भारतीय राजनीति : योग्यता बनाम चाटुकारिता

Anand Kumar
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डॉ राकेश कुमार पाण्डेय

भारतीय लोकतंत्र का आधार स्तंभ समानता, न्याय और योग्यता की अवधारणा पर टिका हुआ है। परंतु, वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो यह कड़वी सच्चाई सामने आती है कि हमारे राजनीतिक दल घोर जातिवाद, परिवारवाद और चाटुकारिता के मकड़जाल में जकड़े हुए हैं। अब जहां प्रतिभा और योग्यता को दरकिनार कर चापलूसी को प्राथमिक योग्यता मान लिया जाए, तो वहां अपेक्षा के अनुरूप परिणाम आना असंभव ही है। जब योग्य व्यक्ति को अवसर न देकर जी-हुज़ूरी करने वाले करीबियों को पद और दायित्व बांटे जाते हैं, तो न केवल संस्थाएं खोखली होती हैं, बल्कि पूरे देश का विकास अवरुद्ध हो जाता है। इसके साथ ही, इस संकीर्ण राजनीति का सबसे घिनौना पक्ष यह भी है कि किसी योग्य व्यक्ति या विभूति का प्रतिभा को हनन करके अपने राजनीतिक स्वार्थ साधे जाते हैं।

राजनीतिक दलों में जब आंतरिक लोकतंत्र समाप्त हो जाता है, तब वहां केवल चाटुकारिता का बोलबाला होता है। गुण और क्षमता का स्थान निष्ठा नहीं, बल्कि अंध-भक्ति ले लेती है। जब योग्य व्यक्तियों को किनारे कर दिया जाता है, तो शासन और प्रशासन में नीतियों का क्रियान्वयन घटिया स्तर का होता है। हमारे प्राचीन शास्त्रों में योग्यता के महत्त्व को स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हुए कहा गया है :-
“न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः, वृद्ध न ते ये न वदन्ति धर्मम्।
नासौ धर्मो यत्र न सत्यमस्ति, न तत्सत्यं यच्छलेनाभ्युपेतम्॥”
(महाभारत, उद्योग पर्व – सभा पर्व प्रसंग, पृष्ठ संख्या: ४८९)

स्पष्ट है, वह सभा (या राजनीतिक दल/संसद) वास्तव में सभा नहीं है जहां ज्ञानी या योग्य लोग न हों। और वे ज्ञानी नहीं जो सत्य और धर्म (न्याय) का साथ न दें।

जब राजनीतिक दल योग्यता के स्थान पर छल और चापलूसी के बल पर पद बांटते हैं, तो वह व्यवस्था जनता के कल्याण में पूरी तरह विफल हो जाती है।

दिनकर ने रश्मिरथी में योग्यता को दबाने पर और जातिवाद के जहर पर प्रहार करते हुए लिखा है :
“गुण बड़े एक से एक प्रखर,
हंसते हैं गगन में छिपकर।
पर, मनुष्य जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है॥”

(रश्मिरथी – तृतीय सर्ग, पृष्ठ संख्या: ४२)

दिनकर जी ने यह भी बताया कि कैसे कर्ण जैसे महान योद्धा को केवल उसकी जाति और वंश के नाम पर बार-बार अपमानित किया गया और अयोग्य दुर्योधन की सभा में चाटुकारों का बोलबाला रहा। राजनीति में आज भी यही दुष्चक्र चल रहा है।

भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यहां नीतियां जनकल्याण के आधार पर नहीं, बल्कि ‘वोट बैंक’ और ‘जातीय समीकरण’ के आधार पर बनती हैं। किसी पद या दायित्व का वितरण व्यक्ति की काबिलियत देखकर नहीं, बल्कि उसकी जाति और उसके द्वारा लाए जाने वाले वोटों की संख्या को देखकर होता है। ‘नीतिशतकम्’ में भर्तृहरी ने ऐसे विवेकहीन नेतृत्व और व्यवस्था पर कटु प्रहार करते हुए लिखा है :

