TMC में बड़ी टूट के बाद चर्चा में आई NCPI, जानिए कौन हैं इसके संस्थापक और क्यों सुर्खियों में है यह छोटी पार्टी

Anand Kumar
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नयी दिल्ली : पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लोकसभा सांसदों के बड़े पैमाने पर अलग होने के बाद एक अपेक्षाकृत छोटी राजनीतिक पार्टी ने अचानक राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर ली हैं। नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) का नाम उस समय चर्चा के केंद्र में आ गया, जब TMC के 20 सांसदों ने इस दल में विलय का दावा करते हुए संसद में अलग पहचान की मांग की।

राजनीतिक गलियारों में सबसे अधिक चर्चा इस बात की है कि आखिर NCPI क्या है, इसके पीछे कौन लोग हैं और यह पार्टी अचानक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में कैसे पहुंच गई।

तीन वर्ष पहले हुई थी पार्टी की स्थापना

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, NCPI की स्थापना वर्ष 2023 में पश्चिम बंगाल के दंपति उत्तिया कुंडू और शेउली कुंडू ने की थी। पार्टी के संगठनात्मक रिकॉर्ड में उत्तिया कुंडू को राष्ट्रीय अध्यक्ष जबकि शेउली कुंडू को कोषाध्यक्ष के रूप में दर्ज किया गया है।

हाल के दिनों में उत्तिया कुंडू का नाम तब अधिक चर्चा में आया, जब उनके सोशल मीडिया अकाउंट पर पश्चिम बंगाल की राजनीति से जुड़े प्रमुख नेताओं के साथ तस्वीरें सामने आईं। पार्टी के कार्यालय के बाहर लगे परिचय बोर्ड में उन्होंने स्वयं को एक बंगाली समाचार पत्र का संपादक और शिक्षक बताया है, जबकि शेउली कुंडू को कलकत्ता हाईकोर्ट की अधिवक्ता के रूप में उल्लेखित किया गया है।

NCPI

हावड़ा में है पार्टी का मुख्यालय

NCPI का पंजीकृत कार्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के बानीपुर क्षेत्र में स्थित है। TMC सांसदों के विलय की घोषणा के बाद इस कार्यालय पर राजनीतिक गतिविधियां अचानक बढ़ गई हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कार्यालय परिसर के आसपास सुरक्षा व्यवस्था भी बढ़ाई गई।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब तक सीमित पहचान रखने वाली यह पार्टी पहली बार राष्ट्रीय मीडिया और संसदीय राजनीति के केंद्र में पहुंची है।

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त्रिपुरा विधानसभा चुनाव से हुई थी चुनावी शुरुआत

NCPI ने अपनी चुनावी यात्रा पश्चिम बंगाल से नहीं बल्कि त्रिपुरा विधानसभा चुनाव 2023 से शुरू की थी। पार्टी ने उस चुनाव में चार प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। हालांकि चुनावी प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा और अधिकांश उम्मीदवारों को या तो नोटा (NOTA) से कम वोट मिले या उसके आसपास ही समर्थन प्राप्त हुआ।

चुनाव आयोग के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक पार्टी को उस अवधि में लगभग 1.13 लाख रुपये का चंदा प्राप्त हुआ था। चुनाव अभियान के दौरान पार्टी ने दलबदल विरोधी संदेश को प्रमुख मुद्दा बनाया था और अपने प्रचार में राजनीतिक अवसरवाद के खिलाफ नारे दिए थे।

चुनाव के बाद लगभग निष्क्रिय हो गई थी पार्टी

त्रिपुरा चुनाव के बाद पार्टी की गतिविधियां लगभग समाप्त हो गई थीं। चुनाव लड़ चुके कई उम्मीदवारों ने मीडिया से बातचीत में दावा किया कि चुनाव समाप्त होने के बाद संगठन का स्थानीय स्तर पर संपर्क टूट गया था।

कुछ पूर्व उम्मीदवारों ने यह भी कहा कि उन्हें TMC सांसदों के साथ हुए विलय की खबर मीडिया के माध्यम से मिली और वे स्वयं इस घटनाक्रम से आश्चर्यचकित हैं। उनका कहना है कि चुनाव के बाद पार्टी की ओर से कोई सक्रिय राजनीतिक कार्यक्रम या संगठनात्मक संवाद नहीं हुआ था।

NCPI

TMC के बागी सांसदों ने NDA को समर्थन देने के संकेत दिए

राजनीतिक संकट तब गहरा गया जब TMC के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने अलग गुट बनाकर NCPI में विलय का दावा किया। इसके बाद बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर सदन में अलग बैठने की व्यवस्था और स्वतंत्र पहचान की मांग की।

बागी खेमे की ओर से कहा गया कि उनके पास दो-तिहाई सांसदों का समर्थन है और वे संसद में अलग समूह के रूप में मान्यता चाहते हैं। साथ ही यह भी संकेत दिया गया कि नया समूह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के साथ सहयोग करेगा।

संसद में पहचान को लेकर शुरू हुई नई लड़ाई

बागी सांसदों और ममता बनर्जी खेमे के बीच अब असली राजनीतिक संघर्ष पार्टी की पहचान और चुनाव चिह्न को लेकर दिखाई दे रहा है। TMC नेतृत्व ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र भेजकर बागी समूह को अलग मान्यता नहीं देने की मांग की है।

दूसरी ओर, बागी सांसदों का तर्क है कि उनके साथ लोकसभा में पार्टी के दो-तिहाई सदस्य हैं, इसलिए दल-बदल विरोधी कानून के तहत उन्हें संरक्षण मिलना चाहिए। उनका कहना है कि भविष्य में वे तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न पर भी दावा पेश कर सकते हैं।

आगे क्या हो सकता है?

राजनीतिक और कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार अब पूरा मामला तीन स्तरों पर आगे बढ़ सकता है। पहला, लोकसभा अध्यक्ष को यह तय करना होगा कि बागी सांसदों को अलग समूह के रूप में मान्यता दी जाए या नहीं। दूसरा, चुनाव आयोग के समक्ष पार्टी की वैध पहचान और चुनाव चिह्न को लेकर दावा पेश हो सकता है। तीसरा, यदि दोनों पक्ष अपने दावे पर अड़े रहते हैं तो अंतिम फैसला अदालतों तक भी पहुंच सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई अनिश्चितता पैदा कर दी है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संसद, चुनाव आयोग और न्यायपालिका के स्तर पर आने वाले फैसले TMC और NCPI के राजनीतिक भविष्य को किस दिशा में ले जाते हैं।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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