Jagdeep Dhankhar के बाद उपराष्ट्रपति पद की नयी पटकथा: हरिवंश नाम क्यों सबसे मुफीद दिखता है

Anand Kumar
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Jagdeep Dhankhar के अचानक इस्तीफे के बाद भारत के अगले उपराष्ट्रपति को लेकर अटकलें तेज़ हो गई हैं

Jagdeep Dhankhar

Jagdeep Dhankhar Resignation : 19 जुलाई की शाम, देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के कार्यालय द्वारा जारी की गई एक सूचना में बताया गया था कि वे अगले दिन राजस्थान के दौरे पर जा रहे हैं। यह एक नियमित कार्यक्रम प्रतीत हो रहा था, लेकिन महज कुछ घंटों बाद अचानक इस्तीफे की घोषणा ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी।

धनखड़ का इस्तीफा “स्वास्थ्य कारणों” से हुआ बताया गया, लेकिन समय और संदर्भ ने इस घटनाक्रम को शुद्ध रूप से प्रशासनिक न मानकर राजनीतिक व्याख्या की ओर मोड़ दिया। संसद का मानसून सत्र जारी है और सरकार को अचानक नया उपराष्ट्रपति नियुक्त करने की जरूरत आन पड़ी है। इस असमय खाली हुए संवैधानिक पद पर अब कई नामों की चर्चा हो रही है, जिसमें एक नाम है – हरिवंश नारायण सिंह

वैधानिक चुनाव प्रक्रिया

धनखड़ के इस्तीफ़े के बाद निर्वाचन आयोग चुनाव की प्रक्रिया शुरू करेगा। संविधान के अनुसार इस रिक्ति को “जितनी जल्दी हो सके” भरना होता है। उपराष्ट्रपति का चुनाव पूरे संसद (लोकसभा एवं राज्यसभा) के सदस्यों वाले इलेक्टोरल कॉलेज द्वारा गुप्त मतदान से होता है। अनुमान है कि अगले दो-तीन माह में चुनाव की तारीख घोषित हो जाएगी। तब तक राज्यसभा की अध्यक्षा की जिम्मेदारी उनके उपसभापति हरिवंश संभालेंगे।


Jagdeep Dhankhar

हरिवंश: पत्रकारिता से राजनीति तक की निष्कलंक यात्रा

हरिवंश नारायण सिंह का जीवनवृत्त एक असाधारण कहानी है – साधारण पृष्ठभूमि से उठकर पत्रकारिता की बुलंदियों तक पहुंचने की और फिर राजनीति में प्रतिष्ठा अर्जित करने की। वे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के निजी सचिव रहे, ‘प्रभात खबर’ जैसे अखबार को नक्सलवाद के विरुद्ध खड़ा करने वाले संपादक रहे और फिर जदयू कोटे से राज्यसभा सदस्य बने।

वर्तमान में वे राज्यसभा के उपसभापति हैं और इस पद पर उनका यह दूसरा कार्यकाल है। यही नहीं, उपराष्ट्रपति की अनुपस्थिति में वे राज्यसभा की कार्यवाही को लंबे समय से संचालित करते आ रहे हैं, और उस भूमिका में उन्होंने निर्बाध, निष्पक्ष और गरिमामयी संचालन की मिसाल पेश की है।


नीतीश कुमार की संभाव्यता बनाम यथार्थता

हालांकि कुछ चर्चाओं में यह भी उभर रहा है कि खुद नीतीश कुमार उपराष्ट्रपति पद के दावेदार हो सकते हैं, लेकिन यह संभावना बेहद क्षीण दिखती है। बिहार में चुनाव नजदीक हैं, महागठबंधन की संरचना और नीतीश की स्वास्थ्य संबंधी चर्चाओं के मद्देनज़र वे न तो इस समय खुद जाना चाहेंगे और न ही विपक्ष उन्हें आसानी से स्वीकार करेगा।