“सा रम्या नगरी महान्स नृपतिः सामन्तचक्रं च तत्,
पार्श्वे तस्य च सा विदग्धपरिषद राजन्ति यस्याः श्रियः।
सर्वं ह्येकपदे प्रनष्टमभवद् भूर्त्वा न दृश्येत तत्,
अहो ज्ञानमहो महत्त्वमहो मान्यो विधिः सर्वथा॥”

(नीतिशतकम् , श्लोक: ८८, पृष्ठ संख्या: ६५)

उन्होंने लिखा है कि जब राजा या दल-पति अपनी आँखें मूंदकर केवल चाटुकारों और स्वजातीय लोगों को उच्च पदों पर बिठाता है, तो राज्य का विनाश निश्चित हो जाता है। चापलूसी पर टिके लोग पद प्राप्त कर केवल अपना उल्लू सीधा करते हैं, उन्हें जनता की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं होता।

आधुनिक हिंदी साहित्य में विरोध के प्रखर स्वर कवि ‘धूमिल’ ने अपनी कविता में राजनीतिक यथार्थ को उघाड़ते हुए लिखा है:
“अपने यहां संसद वह घानी है,
जिसमें आधा तेल और आधा पानी है।
जहां काबिलियत का कोई मोल नहीं,
बस चापलूसी ही सबसे बड़ी ज़ुबानी है॥”
(संसद से सड़क तक – पृष्ठ संख्या: ३८)

हम सब को यह भलीभांति ज्ञान होना चाहिए कि जब निर्णय लेने वाले पदों पर अक्षम लोग बैठेंगे, तो नीतिगत फैसले भी अदूरदर्शी और प्रभावहीन होंगे। देश आज कई क्षेत्रों में अपनी वास्तविक क्षमता के अनुरूप परिणाम इसलिए नहीं दे पा रहा है, क्योंकि प्रतिभाएं हाशिए पर हैं और चाटुकार सत्ता के केंद्र में बैठे हैं।

राजनीतिक दलों की इस संकीर्ण सोच का सबसे दुखद पहलू है ‘प्रतिभाओं का उचित स्थान न देना। जब किसी योग्य, चरित्रवान और सत्यवादी व्यक्ति से तर्क या योग्यता में मुकाबला नहीं किया जा पाता, तो चाटुकार और जातिवादी गिरोह उस व्यक्ति के चरित्र, उसकी छवि और उसकी प्रतिष्ठा को धूमिल करने का नीच प्रयास करते हैं।
किसी निष्ठावान व्यक्ति की छवि को जानबूझकर खराब करना केवल नैतिक अपराध नहीं, बल्कि महापाप है। शास्त्रों में झूठा लांछन लगाने और किसी के सम्मान को ठेस पहुँचाने को अत्यंत निकृष्ट कार्य माना गया है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं :
“अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते॥”
(श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय २, श्लोक ३४, पृष्ठ संख्या: ४५)

श्री कृष्ण कहते हैं – सम्मानित व्यक्ति के लिए अपकीर्ति (छवि का खराब होना) मरण से भी अधिक दुखदायी होती है। राजनीतिक दल अपने क्षुद्र लाभ के लिए किसी काबिल व्यक्ति का प्रतिमा हनन करने में एक क्षण भी नहीं सोचते। जो व्यक्ति देश या संगठन के लिए निष्ठापूर्वक कार्य करता है, उसे षड्यंत्रों के तहत नीचा दिखाया जाता है ताकि अयोग्य और चाटुकार लोग आगे बढ़ सकें।

ऐसे राजनीतिक दलों के नेताओं और कर्ता-धर्ता संगठन के समर्पित भाव से भरे हुए लोगों के दर्द और त्याग को क्या समझेंगे। ऐसे ही कार्यकर्ता के लिए कवि ‘माखनलाल चतुर्वेदी’ ने उनके विषम समय और त्याग की भावना के लिए लिखा है :

“चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ।
मुझे तोड़ लेना बनमाली! उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावेंगे वीर अनेक॥”

(‘पुष्प की अभिलाषा’, हिमतरंगिनी , पृष्ठ संख्या: २४)

स्पष्ट है ऐसे त्याग और समर्पण भाव वाले कार्यकर्ता उस पुष्प की भांति संगठन का हित चाहते हैं। परंतु आज की राजनीति का दुर्भाग्य यह है कि मातृभूमि पर शीश चढ़ाने वाले वीरों और योग्य पुत्रों का मार्ग निष्कंटक बनाने के बजाय, उनके पथ में जातिवाद और लांछनों के कांटे बिछाए जाते हैं।

