दो क्विंटल गांजा चूहे गटक गए!

2025 ने जाते-जाते देश को दो फैसले ऐसे दिये, जिनसे उम्मीद बंध गई। अरावली पर्वतमाला के सौ मीटर ऊंचे हिस्सों को छोड़कर बाकी में जो खनन की गुंजाइश देखी जा रही थी, उस पर 29 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने फौरी तौर पर विराम लगा दिया। इसी दिन शीर्षस्थ अदालत ने यूपी के उन्नाव की एक नाबालिग से 1 जून 2017 को दुष्कर्म के दोषी बांगरमऊ के तत्कालीन विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को दिल्ली के ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई उम्रकैद को दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को स्थगित कर दिया, जिसमें उसकी सजा को निलंबित करते हुए सशर्त जमानत दे दी गई थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने यह फैसला 23 दिसंबर को सुनाया था। देश भर में बहुचर्चित इस केस पर 29 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिये गये अपने फैसले में यह भी स्पष्ट कर दिया कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि भी लोकसेवक ही हैं।
दूसरी ओर झारखंड को देखिए तो 19 दिसंबर को एक अजीबोगरीब मामले में दो क्विंटल अवैध गांजा के साथ रांची के निकट ओरमांझी, एनएच-20 पर पकड़ाए वैशाली-बिहार के इंद्रजीत राय को ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया। कारण? अपनी पुलिस व्यवस्था। जिस ओरमांझी पुलिस ने 17 जनवरी 2022 को सफेद बोलेरो पर तकरीबन एक करोड़ का दो क्विंटल अवैध गांजा ले जा रहे इंद्रजीत को पकड़कर वाहवाही लूटी थी, उसी पुलिस को अदालत में साक्ष्य पेश करना हुआ तो कह दिया, मालखाने में रखा गांजा चूहे गटक गए। साक्ष्य के तौर पर वह न तो जब्त गांजा पेश कर सकी, न ही उसके गवाह समय, स्थान और घटनाक्रम को लेकर एकरूप बयान दे सके। अदालत में यह भी स्पष्ट नहीं किया जा सका कि आरोपी को किसने पकड़ा, बोलेरो कहां रोकी गई और तलाशी कितनी देर चली।
यह तो वही मिसाल हो गई, जैसे 2016 में बिहार में लागू शराबबंदी के बाद 2017-18 में ऐसी खबरें आई थीं कि वहां जब्त कर पुलिस थानों में रखी तकरीबन नौ लाख लीटर अवैध शराब चूहे पी गए। बिहार के चूहे शराबी और झारखंड के चूहे चीलमबाज! है न आश्चर्य मिश्रित दुख की बात! धन्य है हमारी पुलिस!

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सबसे चर्चित नेता कौन!

साल भर में झारखंड में सबसे चर्चित नेता कौन रहा! जाहिर है, अपने स्वास्थ्य मंत्री डॉ इरफान अंसारी। उनकी सबसे अधिक चर्चा कौन करता है! 19-20 साल पहले मधु कोड़ा कैबिनेट में स्वास्थ्य मंत्री रहे चुके भानु प्रताप शाही। हालांकि अब पाला बदलकर कोड़ा और शाही दोनों भाजपा में चले गये हैं और फिलहाल बोलना ही उनका काम है। भानु और इरफान में बहुत कुछ समानता है। दोनों बोलक्कड़ हैं। पहली बार विधायक चुने जाने के बाद भानु को जब मंत्री बनाया जाना था, तब वे हरिजन उत्पीड़न प्रकरण में जेलबंद थे, तो जेल से बाहर आने तक उनकी कुर्सी उनके पिता ने संभाले रखी। इरफान 2019 में पहली बार विधायक बने, तो कोलकाता के निकट कैश कांड में जेल चले गए। फिर मंत्री भी बने। वे अपने पिता को राज्यसभा भेजने को उतावले हैं, लेकिन सफल नहीं हो पा रहे। दोबारा चुनाव जीतकर इरफान इस बार भी मंत्री बने। इसी महीने शीत सत्र की पूर्व संध्या पर 4 दिसंबर को पार्टी विधायक दल की बैठक में ममता देवी ने आरोप लगाया कि फलां काम के लिए अमुक रकम उनके आदमी को दी, काम भी न हुआ। बात मीडिया में आई और सदन में भी उठी, लेकिन अल्ला मेहरबान तो क्या कर लेगा कोई!

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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