जब एक प्रधानमंत्री के फोन कॉल ने खत्म कर दिया था पाकिस्तान में रॉ का पूरा नेटवर्क

Anand Kumar
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आनंद कुमार
Jan-Man ki Baat : भारतीय
राजनीति में अक्सर वर्तमान की दीवार पर इतिहास की परछाईं दिखाई देती है। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने जब विदेश मंत्री एस. जयशंकर पर ऑपरेशन सिंदूर से पहले पाकिस्तान को भारतीय एयर स्ट्राइक की सूचना देने का गंभीर आरोप लगाया, तो उन्होंने सिर्फ वर्तमान सत्ता पर सवाल नहीं उठाया — उन्होंने इतिहास की उस धूल में लिपटी फाइल को भी खोल दिया, जिसे आज भी रॉ के गलियारों में “राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे बड़ा विश्वासघात” कहा जाता है : मोरारजी देसाई का वह फोन कॉल जो उन्होंने जनरल ज़िया उल-हक को किया था।

कांग्रेस का दावा है कि विदेश मंत्री जयशंकर ने पाकिस्तान को भारत की सर्जिकल स्ट्राइक से पहले जानकारी दी थी। आरोप कितना गंभीर है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस बहाने पवन खेड़ा ने 1970 के दशक का वो अध्याय खोल दिया, जब प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़िया उल-हक को फोन कर काहुटा में चल रहे परमाणु कार्यक्रम के बारे में भारत के पास मौजूद रॉ की खुफिया जानकारियों से अवगत करा दिया था।

पवन खेड़ा ने कहा – यह कोई व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी की थ्योरी नहीं है। यह उन दस्तावेज़ों और स्वीकारोक्तियों पर आधारित है जो आज भी राष्ट्रीय सुरक्षा के विमर्श में दर्ज हैं।

1974 में भारत के पोखरण में हुए पहले परमाणु परीक्षण ने न केवल वैश्विक बिरादरी को चौंकाया, बल्कि दक्षिण एशिया में हथियारों की होड़ की शुरुआत भी कर दी। भारत की बढ़ती परमाणु ताक़त को देखकर पाकिस्तान ने भी अपने लिए परमाणु हथियार विकसित करने का संकल्प लिया और उसे चीन जैसे रणनीतिक साझेदार का भी समर्थन प्राप्त था। इस नई चुनौतियों के दौर में भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ की दृष्टि दो मोर्चों पर टिक गई—एक ओर पाकिस्तान और दूसरी ओर चीन।

साल 1977 में रॉ ने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम की जड़ों तक पहुंचने के लिए एक बेहद गोपनीय मिशन शुरू किया—ऑपरेशन कहूटा। इस मिशन का उद्देश्य पाकिस्तान के सीक्रेट न्यूक्लियर प्रोजेक्ट की जानकारी एकत्र करना और उसकी पुष्टि करना था। कहा जाता है कि इस खुफिया ऑपरेशन में इजरायल की जानी-मानी एजेंसी मोसाद ने भी भारत की सहायता की थी।
इस पूरे अभियान का नेतृत्व किया खुफिया संसार के प्रतिष्ठित नाम आर.एन. काव ने, जिनके ‘काओबॉय’ उपनाम से ही रॉ की प्रतिष्ठा जुड़ी हुई है।

1970 के दशक के उत्तरार्ध तक रॉ ने पाकिस्तान के भीतर एक मज़बूत खुफिया तंत्र खड़ा कर लिया था। नेटवर्क के एजेंटों को पंजाब के कहूटा क्षेत्र में किसी परमाणु प्रतिष्ठान की गूंज सुनाई दी, परंतु समस्या यह थी कि इसे प्रमाणित कैसे किया जाए? उस क्षेत्र में किसी एजेंट की घुसपैठ लगभग असंभव थी। और जब तक ठोस प्रमाण मिलते, तब तक पाकिस्तान यूरेनियम समृद्ध कर चुका होता।

एक वैज्ञानिक सलाह ने इस जासूसी अभियान को नई दिशा दी। उन्हें बताया गया कि यदि कोई वैज्ञानिक परमाणु गतिविधियों में शामिल रहा हो, तो उसके शरीर में रेडियोधर्मी कणों के अवशेष पाए जा सकते हैं। ऐसे में उस वैज्ञानिक का कोई ऐसा हिस्सा जुटाना आवश्यक था जो न केवल संदेह से परे हो बल्कि जानकारीपूर्ण भी हो।

रॉ के एक एजेंट ने नायाब तरीका निकाला। कहूटा में एक नाई की दुकान की पहचान की गई जहां परमाणु वैज्ञानिक बाल कटवाने आते थे। रॉ एजेंट ने वहां चुपके से गिरे हुए बाल एकत्र किए और उन्हें भारत भेजा गया। जब इनका परीक्षण हुआ, तो यह साफ हो गया कि उन बालों में रेडिएशन मौजूद है। इस खोज ने संदेह को यकीन में बदल दिया—पाकिस्तान वास्तव में परमाणु बम बनाने की राह पर था।