किसी भी देश, समाज या संगठन की प्रगति इस बात पर निर्भर करती है कि वहाँ सही व्यक्ति को सही स्थान मिला है या नहीं। यदि सेनापति का पद किसी चाटुकार को दे दिया जाए और पराक्रमी योद्धा को केवल उसकी जाति या चापलूसी न करने के कारण पैदल सैनिक बना दिया जाए, तो युद्ध में हार निश्चित है। आचार्य चाणक्य ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा है:
“अनभ्यासे विषं शास्त्रं अजीर्णे भोजनं विषम्।
दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणो विषम्॥”
( चाणक्य नीति – अध्याय ४, श्लोक १५, पृष्ठ संख्या: २८)

जिस प्रकार बिना अभ्यास के ज्ञान विष बन जाता है, उसी प्रकार बिना योग्यता के प्राप्त पद और उत्तरदायित्व पूरे समाज के लिए विष के समान साबित होते हैं।
आज प्रशासनिक विफलताएं, योजनाओं में भ्रष्टाचार और जन-आकांक्षाओं का टूटना इसी नीतिहीनता का परिणाम है।

कवि ‘नागार्जुन’ ने राजनीतिक व्यवस्था के इस खोखलेपन पर ही तंज कसते हुए लिखा था:
“काग़ज़ की नांवों पर तैर रहे हैं नेता,
योग्यता बेचारी कोने में रोती है।
चापलूसी के बल पर जो पद पाते हैं,
देश की जनता फिर दुख का फल बोती है॥”
(युगधारा, पृष्ठ संख्या: ५२)


आज दिन हम देख रहे हैं कि राजनीतिक दलों में यह समस्याएं प्रभावी होती जा रही हैं। यदि हमें भारत को वास्तविक अर्थों में प्रगतिशील और सशक्त बनाना है, तो इस जातिवादी और चाटुकारिता संचालित राजनीतिक संस्कृति को बदलना होगा। सभी दलों को आंतरिक लोकतंत्र अपनाकर पदों का वितरण योग्यता, अनुभव और जनता के प्रति निष्ठा के आधार पर करना होगा। साथ ही चरित्र हनन , प्रतिभा हनन की राजनीति करने वालों को समाज और जनता खारिज करे। मतदाताओं को भी जाति से ऊपर उठकर उम्मीदवार की योग्यता देखकर मतदान करना होगा। जब समाज गलत को प्रश्रय देना बंद करेगा, पार्टियां योग्य लोगों को आगे नहीं लाती तो उनका राजनीतिक बहिष्कार करना प्रारंभ कर देंगी तो जो वर्तमान परिदृश्य है अवश्य बदल जायेगा।

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री कवि ‘अटल बिहारी वाजपेयी’ की ये पंक्तियां बहुत हद तक स्टीक बैठती हैं:
“आओ फिर से दिया जलाएं।
भरी दुपहरी में अंधियारा,
सूरज परछाईं से हारा।
अंतरतम का नेह निचोड़ें,
बुझी हुई बाटी सुलगाएं।
आओ फिर से दिया जलाएं॥”

(मेरी ५१ कविताएं, पृष्ठ संख्या: १७)

जब तक राजनीतिक दल घोर जातिवाद और चाटुकारिता के अंधकार से बाहर निकलकर योग्यता का सम्मान करना नहीं सीखेंगे, तब तक राष्ट्र निर्माण का स्वप्न अधूरा ही रहेगा। काबिल लोगों को उनका हक देना और किसी भी निष्ठावान व्यक्ति के प्रतिमा हनन के पाप से बचना ही राजनीति का धर्म होना चाहिए। ऐसा होने से ही परिणाम हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप आएँगे और एक न्यायपूर्ण, समर्थ एवं समृद्ध भारत का निर्माण संभव हो सकेगा। अगर हम ऐसा नहीं कर पाए तो आगे की परिस्थितियां कल्पनाओं से परे होंगी।

(लेखक सहायक प्राध्यापक सह रंगकर्मी हैं)

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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