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ऐसे में नीतीश की पार्टी जदयू के सबसे अनुभवी, सम्मानित और निर्विवाद चेहरे हरिवंश का नाम अपने आप उभर आता है। और नये उपराष्ट्रपति के चुनाव तक मानसून सत्र में हरिवंश ही सभापति की जिम्मेवारी संभालेंगे। 

हालांकि हरिवंश के अलावा सोशल मीडिया में  नये उपराष्ट्रपति के रूप में कई नाम चर्चित हैं। प्रमुख रूप से जिनका ज़िक्र हो रहा है, उनमें शामिल हैं: 

  • राजनाथ सिंह: केन्द्रीय रक्षा मंत्री का नाम भी सुनने में आ रहा है। वे सरकार के वरिष्ठ सदस्य हैं और अक्सर ‘मजबूत, विवादरहित’ विकल्प माने जाते हैं।
  • मनोज सिन्हा: जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री का भी ज़िक्र हो रहा है। कुछ का मानना है कि यूपी-उत्तराखंड क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए मनोज सिन्हा को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सकती है।
  • अरिफ मोहम्मद खान: बिहार के राज्यपाल और पूर्व सांसद का नाम भी चर्चा में है। वे बीजेपी के करीबी माने जाते हैं और राजनीति में उम्रदराज़ नेता के तौर पर देखा जा रहा है।

इन नामों की चर्चा के पीछे हर समूह के अपने तर्क हैं, लेकिन इनमें से कोई भी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।  

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राज्यसभा संचालन में दक्षता और स्वीकार्यता

हरिवंश की सबसे बड़ी योग्यता उनकी स्वीकार्यता है – न केवल एनडीए के भीतर बल्कि विपक्ष में भी उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। संसद संचालन में उनकी शैली न तो आक्रामक है, न पक्षपातपूर्ण। उन्होंने तकनीकी विषयों की समझ, अनुशासनप्रियता और गरिमामयी व्यवहार से यह साबित किया है कि वे उपराष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद की गरिमा को पूरी तरह निभा सकते हैं।


जातीय समीकरण और क्षेत्रीय संतुलन

हरिवंश मूलतः बिहार के सिताबदियारा से आते हैं जो जेपी का गांव है। राजपूत समुदाय से हैं। यह समुदाय राजनीतिक रूप से प्रभावी है और बीजेपी-जेडीयू दोनों के सामाजिक आधार में इसकी महत्ता है। यदि उन्हें उपराष्ट्रपति बनाया जाता है तो यह पूर्वी भारत विशेषकर बिहार और झारखंड में एक मजबूत राजनीतिक संकेत होगा।


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एनडीए बनाम विपक्ष: रणनीति और संभावनाएं

एनडीए को किसी ऐसे उम्मीदवार की तलाश है जो राष्ट्रपति की तरह निर्विरोध चुनाव या विपक्ष की तीव्र आपत्ति के बिना निर्वाचित हो सके। हरिवंश इस जरूरत को पूरी तरह पूरा करते हैं।

जहां विपक्ष की ओर से अभी तक कोई ठोस नाम सामने नहीं आया है, वहीं एनडीए के पास हरिवंश जैसा चेहरा है जो पत्रकारिता की निष्पक्षता, प्रशासनिक अनुभव और संवैधानिक मर्यादाओं का सम्मिलन है।


क्या हरिवंश बनेंगे अगला उपराष्ट्रपति?

वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में हरिवंश नारायण सिंह की उम्मीदवारी एक सुविचारित और सधे हुए विकल्प के रूप में उभरती है।

उनका अनुभव, संतुलित छवि, पक्षपात से परे व्यवहार और राज्यसभा संचालन का दीर्घ अनुभव उन्हें इस पद के लिए सबसे उपयुक्त उम्मीदवार बनाता है।

यदि एनडीए सचमुच सर्वसम्मत, गरिमामयी और अनुभवी उपराष्ट्रपति की तलाश में है – तो हरिवंश एक स्वाभाविक और रणनीतिक विकल्प बन सकते हैं।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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