उधर, इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद भी पाकिस्तानी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को लेकर चिंतित थी। विशेषकर इसलिए क्योंकि पाकिस्तानी वैज्ञानिक अब्दुल कदीर खान उत्तर कोरिया के दौरे पर गए थे, जो इजरायल का कट्टर विरोधी था। इस आशंका ने मोसाद को भारत के साथ मिलकर कहूटा पर हमले की योजना पर विचार करने के लिए प्रेरित किया। कहूटा पर बमबारी के लिए इजरायली विमानों में भारत से ईंधन भरवाने की योजना भी बनी, लेकिन यहीं एक राजनीतिक बाधा सामने आ गई।

कहा जाता है कि जब भारत के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को काहूटा में पाकिस्तान के परमाणु बम बनाने की सूचना दी गयी, तो उन्होंने पाकिस्तान के सैन्य शासक जनरल ज़िया उल-हक को फोन पर अनौपचारिक रूप से कहा — “हमें मालूम है कि तुम काहूटा में क्या कर रहे हो।” यह वाक्य ज़िया के लिए चेतावनी नहीं, वरदान साबित हुआ। जनरल ज़िया-उल-हक को यह संकेत मिल गया कि भारत को उसके परमाणु कार्यक्रम की भनक लग चुकी है। यह संकेत मिलते ही पाकिस्तान ने न केवल कहूटा की सुरक्षा बढ़ा दी, बल्कि रॉ के पूरे नेटवर्क को एक-एक कर खत्म करना शुरू कर दिया। इसी के साथ भारत के सबसे साहसी खुफिया अभियानों में से एक—ऑपरेशन कहूटा—अधूरा ही समाप्त हो गया।

रॉ के इस मिशन में शामिल एजेंटों ने अपनी जान को जोखिम में डालकर कीमती सूचनाएं जुटाईं, पर एक चूक ने सब कुछ बदल दिया। कई एजेंट मारे गए और वर्षों की मेहनत पर पानी फिर गया। यदि इस अभियान की जानकारी सतर्कता से उपयोग में लाई जाती, तो हो सकता है पाकिस्तान परमाणु बम बना ही न पाता।

इस पूरे घटनाक्रम में एक और चौंकाने वाली कड़ी है। जब इजरायल पाकिस्तान के परमाणु अड्डों पर सर्जिकल एयरस्ट्राइक करने के लिए तैयार था, तब उसने भारत से एक ही गुज़ारिश की — “भारतीय वायु क्षेत्र में ईंधन भरने की इजाजत दीजिए।” मगर मोरारजी देसाई ने यह अनुमति देने से इनकार कर दिया। इतिहास के जानकार मानते हैं कि अगर भारत उस समय इजरायल को यह इजाजत दे देता, तो पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम वहीं खत्म हो जाता।

मोरारजी देसाई को पाकिस्तान ने 1990 में अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान “निशान-ए-पाकिस्तान” से नवाजा। सवाल उठता है — क्या यह एक राजनीतिक सद्भावना थी, या उन सूचनाओं का इनाम जो उन्होंने पाकिस्तान को सौंपीं? यह सवाल तब और गंभीर हो जाता है जब हम याद करते हैं कि उन्हें भारत में “भारत रत्न” से भी नवाजा गया था। क्या वह दुर्लभ संयोग था या रणनीतिक साज़िश?

मोरारजी देसाई न केवल रॉ को इंदिरा गांधी का ‘प्रेटोरियन गार्ड’ मानते थे, बल्कि उन्होंने प्रधानमंत्री बनते ही रॉ का बजट इतना कम कर दिया कि विदेशों में चल रहे गुप्त अभियानों को बंद करना पड़ा। ऑपरेशन काहुटा, जो पाकिस्तान के परमाणु प्रोग्राम को खत्म करने की भारत की सबसे महत्वाकांक्षी योजना थी, एक फोन कॉल में जलकर राख हो गई।

कांग्रेस का यह आरोप कि जयशंकर ने ऑपरेशन सिंदूर से पहले पाकिस्तान को स्ट्राइक की जानकारी दी, केवल एक मंत्री पर निशाना नहीं है — यह एक सख़्त सवाल है: क्या भारत फिर वही कर रहा है, जो 1970 के दशक में कर चुका है?

जहाँ कुछ डिफेंस एक्सपर्ट, जैसे आलोक बंसल, इस थ्योरी को नकारते हैं कि मोरारजी देसाई ने ज़िया उल-हक को कोई विशेष जानकारी दी, वहीं रॉ के पूर्व अधिकारी मेजर जनरल वी. के. सिंह और बी. रमन जैसे नाम इस पूरे घटनाक्रम को स्पष्ट रूप से स्वीकार कर चुके हैं।


आज जब हम जयशंकर पर लगे आरोपों की समीक्षा करते हैं, तो यह केवल एक राजनीतिक वाद-विवाद नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की चेतावनी है। कूटनीति में एक शब्द, एक सूचना, एक निर्णय — पूरी पीढ़ी की सुरक्षा को बदल सकता है। मोरारजी देसाई ने इतिहास में एक ऐसा चैप्टर लिखा, जिसे रॉ आज तक ‘सबसे बड़ा विश्वासघात’ मानता है। भारत उस इतिहास को दोहराने की गलती नहीं कर सकता।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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